Tuesday, June 16, 2026
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क्या स्त्री भी किसी को गुरु बना सकती है?

स्त्री को कोई भी गुरु नहीं बनाना चाहिए। स्त्री का पति ही उसका गुरु है। ऐसा शास्त्रों में वर्णित है –
गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः ।
पतिरेवगुरु: स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरुः।।
– ब्रह्मपुराण । ८० । ४७ ।

अर्थात – अग्नि द्विजातियों का गुरु है। ब्राह्मण चारों वर्णों का गुरु है। एकमात्र पति ही स्त्री का गुरु है, एवं अतिथि सबका गुरु है।

वैवाहिको विधि: स्त्रीणां संस्कारो वैदिक: स्मृत: ।
पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ।।
– मनु स्मृति । २ । ६७ ।

अर्थात – स्त्रियों के लिए वैवाहिक विधि का पालन ही वैदिक संस्कार (यज्ञोपवीत), पति की सेवा ही गरुकुल वास और गृह कार्य ही अग्निहोत्र कहा गया है।

श्री रामचरितमानस में माँ सती अनसूया ने माता सीता को जो पतिव्रता धर्म का उपदेश दिया है, उसमें उन्होंने जो माता सीता से कहा है:
सोरठा –
सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ ।
जसु गावत श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय ।।
– मानस । ३ । ४ ।

अर्थात – स्त्री जन्म से ही अपवित्र है, किन्तु पति की सेवा करके वह अनायास ही अपने पतिव्रता धर्म के कारण शुभ गति प्राप्त कर लेती है। आज भी “तुलसी” भगवान श्रीहरि को प्रिय है और चारों वेद उनका यश गाते हैं।

स्त्री को अपने पति के सिवाय और किसी से संबंध नहीं जोड़ना चाहिए। अत: स्त्रियों से अनुरोध है कि वे किसी भी प्रकार के साधु या आज के तथाकथित गुरु आदि के फेरे में ना पड़े क्योंकि आजकल वैसे भी बहुत ठगी, दम्भ, पाखण्ड हो रहा है। वास्तव में देखा जाए तो शास्त्रों से लिए गए ये वचन स्वयं आजकल के उन साधुओं और गुरुओं को भी नहीं पता, इसलिए वे भी स्त्रियों को अपनी शिष्या बना लेते हैं।

हम तो यहाँ तक कहेंगे कि साधु को भी चाहिए कि किसी स्त्री को अपनी चेली ना बनायें क्योंकि दिक्षा देते समय गुरु को शिष्य का स्पर्श करना पड़ता है। जबकि सन्यासी के लिए शास्त्रों में किसी भी पराई स्त्री के स्पर्श का कड़ा निषेध किया गया है। श्रीमद्भागवत पुराण में लिखा है कि हाड़ मासमय स्त्री का तो कहना ही क्या, लकड़ी की बनी हुई स्त्री का भी स्पर्श ना करें,

पदापि युवतीं भिक्षुर्न स्पृशेद् दारवीमपि ।
– भागवत । ११ । ८ । १३ ।

शास्त्र मेँ यहाँ तक कहा गया है-
मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत् ।
बलवानिन्दियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥
– मनु॰ । २ । २१५ ।

अर्थात – मनुष्य को चाहिये कि अपनी माता, बहन अथवा पुत्री के साथ भी कभी एकांत में न रहेँ; क्योंकि इन्द्रियाँ बड़ी प्रबल होती हैँ, वे विद्वान मनुष्य को भी अपनी तरफ खींच लेती हैं।

सङ्गं न कुर्यात्प्रमदासु जातुः योगस्य पारं परमारुरुक्षुः ।
मत्सेवया प्रतिलब्धात्मलाभो वदन्ति या निरयद्वारमस्य ॥
– भागवत॰ । ३ । ३१ । ३९ ।
अर्थात – जो पुरुष योग के परम पद पर आरुढ़ होना चाहता हो अथवा जिसे मेरी सेवा के प्रभाव से आत्मा-अनात्मा का विवेक हो गया हो, वह स्त्रियों का संग कभी न करे; क्योंकि उन्हें ऐसे पुरुष के लिए नरक का खुला द्वार बताया गया है।

विश्वामित्रपराशरप्रभृतयो वाताम्बुपर्णाशनास्
तेऽपि स्त्रीमुखपड़्कजं सुललितं दृष्ट्वैव मोहं गताः ।
शाल्यन्नं सघृतं पयोदधियुतं भुञ्जन्ति ये मानवास् तेषामिन्द्रियनिग्रहो यदि भवेद्विन्ध्यस्तरेत्सागरे ॥
– भर्तृहरिशतक

अर्थात – जो वायु-भक्षण करके, जल पीकर और सूखे पत्ते खाकर रहते थे, वे विश्वामित्र, पराशर आदि भी स्त्रियों के सुंदर मुख को देखकर मोह को प्राप्त हो गये, फिर जो लोग शाली धान्य (सांठी चावल) को घी, दूध और दही के साथ खाते हैं, वे यदि अपनी इन्द्रिय का निग्रह कर सकें तो मानो विन्ध्याचल पर्वत समुद्रपर तैरने लगा।

हमने तो जैसे पढ़ा है और बड़े-बड़े संतों से जैसा सुना है, वही लिखा है। यदि हमारा लिखा पढ़ कर हमारी कोई माता या बहन नहीं मानें, तो हमें कोई व्यक्तिगत लाभ अथवा हानि नहीं है। हमने तो यहाँ सबके भले के लिए ही लिखा है।

स्वेच्छाचारी, मनमुखी और दुष्प्रवृत्ती के लिए कोई नियम नहीं ।।

साभार – अनिल वशिष्ठ जी की वाल से

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देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
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