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कार्तिक पूर्णिमा और गंगा स्नान का महत्व

admin 5 November 2022
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शास्त्रों में कार्तिक पूर्णिमा को विशेष दिन माना गया है। मान्यता है कि तीनों लोकों में त्रिपुरासुर राक्षस का राज चलता था। देवताओं ने भगवान शिव के समक्ष त्रिपुरासुर राक्षस से उद्धार की विनती की। भगवान शिव ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन राक्षस का वध कर उसके अत्याचारों से सभी को मुक्त कराया और त्रिपुरारी कहलाये। इससे प्रसन्न होकर देवताओं ने स्वर्ग लोक में दीप जलाकर दीपोत्सव मनाया था तभी से कार्तिक पूर्णिमा को देव दिवाली मनायी जाने लगी।

इस दिन किसी भी पवित्र नदी में किया गया स्नान व्यक्ति के सारे पापों का नाश करता है। इसके साथ किसी पवित्र नदी में दीप दान करने का भी महत्व होता है इसलिए इस दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु गंगा पूजा, दर्शन व स्नान करने पहुंचते हैं।

इस दिन न केवल गंगा नदी में बल्कि अन्य सभी पवित्र नदियों के साथ-साथ सभी प्रकार के तीर्थ कुंडों में भी स्नान करने की परंपरा है। यमुना, गोदावरी, नर्मदा, गंडक, कुरुक्षेत्र, अयोध्या, काशी में स्नान करने से विशेष पुण्य फल प्राप्त होता है। इस दिन गंगा स्नान के बाद दान जरूर करना चाहिए जिसमें संतरा, सेब, शरीफा, उड़द दाल, चावल का दान शुभ माना गया है।

देव दिवाली एक दिव्य त्यौहार है। इस अवसर पर मिट्टी के लाखों दीपक गंगा नदी के पवित्र जल में तैरते हैं। एक समान संख्या के साथ विभिन्न घाटों और आस-पास के राजसी एवं अन्य आलीशान इमारतों की सीढ़ियां धूप और मंत्रों की पवित्र जप एवं मजबूत सुगंध से भर जाती हैं।

दैवीय गुणों से भरपूर है गंगा जल –
जब भी सनातन धर्म में कोई पावन व्रत व त्यौहार आता है तो लगभग हर व्यक्ति सबसे पहले गंगा स्नान करके अपने आप को शुद्ध करता है। कुछ लोग अपने घर में रखे गंगा जल से स्नान कर लेते हैं तो कुछ लोग पावन गंगा घाटों पर जाकर स्नान करके मन-तन को शुद्ध करते हैं।

हिंदू धर्म शास्त्रों में गंगा को मां का दर्जा प्राप्त है, जिस कारण इनका अधिक महत्व प्राप्त है वहीं गंगा मां देवों के देव महादेव के सिर पर सुशोभित हैं जिस कारण सनातन धर्म में इनका महत्व और अधिक बढ़ जाता है अर्थात धार्मिक दृष्टि से गंगा मां की पूजा एवं गंगाजल से स्नान करना लाभदायक माना जाता है।

गंगा स्नान करने से न केवल धार्मिक बल्कि कई तरह के वैज्ञानिक लाभ भी प्राप्त होते हैं। गंगा नदी का जल वर्षों प्रयोग करने और रखने पर भी खराब नहीं होता है। इसके जल के नियमित प्रयोग से रोग दूर होते हैं। हालांकि, इन गुणों के पीछे के कारण अभी बहुत हद तक अज्ञात हैं। कुछ लोग इसे चमत्कार कहते हैं और कुछ लोग इसे जड़ी-बूटियों और आयुर्वेद से जोड़ते हैं। विज्ञान भी इसके दैवीय गुणों को स्वीकार करता है। आध्यात्मिक जगत में इसको सकारात्मक उर्जा का चमत्कार कह सकते हैं।

मुक्ति का मार्ग हैं गंगा –
गंगा जी में स्नान करने से सात्विकता और पुण्य लाभ प्राप्त होता है। भारत की अनेक धार्मिक अवधारणाओं में गंगा नदी को देवी के रूप में दर्शाया गया है। अनेक पवित्र तीर्थस्थल गंगा नदी के किनारे पर बसे हुये हैं। गंगा नदी को भारत की पवित्र नदियों में सबसे पवित्र नदी के रूप में पूजा जाता है। मान्यता अनुसार गंगा में स्नान करने से मनुष्य के समस्त पापों का नाश होता है। लोग गंगा के किनारे ही प्राण विसर्जन या अंतिम संस्कार की इच्छा रखते हैं तथा
मृत्यु पश्चात गंगा में अपनी राख विसर्जित करना मोक्ष प्राप्ति के लिये आवश्यक समझते हैं।

गंगा जल को पवित्र समझा जाता है तथा समस्त संस्कारों में उसका होना आवश्यक माना गया है। गंगाजल को अमृत समान माना गया है। अनेक पर्वों और उत्सवों का गंगा से सीधा संबंध है। मकर संक्राति, कुंभ और गंगा दशहरा के समय गंगा में स्नान, दान एवं दर्शन करना महत्त्वपूर्ण माना गया है। गंगा पर अनेक प्रसिद्ध मेलों का आयोजन किया जाता है। गंगा तीर्थ स्थल सम्पूर्ण भारत में सांस्कृतिक एकता स्थापित करता है।

गंगा पूजन एवं स्नान से रिद्धि-सिद्धि, यश एवं सम्मान की प्राप्ति होती है तथा समस्त पापों का क्षय होता है। मान्यता है कि गंगा पूजन से मांगलिक दोष से ग्रसित जातकों को विशेष लाभ प्राप्त होता है। विधि-विधान से गंगा पूजन करना अमोघ फलदायक होता है। गंगा स्नान करने से अशुभ ग्रहों का प्रभाव समाप्त होता है। अमावस्या के दिन तो गंगा स्नान और पितरों के निमित्त तर्पण व पिंड दान करने से सद्गति प्राप्त होती है और यही शास्त्रीय विधान भी है।

पुराणों में एक अन्य कथा के अनुसार गंगा जी भगवान विष्णु के अँगूठे से निकली हैं, जिसका पृथ्वी पर अवतरण भगीरथ के प्रयास से कपिल मुनि के शाप द्वारा भस्मीकृत हुए राजा सगर के पुत्रों की अस्थियों का उद्धार करने के लिए हुआ था, इसी कारण गंगा का दूसरा नाम भागीरथी पड़ा।

कुल मिलाकर निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन पतित पावनी मां गंगा में स्नान करने से मनुष्य के सारे पाप एवं कष्ट दूर होते हैं, इसलिए लोगों को इस अवसर का विशेष रूप से लाभ उठाना चाहिए। वैसे भी गंगा मैया मानव जाति एवं पूरी सृष्टि के लिए सर्वदृष्टि से मंगलकारी एवं कल्याणमयीं हैं।

गंगा स्नान के नियम –
गा स्नान करते समय मां गंगा को प्रणाम करके गंगा में डुबकी लगाना चाहिए। ध्यान रखें कि गंगा स्नान के समय शरीर का मैल रगड़कर गंगा में न डालें और न ही अपने कपड़ों को पवित्र गंगा में धोना चाहिए।

गंगा स्नान करने से पहले सूर्य देव और अपने ईष्ट देव का ध्यान करें, फिर मां गंगा को प्रणाम करें और गंगा में हर-हर गंगे बोलकर डुबकी लगाएं। आप चाहें तो गंगा मैया के मंत्र ‘¬ नमो गंगायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नमः’ मंत्र का जाप भी कर सकते हैं।

गंगा आपके पापों को दूर करती हैं, इसलिए गंगा में डुबकी लगाने के बाद कभी भी शरीर को पोंछना नहीं चाहिए। स्वाभाविक रूप से शरीर को सूखने दें और वस्त्र धारण करें। जन्म सूतक या मृत्यु सूतक के समय भी पवित्र गंगा का स्नान किया जा सकता है लेकिन महिलाओं को अपवित्र स्थिति में गंगा स्नान से बचना चाहिए।

गंगा स्नान के बाद मां गंगा का विधिवत पूजन करना चाहिए। उन्हें रोली, पुष्प, माला, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य आदि अर्पित करें और गंगा मंत्रों और स्तुति को पढ़ें। इसके बाद जरूरतमंदों को सामथ्र्य के अनुसार दान करना चाहिए। किसी भी तरह की गंदगी, प्लास्टिक, कूड़ा और कचरा गंगा नदी में न डालें। इससे गंगा मैली होती हैं और इसे मां गंगा का अनादर माना जाता है।

गुरु नानक जी का जन्मदिन और कार्तिक पूर्णिमा –
कार्तिक पूर्णिमा के दिन श्री गुरु नानक जी का जन्मदिन भी मनाया जाता है। गुरु नानक जी की जयंती या गुरुपूरब सिख समुदाय द्वारा मनाया जाने वाला सबसे सम्मानित दिन है। इस दिन गुरु नानक जी के जन्म को स्मरण करते हैं। इसे गुरुपूरब या गुरु पर्व के नाम से भी जाना जाता है, जिसका अर्थ है ‘गुरुओं का उत्सव’। गुरु नानक जी नैतिकता, कड़ी मेहनत और सच्चाई का संदेश देते हैं। यह दिन महान आस्था और सामूहिक भावना और प्रयास के साथ, पूरे विश्व में उत्साह के साथ मनाया जाता है। गुरु नानक जी का जीवन प्रेम, ज्ञान और वीरता से भरा था।

गुरुपुरब का महत्व –
गुरु नानक देव जी का जन्म कार्तिक मास की पूर्णिमा को हुआ था। नानक साहब के जन्म दिवस को गुरुपुरब के रूप में मनाया जाता है। गुरु नानक जी का मन बचपन से ही सांसारिक कामों में नहीं लगता था, वह अपना ज्यादातर समय प्रभु की भक्ति में बिताया करते थे। महज आठ साल की उम्र में उन्होंने स्कूल छोड़ दिया था। भगवान के प्रति उनके समर्पण को देख लोग उन्हें दिव्य पुरुष कहकर बुलाने लगे थे।

गुरु नानक जी की शिक्षा ने लोगों को सही राह दिखाई। आज भी उनकी शिक्षाएं शत-प्रतिशत सटीक साबित होती हैं। गुरु नानक जी कहते थे कि परम पिता परमेश्वर एक है, न कोई हिंदू है और न कोई मुसलमान, सभी मनुष्य एक समान हैं। नानक जी कहा करते थे कि हमेशा एक ईश्वर की उपासना करनी चाहिए। जिस व्यक्ति को खुद पर भरोसा नहीं है उसे ईश्वर पर भी भरोसा नहीं हो सकता। आज के समय में गुरु नानक जी की शिक्षाओं को अपनाने की बेहद जरूरत है।

– श्वेता वहल

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