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हिंसा, मनोविज्ञान और न्यायशास्त्र

मनोविज्ञान ये कहता है कि समाज में जितने भी अराजक तत्व और आतंकवादी प्रवृत्ति के हिंसक लोग होते हैं वे सब पूर्वजन्म के शापित और पाप के वशीभूत होते हैं। धर्म ये कहता है कि उनसे यदि समाज को छुटकारा पाना है तो उनको केवल मार देने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं होता। फिर चाहे वे शासक के कितने ही नजदीकी या रिश्ते-नातेदार ही क्यों न हों। हमारे सनातन के पौराणिक और प्राचीन शास्त्रों में भी यही स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि ऐसे अराजक तत्वों को मृत्यु दंड देने के अलावा अन्य कोई विकल्प शेष नहीं रह जाता।

हालांकि हमारे शास्त्र यह भी कहते हैं कि जो थोड़े कम अराजक प्रवृत्ति के लोग होते हैं उनके लिए समाज की मुख्य धारा में लौटने का एक अवसर अवश्य होता है इसलिए उन्हें कम या अधिक दंडात्मक प्रावधानों या फिर किसी अन्य प्रकार के माध्यम से अथवा काल कोठरी आदि में डालकर समाज में लौटने का अवसर दिया जाता है।

इस विषय पर केवल पौराणिक और प्राचीन शास्त्र ही नहीं बल्कि आधुनिक संविधान और कानूनी प्रावधान आदि भी यही बात कहते हैं और उसी के आधार पर दंड भी निश्चित किए जाते हैं। भले ही आज मुख्य रूप से भारत में इन दंडात्मक प्रावधानों पर ठीक से अमल नहीं हो पा रहा है, लेकिन अन्य देशों की सरकारें आज भी उन दंडात्मक प्रावधानों को ठीक से लागू करवाने में आगे रहतीं हैं। और इस बात के कई उदाहरण हमारे सामने हैं।

इसलिए मनोविज्ञान के साथ हमारे शास्त्र भी यही कहते हैं कि उनकी प्रवत्ति, अज्ञानता को जड़ से समाप्त कर समाज का उद्धार किया जाए और समाज में शांति स्थापित की जाए। क्योंकि उन तमस प्रवृत्तियों की समाप्ति होने से ही हमारे गोवंश और हमारे साधु संतों की हमारे मठ मंदिरों की रक्षा हो सकेगी। इसलिए केवल एक बार ही उन अराजक तत्वों को सुधारने का अवसर देना चाहिए बार-बार नहीं।

न्याय शास्त्र यही कहता है कि यदि एक बार में भी वे न माने तो उनके दमन का और उनके सर्वनाश का उपाय बनाना चाहिए और उनका नाश कर देना चाहिए। यही मनुस्मृति भी कहती है, यही क्षत्रिय धर्म और सनातन धर्म का भी कहना है। और यही कारण है कि केवल वही ही लोग झुंड बनाकर मनुस्मृति का विरोध करते हैं और सनातन धर्म का विरोध करते हैं जो समाज और धर्म से ऊपर स्वयं को स्थापित करना चाहते हैं।

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देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
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