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समुद्र मंथन से जुड़े मंदराचल पर्वत के पौराणिक साक्ष्य और वर्तमान स्थिति

admin 7 August 2021
Mandar Mountain or Mandrachal Parwat Bihar
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AJAY-SINGH-CHAUHAN__AUTHOR

अजय सिंह चौहान || मंदार यानी मंदराचल पर्वत का उल्लेख सनातन संस्कृति के तमाम महत्वपूर्ण पौराणिक ग्रंथों और धर्मगं्रथों में पढ़ने और सूनने को मिलता है। यह वही मंदार यानी मंदराचल पर्वत है जो समुद्र मंथन की एक प्रमुख पौराणिक घटना से जुड़ा हुआ है और आज भी हमारे तमाम धार्मिक ग्रंथों में सबसे खास और महत्वपूर्ण है।

समुद्र मंथन की उसी घटना के अनुसार देवताओं और असुरों ने इसी मंदार पर्वत पर वासुकी नाग को लपेट कर मंथन के लिए प्रयोग किया गया था। मंदार पर्वत के नाम से प्रसिद्ध इस पर्वत को ‘मंदराचल’ या ‘मंदर पर्वत’ के नाम से भी पहचाना जाता है। देवताओं के उस पौराणिक युग से लेकर आज तक यह पर्वत, आस्था का केन्द्र बना हुआ है।

यह पवित्र एवं प्रसिद्ध पर्वत बिहार राज्य के बाँका जिले में आज भी स्थित है। इस पर्वत की ऊंचाई इस समय लगभग 700 से 750 फुट तक बताई जाती है। हालांकि वर्तमान में इस पर्वत की ऊंचाई इतनी नहीं है जितनी की समुद्र मंथन के समय में रही होगी। इसका कारण यही बताया जाता है कि समय के साथ-साथ इस पर्वत की मिट्टी और पत्थर बारीश के पानी में ढहते चले गये जिसके कारण इसकी ऊंचाई कम होती जा रही है।

पौराणिक तथ्यों के अनुसार जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया, तो इसी मंदार पर्वत को मथनी के तौर पर प्रयोग किया था और इसी पर्वत पर वासुकी नाग को एक रस्सी की तरह लपेट कर समुद्र में उतारा गया था। इस बात के साक्ष्य के तौर पर आज भी यहां इस पर्वत के चारों तरफ धारदार लकीरें साफ-साफ दिखाई देती हैं।

Mandar Mountain or Mandrachal Parwat Biharदूर से देखने पर लगता है जैसे किसी गाड़ी के टायर के गुजरने के निशान नजर आते हैं। पर्वत के चारों तरफ प्राकृतिक रूप से ये लकीरें एक दूसरे से करीब छह फुट की दूरी पर बनी हुई हैं। साक्ष्य के तौर पर यहां कोई भी बता सकता है कि ये निशान किसी भी तरह से मानव निर्मित नहीं हैं, क्योंकि पर्वत के चारों तरफ की ये प्राकृतिक रूप से बनी लकीरें समुद्र मंथन के दौरान वासुकी के शरीर की रगड़ से बने निशान हैं।

जबकि इसी पर्वत के ऊपर एक ऐसा शंख-कुंड़ भी है जो अपने नाम के अनुसार ही किसी विशाल आकार वाले शंख की आकृति में दिखाई देता है। इस कुंड के बारे में भी कहा जाता है कि भगवान शिव ने इसी महाशंख से विष-पान किया था।

इस पर्वत के बारे में एक और पौराणिक तथ्य बताया जाता है, जिसके अनुसार, एक बार भगवान विष्णुजी के कान के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो भाईयों का जन्म हुआ था। लेकिन उन दोनों भाईयों का उत्पात धीरे-धीरे इतना बढ गया कि समस्त देवता इनसे डरने लगे थे।

मधु और कैटभ का उत्पात खत्म करने के लिए भगवान विष्णु को उनसे युद्ध करना पड़ा। कहा जाता है कि मधु का अंत करने में विष्णुजी परेशान हो गये थे। लेकिन अंत में विष्णु जी ने उसका सिर काट कर उसे इसी मंदार पर्वत के नीचे दबा दिया, और उसकी वीरता से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसके सिर की आकृति पर्वत पर बना दी।

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कहा जाता है कि आज भी इस पर्वत पर जिस मधु नामक राक्षस के सिर की उस आकृति को पूजा जाता है वह वही आकृति है जिसे स्वयं भगवान विष्णु ने अपने हाथों से बनाई थी। यहां आने वाले भक्तों के लिए वह आकृति दर्शनीय स्थल बन चुकी है।

यदि हम ‘मंदराचल पर्वत’ के उन पौराणिक साक्ष्यों और वर्तमान स्थिति के बारे में बात करें तो प्रसिद्ध इतिहासकार श्री विजयेन्द्र कुमार माथुर ने वाल्मीकि रामायण के आधार पर अपनी पुस्तक में मंदार पर्वत का जिक्र करते हुए लिखा है कि वाल्मीकि रामायण के ‘किष्किंधा काण्ड’ में सुग्रीव ने सीता माता की खोज के लिए पूर्व दिशा में अपनी वानर-सेना को भेजते हुए वहां के स्थानों के वर्णन में मंदर नामक पर्वत का भी उल्लेख किया था।

सुग्रीव ने अपने उल्लेख में कहा था कि- जो पर्वत या बंदरगाह समुद्रतट पर स्थित हों या जो स्थान मंदर के शिखर पर हों वहां भी सीता माता की खोज करना। इसी श्लोक के बाद अगले श्लोक में द्वीप निवासी किरातों का जिक्र किया गया है जो संभवतः अंडमान निवासियों के बारे में बताया जाता है। श्री विजयेन्द्र कुमार माथुर लिखते हैं कि सुग्रीव द्वारा बताई गई उस स्थिति के अनुसार मंदर ब्रह्मदेश या बर्मा के पश्चिमी तट की पर्वत श्रेणी के किसी भाग का नाम हो सकता है।

हालांकि, श्री विजयेन्द्र कुमार माथुर ने महाभारत के साक्ष्य के तौर पर ‘मंदराचल पर्वत’ की वर्तमान स्थिति के बारे में यह भी लिखा है कि मंदराचल पर्वत का पांडवों की उत्तराखंड की यात्रा के संबंध में उल्लेख है जिसके अनुसार यह पर्वत हिमालय में बद्रीनाथ या कैलाश के निकट कहीं पर हो सकता है जो वर्तमान में शायद गिरि-श्रंग के नाम से पहचाना जाता है।

इसके अलावा, श्री विष्णु पुराण में ‘मंदराचल पर्वत’ को इलावृत के पूर्व में कहीं बताया गया है। और अन्य पुराणों में क्षीरसागर-मंथन की कथा में भी इसका वर्णन है। लेकिन, अधिकतर जानकारों एवं अन्य अनेकों तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर सबसे अधिक बिहार के इसी ‘मंदार पर्वत’ का जिक्र आता है।

पुरातत्ववेत्ताओं ने भी इस रहस्य से पर्दा उठाते हुए बिहार के इसी मंदर पर्वत को सनातन संस्कृति के लिए वहां मौजूद साक्ष्यों के आधार पर एक महत्वपूर्ण और पवित्र स्थान माना है। पुरातत्ववेत्ताओं का कहना है कि मंदार पर्वत पर मौजूद अधिकांश मूर्तियाँ उत्तर गुप्त काल के समय की हैं। इसके अलावा मंदार के सर्वोच्च शिखर पर एक ऐसा मंदिर भी है, जिसमें स्थित एक पत्थर पर पवित्र पद-चिह्न अंकित है।
हालांकि मंदार पर्वत पर मौजूद इस पद-चिह्न के बारे में पुरातत्ववेत्ताओं ने कुछ खास नहीं बताया है लेकिन, पौराणिक तथ्यों के आधार पर माना जाता है कि ये पद चिह्न स्वयं भगवान विष्णु के ही हैं। जबकि, जैन धर्म के उपासक मानते हैं कि ये पद-चिह्न प्रसिद्ध तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य के चरण चिह्न हैं।

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बहरहाल जो भी हो, मंदार पर्वत पर मौजूद एक ही पदचिह्न पर दो संप्रदायों के अपने-अपने मत हैं और दोनों ही के लिए ये पदचिह्न महत्वपूर्ण भी हैं। लेकिन, यहां ध्यान देने वाली बात ये हैं कि ये दोनों ही संप्रदाय गंगा-जमुनी तहजीब से एक दम विपरीत स्वभाव के हैं इसलिए यह कोई बहुत बड़ा विवाद का विषय न तो कभी रहा है और ना ही आगे भी रहने वाला है। बल्कि ये चरण चिह्न तो दो संप्रदायों के संगम के रूप में भी प्रसिद्ध हैं।

मंदार पर्वत पर मौजूद इन पवित्र चरण चिह्नों के अलावा पूरे पर्वत पर यहां-वहां बिखरी तमाम सुंदर लेकिन खंडित मूर्तियाँ हैं, जिनमें भगवान शिव, भगवान नरसिंह, देवी महाकाली, सिंह वाहिनी माता दुर्गा सहीत और भी कई देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ प्रमुख हैं जो यहां के मुगलकालीन इतिहास को दर्शातीं हैं।

बिहार के बांका जिले में मौजूद इस मंदार पर्वत पर बिखरी इन मूर्तियों के अलावा यहां से दो ऐसे शिलालेख भी प्राप्त हुए हैं जो गुप्त नरेश आदित्यसेन के समय के बताये जाते हैं। इन शिलालेखों से जान पड़ता है कि राजा हर्ष की मृत्यु के पश्चात हुए राजनीतिक उथल-पुथल से मगध में गुप्त राजाओं के वंशज शक्तिशाली हो गए थे और आदित्यसेन स्वतंत्र राजा के रूप में राज करने लगा था।

इसके अलावा यहां से प्राप्त भगवान विष्णु की एक चतुर्भुज रूप में प्रतिमा और भैरवनाथ जी की प्रतिमा भी है जो भागलपुर के संग्रहालय में मौजूद हैं। मंदार के सर्वोच्च शिखर पर मौजूद अधिकांश मूर्तियाँ के बारे में बताया जाता है कि ये मूर्तियां उत्तर गुप्त काल के उस दौर की हैं जब इस काल में मूर्तिकला काफी उन्नत हुआ करती थी।

हालांकि यह क्षेत्र धार्मिक और पर्यटन के लिहाज से विकसित किया जा सकता है। क्योंकि यह संपूर्ण क्षेत्र पौराणिक इतिहास के साथ-साथ अपनी समृद्ध आदिवासी संस्कृति और हस्तशिल्प और हथकरघा के लिए भी देशभर में जाना जाता है। बावजूद इसके यह क्षेत्र आज भी उपेक्षा का शिकार दिखता है। स्वच्छ जलवायु, पानी और स्थानीय निवासियों के साधारण एवं सरल व्यवहार को देखते हुए इसे जितना जल्दी हो राज्य सरकार द्वारा तीर्थ एवं पर्यटन के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।

प्रसिद्ध और पवित्र ‘मंदार पर्वत’ यानी ‘मंदराचल पर्वत’ बिहार राज्य के बांका जिले के बौंसी गाँव में स्थित है। बांका तक जाने के लिए रेल और बस जैसी दोनों ही जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हैं। भागलपुर से एक सड़क देवघर की ओर जाती है। इसी सड़क पर भागलपुर से करीब 56 किमी की दूरी पर बौंसी नाम का एक गाँव आता है। इसी गांव से करीब 8 किमी दूर प्राकृतिक सुंदरता से ओतप्रोत एक पवित्र और सुंदर पहाड़ी के दर्शन होते हैं जिसका नाम है ‘मंदार पर्वत’। इस पर्वत से कुछ ही दूरी पर बिहार और झारखण्ड की सीमा भी लगती है।

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