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महज दीपोत्सव ही नहीं है दिवाली

admin 3 October 2022
DIWALI-EARTHERN-LAMP
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सनातन का पर्व दीपावली यानी दीपोत्सव एक अति प्राचीन पर्व है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह जाति, वर्ग या प्रांत विशेष का उत्सव न होकर सर्वदेशीय व सर्वजातीय उत्सव है। भारतीय तो इसे हर परिस्थिति में यानी सुख-दुख, शांति काल, युद्ध एवं छोटे या बड़े रूप में मनाते आ रहे हैं।

शास्त्रों के अनुसार इस रात्रि को महारात्रि यानी अंधेरी काली रात, शब्द से भी संबोधित किया गया है, इसीलिए इस दिन प्रत्येक घरों में और सभी स्थानों में दीपों की श्रृंखलाओं को प्रज्जवलित कर अंधेरे को रोशनी या प्रकाश द्वारा दूर किया जाता है इसलिए इसको प्रकाश पर्व भी कहा जाता है क्योंकि प्रकाश ज्ञान का दूसरा रूप है और अंधकार में भटकते मानव को प्रकाश दान कर सन्मार्ग पर लाने की भावना के साथ यह पर्व मनाया जाता है।

दीपोत्सव का वैज्ञानिक महत्व कम नहीं है क्योंकि ऋतु परिवर्तन के समय के बाद कार्तिक अमावस्या में शरद ऋतु के चरम सीमा पर होने पर यह पर्व आता है और वातावरण में वर्षा ऋतु उपरांत स्वास्थ्य दूषक कीटाणुओं की भरमार होती है जिनको इस प्रकाश द्वारा दूर किया जाता है क्योंकि वर्षा ऋतु में नमी रहने के कारण न केवल हानिकारक कीटाणु पनपते हैं बल्कि घरों में अपना स्थान भी बना लेते हैं इसीलिए दीपावली पर्व पर साफ-सफाई, रंगाई-पुताई, धोना-पोंछना इत्यादि जैसे कृत दीपावली पर्व से पहले किये जाते हैं जिससे न केवल घरों की रंगत बदल जाती है बल्कि घर सज-संवर भी जाते हैं इसीलिए प्रत्येक वर्ष, अगले वर्ष तक घरों में, समाज में फैले हुए विद्वेश की स्वच्छता हेतु संकल्प लिए जाते हैं।

धार्मिक दृष्टि से दीपोत्सव, धनतेरस, छोटी दिवाली, अन्नकूट, व भैया दूज तक मनाया जाता है। यूं तो सभी दिनों के साथ कुछ न कुछ कथाएं और कहानियां जुड़ी हुई हैं परंतु एक मान्यता के अनुसार विजयदशमी (दशहरा) के उपरांत रावण पर विजय प्राप्त कर जब श्रीराम, सीता जी के साथ 14 वर्ष पश्चात जब अयोध्या लौट रहे थे वह दीपावली का ही दिन था इसीलिए पूरी अयोध्या की मानव जाति हर्षोल्लास के साथ मनाती है और इसीलिए इस दीपोत्सव पर्व को बुराइयों पर अच्छाइयों के जीतने के रूप में भी मनाया जाता है। इस पर्व पर लोग आपस में एक दूसरे से मिलते हैं, खुशियां बांटते हैं और हर पल रिश्तों को मजबूत करते हुए खुशियां मनाते हैं।

दशहरे के बाद से ही हर घर में सफाई का दौर शुरू हो जाता है। घर के सभी सदस्य इस काम में जुट जाते हैं। घर की सारी पुरानी अनावश्यक चीजों को बाहर निकालकर कबाड़ में दे दिया जाता है और घर के हर कोने की सफाई की जाती है। घर की दीवारों को नए रंगों से रंगा जाता है। नए सामानों की खरीदी कर पूरे घर को सजाया जाता है। घर के द्वार पर रंग-बिरंगे तोरण लगाए जाते हैं, आंगन में रंगोली सजाई जाती है। दीयों, मालाओं व झालरों से सजावट की जाती है। हर एक की चाहत होती है कि मां लक्ष्मी उनके घर में प्रवेश करें, इसलिए घर को मंदिर की तरह स्वच्छ और पवित्र बनाया जाता है।

भारत के कुछ हिस्सों में दीपावली व्यापारियों का विशेष पर्व मानी जाती है इससे उनका नव वर्ष प्रारंभ होता है और साल भर का लेखा-जोखा खत्म कर नए खाता-बही तैयार किये जाते हैं। दीपावली तक सभी पुराने लेन-देन का निपटारा कर नये वर्ष का प्रारंभ किया जाता है।

आज के आधुनिक काल में दीपावली भी आधुनिक तरीके से मनाई जाती है। उच्च परिवार कई दिनों तक विशेष पार्टी करते हैं जिसमें वे सभी से मुलाकात करते हैं जिससे पारिवारिक, व्यापारिक एवं अन्य संबंध बेहतर बनते हैं।

कुटीर उद्योगों के लिए भी दीपावली का त्यौहार खुशियां लाता है। मिट्टी का सामान, साज-सज्जा का सामान कुटीर उद्योग द्वारा बनाये जाते हैं, जिसे उनकी वर्षभर की जीविका चलती है।

दीपोत्सव न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी भिन्न-भिन्न रूप में मनाया जाता है। विशेषकर इंग्लैंड के लीसेस्टर शहर में दीपावली समारोह प्रकाश, संगीत और नृत्य के साथ आयोजित किया जाता है जो जीवंत होते हुए हर्षोल्लास के साथ लोग मनाते हैं।

– श्वेता वहल

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