Saturday, June 20, 2026
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फिल्म उद्योग भारतीय संस्कृति को बचाये रखने में आगे आये

वैसे तो बहुत आसानी से कह दिया जाता है कि फिल्में समाज का आइना होती हैं। फिल्में वैसी ही बनती हैं जैसा लोग देखना चाहते हैं किंतु इन बातों में कोई सत्यता नहीं है। कोई भी परिवार सदैव यही सोचता है कि फिल्में ऐसी बननी चाहिए जिसे वह अपने परिवार के साथ बैठकर देख सके। अगर ऐसी फिल्में नहीं बनेंगी तो लोग क्या करेंगे।

रामायण एवं महाभारत जैसे धारावाहिकों ने यह साबित कर दिया है कि वास्तव में जनता क्या चाहती है, इसलिए आम जनता की रुचि को ध्यान में रखते हुए भारतीय संस्कृति के अनुरूप ही फिल्में बननी चाहिए। इसी में राष्ट्र एवं समाज का कल्याण है।

– सोनू मिरोठा, दरियागंज (दिल्ली)

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देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
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