Friday, May 29, 2026
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निमाड़ का पौराणिक इतिहास और सांस्कृतिक महत्व | History of Nimad-MP

अजय सिंह चौहान || मध्य प्रदेश के पश्चिम में स्थित निमाड़ अंचल या निमाड़ क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से प्रकृति का एक अनोखा और अद्भूत वरदान कहा जाता है। क्योंकि जितनी खूबसूरत इसकी संस्कृति और भाषा है उतनी ही अनोखी इसकी भौगोलिक स्थिति भी है। इस निमाड़ क्षेत्र की भौगोलिक सीमाओं में एक तरफ विन्ध्य पर्वत और दूसरी तरफ सतपुड़ा पर्वत खड़े हैं, जबकि इसके बीचों-बीच से विश्व की सबसे पवित्र और प्राचीनतम नदियों में एक नर्मदा नदी बहती है।

नर्मदा नदी के बारे में यह बात बहुत ही कम लोग जानते होंगे कि इसके किनारों पर बसी मानव सभ्यता भी दुनिया की सबसे प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है। नर्मदा के किनारों पर बसी निमाड़ अंचल की मानव सभ्यता और संस्कृति सनातन संस्कृति की पौराणिक, प्राचीन एवं मूल्यवान पहचान है।

नर्मदा को सांस्कृतिक उद्गम का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। निमाड़ की संस्कृति को सबसे ज्यादा नर्मदा नदी ने ही प्रभावित किया है। इसका कारण भी यही है कि यह संपूर्ण क्षेत्र हमेशा से प्रकृति पर निर्भर रहा है और यहां की प्रकृति नर्मदा पर आश्रित रही है।

इसके अपने इस खूबसूरत और अनोखे नाम ‘निमाड़’ को लेकर जो हमें अपने पुराणों और ग्रंथों में तथ्य और प्रमाण मिलते हैं उनके अनुसार पौराणिक काल में यही निमाड़ क्षेत्र ‘अनूप जनपद’ कहलाता था।

Jiroti Art - wall painting of Nimad in Madhya Pradesh
निमाड़ के आदिवासी आज भी देश की प्रमुख धरा से दूर हैं

महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘रघुवंश’ महाकाव्य में भी अनूपदेश का उल्लेख मिलता है जिसकी राजधानी माहिष्मति बताई गई है। इसके अलावा सातवाहन वंश की महारानी गौतमी बालश्री का एक शिलालेख जो नासिक में मिला है उसमें भी इस अनूपदेश को भारतवर्ष के मध्य में स्थित भू-भाग बताया गया है।

यहां हम आपको बता दें कि ‘अभिधानचिंतामणि’ नामक संस्कृत के शब्दकोश में अनूपदेश का जो शाब्दिक अर्थ मिलता है उसके अनुसार एक ऐसा भू-भाग जहां जलस्रोत या जहाँ से जल का बहाव निरंतर बना रहता हो उसके किनारे के क्षेत्र को अनूपदेश कहा जाता है। और यहां इसका सीधा सा अर्थ है कि नर्मदा का जल-प्रवाह भी निरंतर बना रहता है इसीलिए इसे अनूपदेश कहा गया है।

महाभारत में भी इस स्थान को ‘सागरानूपवासिन’ के नाम से उल्लेखित किया गया है तथा इसमें अनूपदेश की पश्चिमी सीमा को सागर के उपकण्ठ तक बताया गया है अर्थात् इसे गुजरात के भरूच तक सूचित किया है, यानी जहां जाकर नर्मदा नदी महासागर में समा जाती है। इसी तरह पुराणों में वर्णित माहिष्मति की स्थिति मध्य विंध्य पर्वत के निकट बताई गई है।

इसके अलावा विष्णु पुराण में जिस ‘नर्मदानुप’ का जिक्र किया गया है उसके अनुसार यह स्थान विंध्याचल की पूर्वी श्रेणियों को बताया गया है, जिनमें नर्मदा, ताप्ती और सोन नदी आदि के स्त्रोत स्थित हैं। आज इसे हम नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक के नाम से जानते हैं।

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इसके अलावा अनुमान है कि यह भूमि किसी समय में आर्य एवं अनार्य सभ्यताओं की मिश्रित कर्म-भूमि हुआ करती थी। संभवतः यही कारण है आगे चल कर इसे ‘निमार्य‘ नाम से जाना जाने लगा जो कि समय के साथ-साथ भाषा और बोली की सहुलियत और उच्चारण के अनुसार धीरे-धीरे ‘निमार‘ में बदल गया और फिर निमार से ‘निमाड़‘ शब्द प्रचलन में आ गया।

जबकि कुछ जानकार यहां यह भी तर्क देते हैं कि पौराणिक युग में इस क्षेत्र में नीम के घने जंगलों की भरमार हुआ करती थी। इसलिए इस क्षेत्र को नीम झाड़ यानी नीम के पेड़ों वाला देश कहा जाता था। और फिर नीम झाड़ से यह निमाड़ बन गया।

NARMADA RIVER IN OMKARESHWAR OF MP
नर्मदा निमाड़ की सबसे प्रमुख और सबसे पवन नदी है.

निमाड़ के संपूर्ण अंचल में परंपरागत संस्कृति और यहाँ की क्षेत्रिय बोली जिसे निमाड़ी कहा जाता है शत-प्रतिशत एक ही सूनने को मिलती है। हालांकि निमाड़ी बोली में कुछ-कुछ राजस्थानी, गुजराती और मराठी शब्दों का भी प्रभाव पाया जाता है।

नर्मदा के किनारों पर बसी मानव सभ्यता का समय महेश्वर के नावड़ाटौली नामक स्थान पर मिले पुरा साक्ष्यों के आधार पर लगभग ढ़ाई लाख वर्ष माना गया है। इसीलिए प्रागैतिहासिक काल के आदि मानव की शरणस्थली के रूप में सतपुड़ा और विन्ध्य पर्वतों का अपना महत्व और इतिहास है।

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आज भी यहां नर्मदा तट के जो विन्ध्य और सतपुड़ा वन-प्रान्तों में आदिवासी समूह निवास करते हैं उन आदिवासियों का यानी अरण्यवासियों का वर्णन पुराणों और किंवदंतियों में मिलता है। इन आदिवासी समूहों में गौण्ड, बैगा, कोरकू, भील, शबर जैसे नाम सबसे प्रमुख हैं।

निमाड़ की पौराणिक संस्कृति के केन्द्र में सर्वप्रथम ओंकारेश्वर, मांधाता और महिष्मती बसे हुए हैं। वर्तमान में हम जिसे महेश्वर के नाम से जानते हैं वास्तव में यही प्राचीन काल का महिष्मती नगर है।

निमाड़ का इतिहास जनजीवन, कला और संस्कृति से सदैव सम्पन्न रहा है। यहां की पठारों वाली भूमि जितनी कठोर और तपन से भरी दिखती है उतना ही निमाड़ के वासियों के हृदय में कला, संस्कृति, मेल-मिलाप और लोक साहित्य की अनूठी परम्परा के लिए कोमल और निर्मल पाया जाता है। निमाड़ की कला और संस्कृति ही नहीं बल्कि इसका सामरिक इतिहास भी पौराणिक काल से अत्यन्त समृद्ध और गौरवशाली है।

वर्तमान राजनीतिक दृष्टि से देखें तो निमाड़ को दो हिस्सों में पहचाना जाता है – जिनको पूर्वी और पश्चिमी निमाड़ कहा जाता है। जबकि यह संपूर्ण निमाड़ क्षेत्र चार प्रमुख जिलों – बड़वानी, बुरहानपुर, खंडवा और खरगोन में विभाजित किया गया है। इसके पश्चिमी निमाड़ में खरगोन, गोगांव, महेश्वर, सेंधवा, भिकनगाव जैसे छोटे-बड़े कई नगर आते हैं। जबकि पूर्वी निमाड़ में खंडवा, हरसूद, पुनासा जैसे नगर प्रमुख हैं।

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देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
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