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वेदों में भी इतिहास की भरमार है

admin 19 March 2025
Indravijay An Old Book in Hindi Translation

Indravijay An Old Book in Hindi Translation

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आज जब हम प्राचीन भारत का इतिहास  (real History of world in Vedas and Puranas) छात्रों को पढ़ाते हैं तो सिंधुघाटी सभ्यता से या वेदों से प्रारम्भ करते हैं। क्या उससे पूर्व भारत का इतिहास नहीं था? यदि वेद एक विकसित सभ्यता की परिणति हैं तो अवश्य ही उनसे पूर्व भी हमारा कुछ इतिहास रहा होगा। वह कैसा था? हम अपना इतिहास कहां से शुरू करें ? इस बात पर पिछली एक सदी से बहुत शास्त्रार्थ हुए हैं कि वेदों में इतिहास या नहीं। वेदों में इन्द्र के द्वारा पुरों का भेदन, दाशराज्ञ (सुदास् आदि दस राजाओं के) युद्ध, शुनःशेप, हरिश्चन्द्र, याज्ञवल्क्यादि के संवाद आदि अनेक घटनाएं वर्णित हैं। क्या वह इतिवृत्तात्मक घटनाओं का उल्लेख है ? लगता तो यही है पर इसमें एक कठिनाई आती है।

हम वेदों को अनादि और अपौरुषेय मानते हैं। वे ईश्वर की वाणी हैं और नित्य हैं। “अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयंभुवा” (महाभारत)। यदि यह मानें कि उनमें कोई घटनाएं वर्णित हैं तो यह सिद्ध होगा कि इस वर्णन से पहले कुछ घटनाएं हुई थीं अर्थात् ये ऋचाएं उन घटनाओं के बाद की हैं तो फिर वेद अनादि कैसे हुए? इस दृष्टि से वेदों में इतिहास  (real History of world in Vedas and Puranas) मानते ही ईश्वरकर्तृत्व और स्वयंभूत्व स्वतः खण्डित हो जाता है। परंपरा तो वेद को अपौरुषय ही मानती रही है पर बहुत से मनीषियों ने जो बुद्धिवादी और तार्किक थे, उसे एक दृष्टि से पौरुषेय माना है, कुछ ने अनादि नहीं माना है। उनके मत में तो इतिहास होना वेदों में संगत बैठ जाता है । कणाद ने कहा है “ बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे”, “ब्राह्मणेषु संज्ञाकर्म सिद्धिलिंगम्”। वाक्य तभी बन सकते हैं जब कोई बुद्धिपूर्वक उनकी रचना करे। तब वे अपौरुषेय कैसे हुए? जब हम ब्राह्मणों को भी वेद मानते हैं और वे ऐतरेय, तैत्तिरीय आदि नाम से ऋषियों द्वारा निर्मित बताये गये हैं तो स्वतः वे ऋषिकर्तृक हुए न ? क्यों न उन्हें ऋषिप्रणीत मान लें ? किन्तु हमारी परंपरा तो उन्हें अनादि और अपौरुषेय मानती है। जिन ऋषियों को जो विद्या सिद्ध हुई उनका नाम उसके साथ जुड़ गया। ऋषि केवल मंत्रद्रष्टा कहे जाते हैं, निर्माता नहीं। फिर उनमें इतिहास कैसे बताया जा सकता है? या तो उन्हें पौरुषेय ही मान लो या उनमें से इतिहास निकाल लो। इस गुत्थी को सुलझाना बड़ा कठिन है।

क्या वेदों में इतिहास है?
आर्य-समाजियों ने जो वेदों को अनादि, सृष्टि से पूर्व अवतीर्ण और ईश्वर की प्रथम वाणी मानते हैं, जोर देकर यह सिद्ध किया है कि वेदों में इतिहास (real History of world in Vedas and Puranas) बिल्कुल नहीं है। इन्द्र का, सुदास् आदि राजाओं का जो उल्लेख है वह देवताओं का, ईश्वर का या विभिन्न वैज्ञानिक तत्त्वों का प्रतीकात्मक वर्णन है, इतिहास नहीं । महर्षि दयानन्द ने इसका पूरा विवेचन करते हुए यहां तक सिद्ध किया है कि गंगा यमुना आदि का जो उल्लेख है वह भी नदियों के नाम नहीं हैं बल्कि इडा पिंगला आदि नाड़ियों के नाम हैं। किन्तु इन्द्र आदि के युद्धवर्णन, ऋषियों के संवाद, शुनःशेप आदि की गाथाएं, देवों के अनेक पराक्रम-वर्णन तथा वेदों के अन्य स्थल ऐसे हैं जिनमें इतिहास माने बिना काम नहीं चलता। इस पर विद्वानों ने बहुत विचार मंथन किया है और गुत्थी को सुलझाने के अनेक मार्ग निकाले हैं। हजारों पृष्ठ इस पर लिखे गये हैं।

स्वयं महर्षि जैमिनि को यह द्वन्द्व खला था। वे यह मानने के बहुत पक्षधर हैं कि वेद नित्य हैं अतः उनमें मनुष्यचरित्र का उल्लेख नहीं है। पर कहीं राजाओं आदि के नाम पाये जाते हैं तो वह क्या है? वे कहते हैं वह अलग ही चीज है। किसी का नाम सूर्यनारायण हो तो वह सूर्य थोड़े ही हो गया। उनके दो सूत्र बहुत उद्धृत हैं — पूर्वपक्ष का अनित्यदर्शनाच्च” और सिद्धान्त का “ परन्तु श्रुतिसामान्यमात्रम्”। वेदों के भाष्यकार इन दोनों मार्गों के बीच भटकते रहे हैं।

शबरस्वामी ने कहा है कि बबर: प्रावाहणि: (जिसे सामान्यतः प्रवाहणपुत्र बबर का व्यक्तिनाम माना जाता है) आदि नाम जहाँ दिखलायी दें उन्हें वायु आदि तत्त्वों का वाचक मानो। बबर किसी का नाम नहीं है ब-ब करके बहने वाली वायु का नाम है। सायण ने भी वेदों को नित्य माना है पर भाष्य करते हुए अंगिरा को केवल तत्त्व न मानकर ऋषि (वंशपुरुष) भी मान लिया है। इन गुत्थियों को सुलझाने का एक मार्ग तो यह निकाला गया कि किसी अन्य कल्प में ये नाम और घटनाएं रही होंगी, उनका उल्लेख अब किया गया है किन्तु इससे भी वेदों का अनादित्व खण्डित हो जाता है।

दूसरा दिलचस्प समाधान यह निकाला गया कि ईश्वर त्रिकालदर्शी होता है इसलिए उसने भविष्य की बातें पहले से ही बता दी थीं। वही इतिहास वेदों में है याने वह भूतकाल नहीं, भविष्यत् काल है। म.म.पं. गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी आदि विद्वानों ने इसी प्रकार के समाधान करते हुए परम्परा और शोधदृष्टि, दोनों में समन्वय किया है। किसी न किसी प्रकार का समन्वय किये बिना मार्ग नहीं निकल सकता। वेदों में भूतकाल जगह जगह पर है जज्ञे वसिष्ठः” “ददर्श वाचम्” इत्यादि में लिट् लकार है। पर पाणिनि आदि उसे सामान्य-वाचक मानते हैं, वह भविष्य-वाचक भी हो सकता है, वर्तमानकालवाची भी। आर्यसमाजी विद्वान् उसे वर्तमान काल मानते हैं। वेदभाष्यकार स्कन्दस्वामी भी ऐसा मानते हैं।

आर्यसमाज को वेद में इतिहास देखना बिल्कुल पसन्द नहीं। श्रीपाद दामोदर सातवलेकर प्रथमतः आर्य समाज के भी मान्य विद्वान् थे। उन्होंने वेदों में इतिवृत्त का विवेचन कर दिया। इस पर जयदेव विद्यालंका आदि विद्वानों ने उनके खण्डनपरक अनेक ग्रन्थ लिखे।

ओझा जी की इतिहासदृष्टि
इस गुत्थी को सुलझाने के लिए “इंद्रविजय – भारतवर्षीयायोरपाख्यानम” शीर्षक से पुस्तक के रचियता पण्डित मधुसूदन ओझा जी ने क्या मार्ग अपनाया यह देखने पर उनकी प्रतिभा का कायल हुए बिना नहीं रहा जा सकता। उन्होंने इस प्रसंग में पूर्णत: शोधात्मक और वैज्ञानिक दृष्टि अपनाई है। यह सर्वविदित है कि उनका बहुत बड़ा अवदान है वेदों में विज्ञान की स्थापना तथा इस बात का सुसंगत विवेचन कि वेद में किस प्रकार सृष्टिविद्या आई है, भृगु, अंगिरा आदि ऋषिनाम तथा इन्द्र, मित्र, वरुण आदि देवनाम किस प्रकार वैज्ञानिक तत्त्वों के प्रतीक हैं। उन्होंने इसका सुसंबद्ध शास्त्र संकलित कर एक नया युग ही शुरू कर दिया था । इन्द्र आदि देवों एवं अन्य व्यक्ति- नामों तथा गंगा यमुना आदि नदियों को वैज्ञानिक तत्त्व बताने वाले स्वामी दयानन्द यदि यह सब देखते तो हर्षित हुए बिना नहीं रहते।
मधुसूदन जी ने जब अध्ययन शुरू किया उसी के आस पास दयानन्द का निधन हो गया (१८८३) । दोनों के समयों में इतना सा ही अन्तर है। ओझा जी ने जिस प्रकार विज्ञान की स्थापना करके वेदों की व्याख्या को नई दिशा दी उसी प्रकार इतिहास की स्थापना करके भी एक नया मार्ग निकाला। पं. गिरिधर शर्मा ने उनके दो अवदान माने हैं, विज्ञान की स्थापना और इतिहास की स्थापना । विज्ञान की स्थापना की जितनी चर्चा हुई है उतनी इतिहासदृष्टि के बारे में नहीं हो पायी। उसे यदि देखा जाए तो मधुसूदन जी का कृतित्व उसमें भी उतना ही अद्भुत सिद्ध होगा।
संभवतः इतिहासदृष्टि को वेदव्याख्यान में समायोजित करने के फलस्वरूप ही उन्होंने वेद के अपौरुषेयत्व पर भी अनेक पक्ष विवेचित किये। अपने ग्रन्थों में इस प्रकार के ४२ पक्ष उन्होंने बताये हैं और सबका समन्वय किया है। वे कहते हैं कि वेद स्वयं ईश्वर हैं क्योंकि ईश्वर ज्ञानरूप है। दूसरी ओर वेद ईश्वरप्रणीत भी हैं । ज्ञान के रूप में वेद अपौरुषेय हैं किन्तु वर्णाक्षरमय वाणी के रूप में ऋषिप्रणीत । इसी प्रकार ऋषि प्राणों के या तत्त्वों के वाचक हैं। भृगु, अंगिरा आदि ऋषि विभिन्न तत्त्वों के स्वरूप तो उन्होंने बताये ही हैं, उन तत्त्वों के विवेचक महर्षियों का नाम भी उन्हीं पर पड़ा इसलिए ये ऋषिनाम भी हैं, यह भी उन्होंने माना है। इस प्रकार का व्यापक मार्ग सर्वत्र अपनाने के कारण उन्होंने दोनों पक्षों का भली भांति समन्वय स्थापित कर दिया है। ठीक यही दृष्टि उन्होंने इतिहास वाली गुत्थी के लिए भी अपनायी है। उन्होंने इन्द्र, वरुण आदि को वैज्ञानिक तत्त्व मानकर जो विस्तृत विवेचन किया है उनके साथ यह नहीं भूले हैं कि ये देवों के नाम भी थे।
वेदों का आधुनिक अध्येता पाश्चात्य विद्वानों के विवेचनों को पढ़कर यह जान जाता है कि इन्द्र के बारे में किस किस प्रकार के वर्णन आते हैं । इन्द्र के लिए सैकड़ों सूक्त ऋग्वेद में हैं । उनमें ‘वृत्र’ नामक असुर (जो ड्रैगन के रूप में वर्णित है) का उसने संहार किया, पर्वतों के पंख काटे, ये सब वर्णन आते हैं । मधुसूदन जी ने इन्द्र और वृत्र को वैज्ञानिक तत्त्वों के रूप में तो विवेचित किया ही किन्तु यह भी सोचा कि क्या ये सारे वर्णन वैज्ञानिक तत्त्वों के प्रतीकों के रूप में घटाये जा सकते हैं? कुछ अतिवादी विद्वानों ने शायद ऐसा किया हो पर यह संभव नहीं है । जो वेदों में इतिहास बिल्कुल नहीं मानते उनकी समस्याएं इसी से बढ़ती हैं।
महर्षि यास्क को भी लगा था कि इन्द्र, वृत्र आदि आधिदैविक तत्त्व अवश्य होंगे किन्तु उनकी जो घटनाएं वेदों में वर्णित हैं वे इतिहास में कहीं न कहीं अस्तित्व रखती होंगी। तभी उन्होंने कहा था कोऽयं वृत्र इति । त्वाष्ट्रोऽसुर इत्यैतिहासिकाः । मेघ इति नैरुक्ता: ।” (वृत्र मेघ का प्रतीक है यह बुद्धिवादियों का और एक असुर था यह ऐतिहासिकों का कथन है ।) मधुसूदन जी तो सनातनी परंपरा के पक्षधर थे अतः वेदों के साथ- साथ पुराणों को भी प्रामाणिक मानते थे। आर्य समाजियों की तरह उन्हें कल्पित नहीं मानते थे ।
साभर – पुस्तक “इंद्रविजय” की भूमिका से।

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