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Natural Calamities in India : भारत के इतिहास की कुछ प्रमुख प्राकृतिक आपदाएं

admin 25 February 2022
Natural Calamities
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प्राकृतिक आपदाएं भले ही मनुष्य के नियंत्रण से बाहर होती हैं लेकिन कहीं न कहीं उनमें से अधिकतर आपदाओं के लिए मानव स्वयं भी जिम्मेदार होता है, यानी मानव द्वारा निर्मित कुछ गतिविधियां स्वयं भी इसके लिए जिम्मेदार होती हैं।

संपूर्ण विश्व के मनुष्यों के द्वारा आवश्यकता से अधिक भोगी गई विभिन्न प्रकार की सुख-सुविधाओं के कारण आज दुनिया के तमाम देश और उनकी जनता तमाम आपदाओं का सामना करती हुई देखी जा सकती हैं।

भारत भी अपने इतिहास में अब तक कुछ विशेष और बहुत ही घातक आपदाओं का सामना कर चुका है। भारत की उन्हीं कुछ प्रमुख प्राकृतिक आपदाओं में वर्ष 1999 में ओडिशा का सुपर साइक्लोन, वर्ष 2001 में आया गुजरात का भूकंप, वर्ष 2004 में हिंद महासागर में आई सुनामी, वर्ष 2013 में आया महाराष्ट्र में सूखे का कहर और उत्तराखंड में वर्ष 2013 में अचानक आई बाढ़ जैसी कुछ प्रमुख प्राकृतिक आपदाओं को देखा जा सकता है।

यहां हम भारतीय इतिहास की कुछ सबसे भयानक और न भूली जा सकने वाली प्राकृतिक आपदाओं के आंकड़े दे रहे हैं।

कश्मीर में बाढ़ की आपदा, 2014 –
मौतों की संख्याः 550 से अधिक।
प्रभावित क्षेत्रः श्रीनगर, बांदीपुर, राजौरी आदि।
कारणः लगातार होने वाली मूसलाधार वर्षा के कारण झेलम नदी में बाढ़।

वर्ष 2014 के सितंबर माह में लगातार मूसलाधार वर्षा होने के कारण झेलम नदी का पानी काफी बढ़ गया था इसीलिए कश्मीर के रिहायशी क्षेत्रों में पानी घुस गया। इस बाढ़ में फंसने के कारण करीब 550 से अधिक लोगों ने अपनी जान गंवाई और लगभग 5,000 करोड़ से 6,000 करोड़ की अनुमानित संपत्ति का भी नुकसान हुआ था। भारतीय सेना ने इस क्षेत्र के फंसे हुए निवासियों की बहुत मदद की थी।

उत्तराखंड में flash floods (आकस्मिक बाढ़), 2013 –
प्रभावित क्षेत्र: इसमें राज्य के 13 में से 12 जिले प्रभावित हुए थे जबकि चार जिले सबसे अधिक प्रभावित हुए। इन चार जिलों में रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ और चमोली प्रमुख थे।
कारणः भारी वर्षा, बड़े पैमाने पर भूस्खलन।
मौतों की संख्याः 5,700 से अधिक।

उत्तराखंड की flash floods यानी आकस्मिक बाढ़ के कारण भारत के इतिहास में यह सबसे विनाशकारी बाढ़ में से एक मानी जाती है। जून 2013 में उत्तराखंड में भारी वर्षा के कारण बड़े पैमाने पर भूस्खलन हुआ जिसके कारण इसमें करीब चार दिन यानी 14 से 17 जून तक बाढ़ और भूस्खलन होता रहा। इस फ्लैश फ्लड यानी आकस्मिक बाढ़ के कारण प्रदेश की चारधाम यात्रा पर गये लाखों श्रद्धालु फंस गये और लगभग एक लाख से अधिक तीर्थ यात्री तो सिर्फ केदारनाथ मंदिर में ही फंस गए थे।

बिहार बाढ़ आपदा, 2007 –
प्रभावित क्षेत्रः सबसे अधिक प्रभावित जिलों में दरभंगा, पटना, भागलपुर, पूर्वी चंपारण, सहरसा, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी और सुपौल आदि के साथ बिहार के करीब 19 जिलों पर इसका असर पड़ा था।
कारण: 30 साल के मासिक औसत से पांच गुना अधिक वर्षा को बिहार की इस बाढ़ आपदा का प्रमुख कारण माना गया।
मौतों की संख्या: 1,287 लोगों के अलावा हजारों की संख्या में पशुधन की भी जान चली गई।

बिहार बाढ़ आपदा वर्ष 2007 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा बिहार की ‘जीवित स्मृति’ में सबसे बुरे दौर के रूप में वर्णित किया गया था।
एक अनुमान के अनुसार बिहार में आई उस बाढ़ के कारण पूरे राज्य में लगभग एक करोड़ लाख लोगों को प्रभावित किया था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 29,000 घर एकदम नष्ट हो गए और 44,000 घर क्षतिग्रस्त हुए थे। लगभग 4822 गाँव और एक करोड़ हेक्टेयर से भी अधिक कृषि भूमि इस बाढ़ से प्रभावित हुई थी।

हिंद महासागर सुनामी 2004 –
प्रभावित क्षेत्रः भारत का दक्षिणी भाग और अंडमान निकोबार द्वीप समूह, लक्षद्वीप द्वीप, इंडोनेशिया, श्रीलंका आदि प्रमुख थे।
कारणः सुनामी।
मरने वालों की संख्याः लगभग 2.30 लाख।

इतिहास में इसे अब तक की सबसे घातक सुनामी मानी जाती है जो इंडोनेशिया के सुमात्रा के पश्चिमी तट से शुरू हुई थी। इसमें कुल मिलाकर लगभग 12 देशों को सीधे-सीधे प्रभावित किया था और इसमें 2.3 लाख से अधिक लोगों को जान गंवानी पड़ी थी।
इस सुनामी की तीव्रता 9.1 से 9.3 के बीच आंका गया और यह लगभग 10 मिनट तक जारी रही थी। एक अनुसंधान के अनुसार दुनिया का यह तीसरा सबसे बड़ा भूकंप था जो अब तक दर्ज किया गया है।

गुजरात भूकंप, 2001 –
प्रभावित क्षेत्रः कच्छ, सूरत, सुरेंद्रनगर, अहमदाबाद, भुज, गांधीनगर, राजकोट, जामनगर आदि सबसे प्रमुख।
कारणः भूकंप
प्रभावितः मौतें 20,000, घायल 167,000 से अधिक और लगभग 400,000 लोग बेघर हो गए थे।

यह भूकंप वर्ष 2001 में भारत के 51 वें गणतंत्र दिवस यानी 26 जनवरी के समारोह के दिन आया था। गुजरात के कच्छ जिले की भचाऊ तहसील में आया यह भूकंप रिक्टर स्केल पर 7.6 से 7.9 की तीव्रता का आंका गया जो 120 सेकंड तक चला था।

सुपर साइक्लोन, ओडिशा, 1999 –
प्रभावित क्षेत्रः भद्रक, केंद्रपाड़ा, बालासोर, जगतसिंहपुर, गंजम और पुरी के तटीय जिले।
कारणः चक्रवात और तूफान।
मौतों की संख्याः लगभग 15,000 से भी अधिक।

सन 1999 का यह सुपर साइक्लोन, हिंद महासागर के उत्तर में सबसे खतरनाक उष्णकटिबंधीय चक्रवात माना गया। इसकी गति करीब 260 किमी प्रति घंटा थी। इस चक्रवात से भारत सहित बांग्लादेश, म्यांमार और थाईलैंड को भी भारी नुकसान पहुंचाया था।

एक अनुमान के अनुसार, इस चक्रवात में लगभग 15,000 लोग मारे गए और लगभग एक लाख पचास हजार लोग बेघर हो गए थे जबकि करीब तीन से अधिक घर नष्ट भी हुए थे।

महान बंगाल अकाल, 1770 –
प्रभावित क्षेत्रः पश्चिम बंगाल (बीरभूम और मुर्शिदाबाद), बिहार (तिरहुत, चंपारण और बेतिया), ओडिशा और बांग्लादेश।
कारणः सूखा और अकाल।
मौतों की संख्याः एक करोड़ से भी अधिक।

भारत के इतिहासकारों और जानकारों ने इस अकाल को सीधे-सीधे मानव निर्मित यानी उस समय की अंग्रेज सरकार के द्वारा जानबूझ कर पैदा की गई आपदा माना है। जबकि नोबेल पुरस्कार विजेता भारतीय अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने भी इस अकाल को मानव निर्मित आपदा ही माना है। यह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की शोषणकारी नीतियों और सूखा पड़ने के कारण हुआ था।

यह अकाल वर्ष 1769 में एक असफल मानसून से शुरू हुआ था जो 1773 तक लगातार जारी रहा। मानव निर्मित इस अकाल की पूर्ण अवधि के दौरान लगभग एक करोड़ से भी अधिक लोग भूख के कारण मर गए थे।

ये थीं भारतीय इतिहास से जुड़ीं अब तक की कुछ ऐसी महत्वपूर्ण प्राकृतिक घटनाएँ जिनके कारण बड़े पैमाने पर जान-माल की क्षति हुई थी। इनमें से कुछ घटनाएँ शत-प्रतिशत मानवीय गतिविधियों के कारण पैदा हुईं और मानव को ही भारी नुकसान उठाना पड़ा था।

– अशोक सिंह चौहान

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