भटनी–प्रतापगढ़ (22 मई)। ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्री: अविमुक्तेश्वरानन्द: सरस्वती ‘१००८’ जी की ऐतिहासिक 81 दिवसीय ‘गविष्ठी (गौरक्षार्थ धर्मयुद्ध)’ (3 मई – 24 जुलाई 2026) के बीसवें दिन आज प्रतापगढ़ जिले की छह विधानसभाओं में विशाल जनसभाएँ सम्पन्न हुईं। दिन का शुभारंभ एक ऐतिहासिक क्षण से हुआ — भटनी में धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज की जन्मभूमि पर — जहाँ ज्योतिष्पीठाधीश्वर ने करपात्री चौक पर स्थापित करपात्री जी महाराज की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। प्रत्येक स्थान पर उपस्थित जनसमुदाय ने वैदिक मंत्र “अहं हनं वृत्रं गविष्ठौ” का सामूहिक उच्चारण करते हुए गौ रक्षा का संकल्प लिया।
करपात्री चौक पर माल्यार्पण — जन्मभूमि में ऐतिहासिक धर्म संवाद –
ज्योतिष्पीठाधीश्वर ने भटनी में धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया और नतमस्तक होकर उनसे प्रेरणा ली। महाराजश्री ने उनके गुरुजी महाराज का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण वक्तव्य साझा किया — जब उनसे पूछा गया कि स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने का कारण क्या था, तो उन्होंने पूरे मन से कहा: “यदि हमें पता होता कि यह देश ऐसा बनने वाला है, तो हम किसी भी दशा में स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं लेते, ये बात स्वयं हमारे गुरुजी ने कही थी” उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता संग्राम का मुख्य लक्ष्य गौ माता की रक्षा था। अंग्रेज इस देश में गाय काटते थे — और हमारे वीरों को यह सहन नहीं था। उन्होंने अंग्रेजों को भगाया, लेकिन 78 वर्षों की आजादी के बाद भी हम स्वयं गाय काट रहे हैं और डॉलर के लिए निर्यात कर रहे हैं। ‘अंग्रेज बाहर से गाय काटते थे। आज रावण हमारे अंदर समा गया है — हम स्वयं गाय काट रहे हैं और उन्हीं विदेशियों के लिए पैकेट बनाकर भेज रहे हैं।’
‘करपात्री जी ने राम राज्य परिषद् का राजनीतिक विकल्प दिया — हिंदू नहीं समझे’ –
महाराजश्री ने स्मरण कराया कि धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज ने केवल आध्यात्मिक आवाज ही नहीं उठाई — उन्होंने राम राज्य परिषद् के माध्यम से एक ठोस राजनीतिक विकल्प भी दिया। लेकिन हिंदुओं ने उसके उद्देश्य को नहीं समझा और परिषद् पीछे चली गई जबकि अन्य राजनीतिक शक्तियाँ आगे आ गईं। ‘हमने बिना सोचे-समझे वोट दिए — यह नहीं समझा कि किसकी दृष्टि के लिए वोट दे रहे हैं और किसे पीछे छोड़ रहे हैं। परिणाम आज हमारे सामने है।’
महाराजश्री ने यह भी कहा कि करपात्री जी के समय में इंदिरा सरकार ने गौभक्तों पर गोलियाँ चलाईं — यह कार्य किसी भी सनातन धर्म के अनुयायी को स्वीकार्य नहीं है और जब तक यह इतिहास पढ़ा-लिखा जाएगा, उसकी निंदा होती रहेगी। परंतु महाराजश्री ने यह भी नोट किया कि इसी चौक पर करपात्री जी की प्रतिमा कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी ने स्थापित की है। ‘गोली चलाने वाले ने अपना फल भोगा और भोगता रहेगा। लेकिन जिसने यह प्रतिमा स्थापित की — गौ माता की रक्षा के लिए जो समर्पित हो रहा है — उसे स्वीकार करना चाहिए। हम कभी चेहरा देखकर निर्णय नहीं करते — बात को तौलते हैं।’
‘जब राजा भटके — तभी संत की भूमिका शुरू होती है’ — भागवत का संदेश –
महाराजश्री ने श्रीमद् भागवत पुराण का राजा वेन का प्रसंग सुनाया — एक अत्याचारी राजा जिसे संत महात्माओं ने बारंबार समझाने का प्रयास किया, लेकिन वह नहीं माना। अंततः संतों ने उसका अंत कर दिया। उस शून्य में संतों ने मंथन करके राजा पृथु को प्रकट किया — जिन्हें इस धरती का प्रथम सच्चा राजा माना जाता है।
महाराजश्री ने कहा: ‘राजा अगर अच्छा चल रहा हो तो संत की विशेष भूमिका नहीं होती। संत की भूमिका तभी शुरू होती है जब राजा भटकने लगे — क्योंकि आम जनता नहीं बोल सकती। उनके बाल-बच्चे हैं, संपत्ति है, राजा का प्रकोप झेलना पड़ेगा। इसलिए वे संतों से कहते हैं: हमारे समय में राजा खराब हो तो आप हमारी ओर से बोलना। इसीलिए हम निकले हैं। यह हमारा कर्तव्य है। धर्म सम्राट करपात्री जी ने अपने समय में यह भूमिका निभाई — उनके बताए रास्ते पर चलते हुए हम भी निभा रहे हैं।’
‘गौ माता कामधेनु हैं — प्रेम से सेवा करो, हर मनोकामना पूरी होगी’ –
महाराजश्री ने गौ माता के साथ मानवता के सबसे गहरे संबंध पर प्रकाशमय प्रवचन दिया। उन्होंने कहा कि आधुनिक हिंदू समाज गाय को केवल दूध की मशीन मान बैठा है — जब तक दूध देती है, रखते हैं; जब बंद कर दे, छोड़ देते हैं। यह गाय के स्वरूप की सबसे बड़ी भूल है। उन्होंने राजा दिलीप का प्रसंग सुनाया जिन्होंने दिव्य गाय नंदिनी की पूर्ण निष्ठा से सेवा की। जब नंदिनी ने पूछा: ‘क्या चाहते हो?’ तो राजा ने कहा: ‘आप तो गाय हैं, दूध ही दे सकती हैं, और क्या देंगी?’ नंदिनी ने कहा: ‘जब हम प्रसन्न होते हैं, तो जो चाहो वही देने की सामर्थ्य रखते हैं — माँगो।’ राजा ने संतान माँगी। गौ माता ने रघु नामक पुत्र दिया — उसी रघु से रघुवंश चला और उसी से भगवान श्री राम आए।
उन्होंने राजा पृथु और धरती माता का प्रसंग भी सुनाया: जब धरती ने अत्याचार के कारण अपनी उपज बंद कर दी, तो वह गाय का रूप धारण करके राजा पृथु के सामने आई। राजा ने न्यायपूर्ण शासन का वचन दिया — तब धरती माता बोली: ‘आपके पास जो भी है — अन्न, दूध, औषधि, मक्खन, छाछ, जीवन — सब मुझसे मिला है। मैं कामधेनु हूँ। जब प्रसन्न हो जाऊँ तो जो माँगोगे, मिल जाएगा।’
महाराजश्री ने धेनु और कामधेनु का भेद समझाया: धेनु दबाने पर दूध देती है। कामधेनु अपने आप बहा देती है — जैसे माँ का आँचल प्रेम में भीग जाता है। ‘जब गाय की दूध के लिए नहीं, उसकी अपनी सेवा के लिए सेवा की जाए — खिलाई जाए, सफाई जाए, सम्मान दिया जाए — तो वह कामधेनु बन जाती है। फिर उसके रोम-रोम से आशीर्वाद बहता है। जो माँगोगे, मिलेगा। यह नियम है।’
सामूहिक संकल्प — राष्ट्र माता घोषणा की माँग –
महाराजश्री ने कहा: प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से माँगने से पहले हम और आप को स्वयं घोषणा करनी होगी। उन्होंने उपस्थित जनसमुदाय से दोनों हाथ उठवाकर सामूहिक संकल्प कराया:
“मैं घोषणा करता/करती हूँ कि गाय मेरी माता है। मेरी गौ माता को जो भी व्यक्ति या संस्था चोट पहुँचाएगी, वह आज से मेरा दुश्मन होगा — उससे कोई लेन-देन का संबंध नहीं रहेगा। आने वाले चुनाव में मैं उसी पार्टी या प्रत्याशी को वोट दूँगा जो गौ माता की रक्षा का शपथपूर्वक वचन देगा।”
तत्पश्चात चक्रधारी मुद्रा में वैदिक संकल्प “अहं हनं वृत्रं गविष्ठौ” का सामूहिक उच्चारण कराया गया।
24 जुलाई को लखनऊ में एक अक्षौहिणी सेना का महासंकल्प –
3 मई 2026 को गोरखपुर से प्रारंभ हुई गविष्ठी यात्रा उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभाओं की परिक्रमा कर रही है। यदि 81 दिनों की यात्रा पूर्ण होने तक सरकार ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो 24 जुलाई 2026 को लखनऊ में एक अक्षौहिणी सेना — 2,18,700 धर्म सैनिकों के साथ अगले चरण की घोषणा की जाएगी।
मीडिया टीम
परमाराध्य परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर अनंतश्रीविभूषित जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्री: अविमुक्तेश्वरानन्द: सरस्वती ‘१००८’
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