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भारतीय मीडिया – समाप्ति की ओर…!

अजय चौहान | भारतीय मीडिया में वर्तमान में जो उथल-पुथल मची है, वह केवल वैचारिक नहीं बल्कि गहरे आर्थिक और अस्तित्व के संकट का भी परिणाम है। दरअसल, इसके कुछ प्रमुख बिंदुओं पर गौर करें तो उनमें निष्पक्षता की कमी, नौकरियों का डर, और यूट्यूब पर लोकल न्यूज़ चैनल्स की भरमार का वह कारण है जो भारतीय मीडिया को ख़त्म करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है। असल में इसका कारण भारत के प्रमुख मीडिया जैसे कि टेलीविज़न और अखबारों आदि से कहीं अधिक आजकल लोग यूट्यूब और क्षेत्रीय वेब पोर्टलों की ओर दर्शकों का पलायन हो चुका है। ख़ास बात ये भी देखि जा रही है कि सन 2026 के जाते-जाते यह बहुत एक बड़े और निर्णायक मोड़ पर पहुँच सकता है।

​इसे और अधिक विस्तार से समझने के लिए हम इन प्रमुख कारणों का विश्लेषण कर सकते हैं, जिनमें –
​विज्ञापन आधारित मॉडल का चरमराना (Revenue Crisis) – क्योंकि ​पारंपरिक न्यूज़ चैनलों की कमाई का मुख्य जरिया सरकारी और कॉर्पोरेट विज्ञापन ही होते हैं। जब न्यूज़ चैनल विज्ञापनों के लिए सत्ता के करीब जाते हैं, तो उन्हें अपनी संपादकीय स्वतंत्रता (Editorial Independence) गिरवी रखनी पड़ती है।

​बाजार का रुख: रिपोर्ट्स के अनुसार, 2025-26 में विज्ञापनदाता अब ‘मास रीच’ (Mass Reach) के बजाय ‘क्रेडिबिलिटी’ (विश्वसनीयता) खोज रहे हैं। कई बड़े ब्रांड्स अब उन ‘शोर-शराबे’ वाले डिबेट्स से पीछे हट रहे हैं जो उनकी ब्रांड इमेज को नुकसान पहुँचा सकते हैं।

​सत्ता परिवर्तन का भय और ‘ब्रांड’ पत्रकारों की बगावत –
​मीडिया संस्थानों के अंदर पिछले एक वर्ष से अघोषित बेचैनी देखी जा रही है। क्योंकि यदि केंद्र में राजनीतिक समीकरण बदलते हैं, तो वे ही पत्रकार जो ‘सत्ता के प्रवक्ता’ बन चुके हैं, सबसे पहले निशाने पर होंगे।

​नौकरी का खतरा: संस्थानों को डर है कि नई व्यवस्था में उनके पुराने झुकाव के कारण विज्ञापन बंद हो सकते हैं या कानूनी जाँच का सामना करना पड़ सकता है।

​बगावत का स्वर: यही कारण है कि कुछ बड़े पत्रकार, जो स्वयं में एक ‘ब्रांड’ हैं, अब अपनी छवि बचाने के लिए संस्थानों से अलग हो रहे हैं। वे जानते हैं कि डिजिटल युग में उनकी व्यक्तिगत साख, संस्थान की साख से बड़ी है।

साजिशकर्ता और न्यूज़ चैनल के झूठ का पर्दाफाश!
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यूट्यूब (YouTube): एक नया सत्ता केंद्र –
​दर्शकों का न्यूज़ चैनलों से मोहभंग होने का सबसे बड़ा कारण ‘सूचना का अभाव’ और खबरों में ‘भ्रामकता’ है।

​प्रामाणिकता और गहराई: दर्शक अब मीडिया चैनल्स पर 2 मिनट के सनसनीखेज क्लिप के बजाय यूट्यूब पर 20 मिनट का गहरा विश्लेषण (Explainer) देखना अधिक पसंद कर रहे हैं। क्योंकि यूट्यूब पर कई स्वतंत्र पत्रकार हैं जो वे सभी तथ्य उजागर कर रहे हैं जिन्हें सरकार के दबाव में आकर मुख्यधारा का मीडिया ‘सेंसर’ कर देता है।

भविष्यवाणी: डेटा संकेत दे रहे हैं कि भारत में यूट्यूब अब देश का सबसे बड़ा न्यूज़ चैनल बन चुका है। न्यूज़ चैनलों की टीआरपी में लगातार गिरावट और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर सब्सक्राइबरों की वृद्धि यह बताती है कि कई छोटे न्यूज़ चैनल वित्तीय घाटे के कारण जल्द ही बंद होने की कगार पर पहुँच सकते हैं।

​विश्वसनीय सूचना का ‘लोकतंत्रीकरण’ –
यह सच है कि शत प्रतिशत अब भारतीय ​मीडिया संस्थानों का एकाधिकार खत्म हो चुका है। क्योंकि पहले जो सूचना केवल बड़े न्यूज़ रूम्स से निकलती थी उसे ही मान्य समझा जाता था, वहीं अब स्मार्टफोन और यूट्यूब ने सूचना का ‘लोकतंत्रीकरण’ कर उस एकाधिकार को ख़त्म दिया है।

देखा जाय तो वर्तमान दौर में भारतीय न्यूज़ चैनलों के लिए एक प्रकार से ‘करो या मरो’ की स्थिति उत्पन्न हो चुकी है। ऐसे में यदि वे अपनी निष्पक्षता और ग्राउंड रिपोर्टिंग पर वापस नहीं लौटे, तो 2026 के अंत तक हम कई बड़े मीडिया घरानों के पतन या उनके पूरी तरह डिजिटल (YouTube-only) मॉडल में तब्दील होने के गवाह बनेंगे।

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adminhttp://dharmwani.com
देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
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