Thursday, May 21, 2026
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अब्राहम लिंकन द्वारा अपने बेटे के शिक्षक के नाम लिखा गया पत्र

अब्राहम लिंकन जो कि वर्ष 1860 में अपने जीवन में लगातार कई प्रकार की विफलताओं को झेलने के बाद एक दिन अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति बने थे. यहाँ हम उन्हीं के द्वारा लिखे गए एक ऐसे पत्र का हिंदी अनुवाद दे रहे हैं जो उन्होंने अपने पुत्र के स्कूल के हेडमास्टर को लिखा था.

श्रीमान शिक्षक महोदय! मैं जानता हूं और मानता हूं कि न तो हर एक व्यक्ति सही होता है और न ही सच्चा। किंतु आपने मेरे पुत्र को सिखाना होगा कि कौन बुरा है और कौन अच्छा। दुष्ट व्यक्तियों के साथ-साथ आदर्श प्रणेता भी होते हैं, स्वार्थी राजनीतिज्ञों के साथ-साथ समर्पित नेता भी होते हैं। दुश्मनों के साथ-साथ मित्रा भी होते हैं, हर विरूपता के साथ सुन्दर चित्र भी होते हैं।

समय भले ही लग जाए, किन्तु यदि सिखा सको तो उसे सिखाना कि कहीं से मुफ्त में पाये हुए पांच विभिन्न प्रकारों से अधिक मूल्यवान है – स्वयं द्वारा एक कमाना। पाई हुई हार को कैसे झेलें, उसे यह भी सिखाना और साथ ही सिखाना, जीत की खुशियां मनाना। यदि हो सके तो उसे इर्ष्या या द्वेष से परे हटाना और जीवन में छिपी मौन मुस्कान का पाठ भी पढ़ाना।

जितनी जल्दी हो सके उसे जानने देना कि दूसरों को आतंकित करने वाला स्वयं कमजोर होता है, वह भयभीत व चिंतित है क्योंकि उसके मन में स्वयं चोर होता है। उसे दिखा सको तो दिखाना – किताबों में छिपा हुआ खजाना। और उसे वक्त देना चिंता करने के लिए… कि आकाश के परे उड़ते पंछियों का आह्लाद, सूर्य के प्रकाश में मधु मक्खियों का निनाद, हरी-भरी पहाड़ियों से झांकते फूलों का संवाद, कितना विलक्षण होता है – अविस्मरणीय… अगाध…।

उसे यह भी सिखाना कि धोखे से सफलता पाने से असफल होना अधिक सम्माननीय है, और अपने विचारों पर भरोसा रखना अधिक विश्वसनीय है। चाहें अन्य सभी उनको गलत ठहरायें परंतु स्वयं पर अपनी आस्था बनी रहे यह विचारणीय है। उसे यह भी सिखाना कि वह सभ्य के साथ सभ्य हो, किंतु कठोर के साथ हो कठोर। और लकीर का फकीर बनकर, उस भीड़ के पीछे न भागे जो निरर्थक शोर करती हो। उसे सिखाना कि वह सबकी सुनते हुए अपने मन की बात भी सुन सके, हर तथ्य को सत्य की कसौटी पर कसकर परख सके।

यदि सिखा सको तो सिखाना कि वह दुःख में भी मुस्कुरा सके, घनी वेदना से आहत हो, पर खुशी के गीत भी गा सके। उसे यह भी सिखाना कि आंसू बहते हों तो उन्हें बहने दे, इसमें कोई शर्म नहीं… कोई कुछ भी कहता हो… कहने दे। उसे सिखाना – वह सनकियों को कनखियों से हंसकर टाल सके पर अत्यन्त मृदुभाषी से बचने का ख्याल रखे। वह अपने बाहुबल व बुद्धिबल का अधिकतम मोल पहचान पाए परंतु अपने हृदय व आत्मा की बोली न लगवाए। वह भीड़ के शोर में भी अपने कान बन्द कर सके और स्वतः की अंतरात्मा की सही आवाज सुन सके। सच के लिए लड़ सके और सच के लिए अड़ सके। उसे सहानभूति से समझाना पर प्यार के अतिरेक से मत बहलाना। क्योंकि तप-तप कर ही लोहा खरा बनता है, ताप पाकर ही सोना निखरता है।

उसे साहस देना ताकि वक्त पड़ने पर अधीर न बने, सहनशील बनाना ताकि वह वीर बने। उसे सिखाना कि वह स्वयं पर असीम विश्वास करे, ताकि समस्त मानव जाति पर भरोसा व आस धरे।

यह एक बड़ा-सा लम्बा-चौड़ा अनुरोध है पर आप कर सकते हैं, क्या इसका आपको बोध है? मेरे और आपके… दोनों के साथ उसका रिश्ता है। सच मानो, मेरा बेटा एक प्यारा-सा नन्हा सा फरिश्ता है!
– अब्राहम लिंकन

(अब्राहम लिंकन द्वारा अपने पुत्र के शिक्षक के नाम लिखे गये पत्रा का हिन्दी भावानुवाद)

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देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
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