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स्व परिवार एवं स्वदेशी की तरफ बढ़ता रुझान…

admin 7 October 2021
Indian Polatics and Family profits
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कोई भी समस्या, उपलब्धि या विषय हो, उसके दो पहलू होते हैं। हर चीज का नकारात्मक एवं सकारात्मक पहलू होना स्वाभाविक भी है। इसी प्रकार यदि कोई भी कार्य किया जाये तो लाभ-हानि दो पहलू होते ही हैं। उदाहरण के तौर पर देखा जाये तो भारत की विशाल जनसंख्या एक तरफ समस्या है तो दूसरी तरफ वही हमारे लिए पूंजी भी है। आज इसी विशाल जनसंख्या के कारण पूरी दुनिया भारत को बाजार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए तड़पती रहती है। इसी जनसंख्या के कारण भारत का पूरे विश्व में दबदबा भी है।आज आधुनिक युग में भारत सहित पूरे विश्व में तकनीकी सामान एवं सुविधाएं विकास की प्रतीक हैं तो इन्हीं में विनाश के भी बीज छिपे हुए हैं। इसी प्रकार यदि देखा जाये तो कोरोना काल में बहुत सी अच्छी-बुरी बातें देखने एवं सुनने को मिलीं। बुरी बातों की यदि चर्चा की जाये तो कोरोना काल में कुछ लोगों ने परेशान लोगों की मजबूरी का जमकर लाभ उठाया तो तमाम ऐसे भी लोग थे जिन्होंने कोरोना काल में लाचार एवं परेशान लोगों की भरपूर सेवा कर खूब पुण्य लाभ भी कमाया। विगत डेढ़ वर्षों से अधिक समय में यह देखने को मिला कि लोगों का स्व परिवारों की तरफ रुझान बहुत तेजी से बढ़ा है। स्व परिवारों से आशय मेरा इस बात से है कि अपने बीबी-बच्चों के साथ सास-ससुर एवं मां-बाप के साथ रहकर घर-गृहस्थी को आगे बढ़ाने में तमाम लोगों का रुझान बढ़ा है।

कोरोनाकाल में देखने को मिला कि जो परिवार एकल थे यानी जो परिवार मैं, मेरी पत्नी और मेरे बच्चे तक सीमित था। इसे एकल परिवार भी कहा जा सकता है। ऐसे तमाम परिवारों में देखने को मिला कि पति-पत्नी में से यदि कोई एक भी कोरोना से पीड़ित हो गया तो बच्चों के पालन-पोषण की बहुत बड़ी समस्या उत्पन्न हो गई। ऐसी स्थिति में बच्चों को या तो नौकरों के भरोसे छोड़ना पड़ा या फिर दादा-दादी, नाना-नानी एवं किसी अन्य रिश्तेदार-परिजन के पास भेजना पड़ा। वर्तमान दौर में तमाम परेशानियों, परिवार के प्रत्येक सदस्य की महत्वाकांक्षाओं एवं असीमित आजादी की इच्छा के कारण संयुक्त परिवारों में रहना संभव नहीं हो पा रहा है तो ऐसे वातावरण में भी लोग यदि अपने मां-बाप एवं सास-ससुर के साथ रहने के लिए विवश या उत्सुक हैं तो यह भी अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है और इसे यदि स्व परिवार कहा जाये तो अत्यंत उपयुक्त होगा।

स्व परिवार यानी मैं, मेरी पत्नी और मेरे बच्चों के साथ मां-बाप और सास-ससुर जुड़ जायें तो परिवार का सामाजिक ताना-बाना फिर से मजबूत होने लगेगा। एक साथ मां-बाप एवं सास-ससुर शब्द लिखने का मेरा भाव बहुत व्यापक एवं निहायत ही पवित्र है।

उदाहरण के तौर पर यदि किसी घर में दो वरिष्ठ सदस्य हैं तो वे बच्चों के दादी-दादा या नाना-नानी हो सकते हैं। बच्चों के मां-बाप के लिए वे मां-बाप एवं सास-ससुर भी हो सकते हैं और इन वरिष्ठ लोगों के लिए बच्चों के मां-बाप वक्त के मुताबिक बेटी-दामाद एवं बहू-बेटा भी हो सकते हैं। यह सब लिखने का मेरा आशय मात्र इतना ही है कि कोरोना काल में तमाम लोगों में यदि इन रिश्तों को अपनाने एवं निभाने की ललक एवं रुझान बढ़ी है तो इसे निश्चित रूप से बहुत ही सकारात्मक रूप में लेना चाहिए और ऐसी सकारात्मक चीजों को अनवरत आगे बढ़ाते रहने की आवश्यकता है।

विश्व में शांति और समस्याओं का समाधान केवल भारतीय दर्शन से ही संभव…

बात सिर्फ परिवार तक ही सीमित नहीं है बल्कि तमाम लोगों को कोरोना ने व्यावहारिक धरातल पर आकर मानव के रूप में जीवन जीने के लिए मजबूर कर दिया है। हमारी सभ्यता-संस्कृति में बड़े-बुजुर्ग अपने बच्चों, परिवार के लोगों एवं अन्य लोगों को हमेशा यही समझाते रहते हैं कि किसी बात का अहंकार मत करो, क्योंकि ईश्वर का भोजन ही अहंकार है। हमें ऐसी तमाम कहानियां देखने-सुनने को मिलती रहती हैं कि बड़े से बड़े लोगों का अभिमान तोड़ने के लिए ईश्वर को धरती पर आना पड़ा है। मानव का अहंकार तोड़ने की तो बात अलग है, समय-समय पर जब देवताओं को अहंकार हुआ है तो उनके भी अहंकार के पतन के लिए नारायण को विभिन्न रूपों में सामने आना पड़ा है।

उदाहरण के तौर पर लोगों को समझाने के लिए हमारे समाज में सर्वत्र यह बताया जाता है कि रावण, कंस, बाली, दुर्योधन जैसे महाबलियों के अहंकार का अंत हुआ तो वहीं यह भी बताया एवं समझाया जाता है कि प्रभु श्रीराम को अयोध्या का राजा बनना था किन्तु उन्हें वन में जाना पड़ा, माता जानकी एक राजा की पुत्री थीं और एक राजा की पुत्र वधू किन्तु वक्त का तकाजा देखिये कि उन्हें भी वन को जाना पड़ा।

यह सब कहने एवं लिखने का आशय यही है कि वक्त के साथ कोई भी व्यक्ति कितना ही समर्थ एवं सक्षम क्यों न हो किन्तु जब उसके अन्याय, अधर्म, अनीति एवं अहंकार का घड़ा भर जाता है तो वह फूटता ही है और यहीं से उसकी दुर्दशा प्रारंभ होती है। हमारी सनातन संस्कृति में इसे ही कुदरत यानी ऊपर वाले का न्याय कहा जाता है।

हमारे समाज में एक कहावत बहुत प्रचलित है कि ऊपर वाले की लाठी में आवाज तो नहीं होती है किन्तु उसकी मार बहुत तेज होती है यानी इस कोरोना काल में यह बात तमाम लोगों के मन में बहुत अच्छी तरह बैठ गई कि ईश्वर ने यदि उन्हें सक्षम एवं समर्थ बनाया है तो अपने परिवार के साथ-साथ गरीबों, लाचारों, असहायों के प्रति भी दया एवं मानवता का भाव रखना चाहिए। ये सभी बातें हमारी सनातन संस्कृति में कही एवं बतायी गई हैं। आवश्यकता सिर्फ इस बात की है कि हम सभी उन बातों को जानें-समझें और उस पर अमल भी करें।

सनातन संस्कृति में तमाम उदाहरण कदम-कदम पर हमें भटकने से न सिर्फ रोकते हैं बल्कि सद्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित भी करते हैं और यह सीख मिलती है कि अंततोगत्वा मानव का लक्ष्य ‘नर सेवा ही-नारायण सेवा’ का होना चाहिए।

इन सभी बातों के अतिरिक्त यदि देखा जाये तो कोरोना ने भारतीयों को स्वदेशी यानी अपनी सनातन जीवनशैली की तरफ वापस लौटने के लिए प्रेरित एवं विवश किया है। योग, अध्यात्म, आयुर्वेद, आचार-विचार, रहन-सहन एवं अन्य तमाम बातें जिन्हें हम अपना यानी स्वदेशी मानते एवं समझते हैं, की तरफ आकर्षण बढ़ा है। कोरोनाकाल में जब पूरी दुनिया विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइड लाइन्स और उसके प्रोटोकाल को फाॅलो कर रही थी तो उसी समय भारतीयों को भली-भांति यह समझ में आ गया कि अपनी सनातन संस्कृति, सनातन जीवनशैली या यूं कहें कि सर्व दृष्टि से ‘स्वदेशी’ की तरफ पूर्व रूप से आये बिना कल्याण नहीं है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की गाइड लाइन्स एवं प्रोटोकाल का तो भारतीयों ने पूरी तरह पालन किया ही, साथ ही साथ अपनी जड़ों की तरफ बहुत तेजी से बढ़े और इतनी विशाल आबादी होने के बावजूद कोरोना जैसी वैश्विक संक्रामक बीमारी से निपटने में न सिर्फ कामयाबी मिली बल्कि भारत से पूरी दुनिया को बहुत कुछ सीखने को मिला। अपनी जड़ों की तरफ लौटने का स्पष्ट रूप से प्रभाव पूरी दुनिया को पता चल चुका है।

भारत में यदि कोई व्यक्ति भयंकर परेशानी एवं विपत्ति में घिर जाये तो भी वह अपने कष्ट को यह सोचकर हल्का कर लेता है कि ईश्वर ने यदि इतना भयंकर कष्ट दिया है तो वही इससे उबारेगा भी। वैसे भी भारतीय समाज में एक बहुत पुरानी कहावत प्रचलित है कि ‘जीवन-मरण, हानि-लाभ, यश-अपयश’ सब विधि हाथ यानी जीवन-मृत्यु, नफा-नुकसान और यश-अपयश सब ऊपर वाले के हाथ में है। इन सब बातों को लेकर विभिन्न रूपों में व्यापक स्तर पर बहस हो सकती है किन्तु इतना निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि परेशान से परेशान एवं हताश-निराश व्यक्तियों के समक्ष यदि सनातन संस्कृति की प्रेरणादायी बातों की चर्चा की जाती है तो व्यक्ति में परेशानियों एवं विपत्तियों से न सिर्फ लड़ने की इच्छा प्रबल होती है बल्कि उसका जीवन के प्रति नजरिया भी सकारात्मक होता जाता है।

हमारी सनातन संस्कृति कितनी महान है कि पूजन, हवन, कीर्तन, सत्संग, ईश्वर में आस्था, प्रकृति ही ईश्वर है आदि अनेक धारणाएं और मान्यताएं ऐसी हैं जो आज के आधुनिक युग में भी महत्वहीन नहीं हैं बल्कि अपने आप में पूर्ण हैं, वैज्ञानिक हैं। भले ही हम अपनी अज्ञानतावश उन्हें न समझ पायें।

इसे एक उदाहरण के माध्यम से जाना एवं समझा जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति बीमार होकर बिस्तर पर पड़ा हो और उसके घर-परिवार वाले इस बात का इंतजार कर रहे हों कि उस व्यक्ति को ईश्वर मुक्ति दे और उसे अपने पास बुला ले किन्तु वह व्यक्ति सांसारिक मोह-माया में इतना अधिक फंस चुका है कि वह अपना प्राण त्याग नहीं पा रहा है। ऐसी स्थिति में हमारी संस्कृति में ऐसी मान्यता है कि ऊपर वाले की भी यही इच्छा होती है कि अंतिम समय में यानी बैकुंठलोक की यात्रा पर जाते समय व्यक्ति सांसारिक मोह-माया से अपने आप को मुक्त कर ले।

अपनी संस्कृति में किसी व्यक्ति को मोह-माया से मुक्ति के लिए भागवत कथा सुनाने की व्याख्या की गई है। ऐसे व्यक्ति को यदि भागवत कथा सुना दी जाती है तो वह या तो मोह-माया से विरक्त होकर बैकुंठलोक को चला जाता है या स्वस्थ हो जाता है। अपने समाज में ऐसे तमाम उदाहरण देखने एवं सुनने को मिलते रहते हैं कि जब व्यक्ति भागवत कथा सुनकर सांसारिक मोह-माया से विरक्त होकर प्राण त्याग देता है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि कोरोना के भले ही तमाम नकारात्मक पहलू रहे हैं किन्तु इसका लाभ भी कम नहीं हुआ है। लाभ की दृष्टि से यदि देखा जाये तो चाहे स्व परिवारों की तरफ रुझान हो, स्वदेशी की तरफ आकर्षण हो या अपनी गौरवमयी सनातन संस्कृति को जानने-समझने और उस पर अमल करने की बात हो, इन सब की तरफ वापस आने के लिए कोरोना ने मार्ग प्रशस्त किया है और जिन लोगों को यह लगता था कि सिर्फ पैसे के दम पर वे सब कुछ अपनी मुट्ठी में कर लेंगे, उनका भी अहंकार एवं भ्रम टूटा है, आगे भी टूटता रहेगा और लोगों की समझ में यह भी आने लगा है कि जीवन का रहस्य, महत्व, सनातन संस्कृति की महानता और सत्य क्या है! द

– अरूण कुमार जैन (इंजीनियर)
(राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य- भाजपा, पूर्व ट्रस्टी श्रीराम-जन्मभूमि न्यास एवं पूर्व केन्द्रीय कार्यालय सचिव भा.ज.पा.)

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