Monday, May 11, 2026
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कंस पूर्व जन्म में क्या था…

अजय सिंह चौहान | श्रीगर्गसंहिता के छठे अध्याय के अनुसार मिथिला के राजा बहुलाश्व नारद जी से प्रश्न करते हैं कि भगवान श्री कृष्ण के मामा और महान बल एवम् पराक्रम से संपन्न कंस पहले किस दैत्य के नाम से विख्यात था? आप इसके पूर्व जन्म और कर्मों का विवरण मुझे सुनाईये।

इसके उत्तर में नारद जी राजा बहुलाश्व को बताते हैं कि समुद्र मंथन के अवसर पर महान असुर कालनेमि ने भगवान विष्णु के साथ युद्ध किया। उस युद्ध में भगवान ने उसे बलपूर्वक मार डाला। उस समय शुक्राचार्य जी ने अपनी संजीवनी विद्या के बल से उसे पुनः जीवित कर दिया। उसके बाद से ही वह पुनः भगवान विष्णु से युद्ध करने के लिए लालायित था और तैयारी भी कर रिहा था।

उस तैयारी के अंतर्गत वह असुर कालनेमि मन्दराचल पर्वत के समीप तपस्या करने लगा। प्रतिदिन दूब अर्थात घास का रस पी कर उसने ब्रहमा जी की आराधना की। हजारों वर्ष आराधना के बीत जाने पर ब्रहमा जी उसके पास गये। उस समय कालनेमि के शरीर में केवल हड्डियां ही रह गई थीं और उस पर दीमकें चढ़ गई थीं।

ब्रहमा जी ने उससे कहा – वर मांगो। उस महान असुर कालनेमि ने ब्रहमा जी से वरदान मांगा कि इस ब्रह्मांड में जो-जो भी महाबली देवता स्थित हैं उन सब के मूल भगवान विष्णु हैं। और विष्णु सहित उन संपूर्ण देवताओं में से किसी के भी हाथ से मेरी मृत्यु न हो।

इस पर ब्रहमा जी ने उस दैत्य से कहा – तुमने जो यह उत्कृष्ट यानी असाधारण वरदान मांगा है वह तो अत्यंत ही दुर्लभ है। इसलिए इस समय तुमको मैं यह वरदान नहीं दे सकता, किंतु किसी दूसरे समय में तुम्हें यह प्राप्त हो सकता है, इस लिए तुम्हें एक लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। मेरी वाणी कभी झूठी नहीं हो सकती।

इसके बाद नारद जी राजा बहुलाश्व को आगे बताते हैं कि फिर वही कालनेमि नामक असुर पृथ्वी पर उग्रसेन की स्त्री पद्मावती के गर्भ से उत्पन्न हुआ। कुमार अवस्था में ही वह बड़े-बड़े पहलवानों के साथ कुश्ती लड़ता था।

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देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
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