इस समय केवल उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि संपूर्ण देश में और देश के अलग-अलग कई हिस्सों में रहने वाली तमाम लोग अगर रईसगिरी का दिखावा करते हैं और बोतल बंद पानी पीने के आदी हो चुके हैं या फिर बोतल बंद पानी पर ही भरोसा करते हैं, तो यह खबर आपके लिए सबसे अच्छी और मददगार हो सकती है।
हालांकि यह सच है कि यदि आप दिखावा ना भी करें और बीमार होने से बचने का प्रयास करें, तो भी आपको अब शुद्ध पानी (waterpollution) संभवतः संपूर्ण देश में कहीं भी बहुत ही कम मिल सकता है। क्योंकि हर प्रकार के प्रदूषण ने अब धीरे-धीरे अपने पैर पसारने शुरू कर दिए हैं और भले ही दुनिया के अन्य देशों में इस प्रकार का प्रदूषण न हो लेकिन भारत में तो यह घड़ी की सुई की तरह धीरे-धीरे आगे बढ़ता ही जा रहा है।
इस समय उत्तर प्रदेश में चल रही जिन वाटर बाटलिंग यूनिट की जांच की गई है, उनमें से करीब 80 प्रतिशत से अधिक यूनिट शुद्धता के मानकों पर खरी नहीं उतरीं हैं। कहीं बड़ी लापरवाही यानी रख-रखाव में भयंकर कमी मिली है, तो कहीं पानी में माइक्रोज यानी बैक्टीरिया, वायरस, फंगस आदि मिले हैं और इनमें भी बढ़ोतरी या ग्रोथ पाई गई है। कहीं-कहीं तो पानी में सक्रेशिया कोलिव और कोलीफॉर्म बैक्टीरिया भी पाया गया है, जो सीधे-सीधे मल-मूत्र होने के संकेत है। सरकार के एफएसडीए यानी खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (Food Safety & Drug Administration) जो की मुख्य रूप से खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता, सुरक्षा और दवाओं के मानकों के नियमन, लाइसेंसिंग और निगरानी का कार्य करता है, ने पूरे उत्तर प्रदेश में अभियान चलाकर और अन्य प्रदेशों की टीमें बुलाकर भी इनकी जांच कराई, जिसमें ये खुलासा हुआ है।
दरअसल, प्रदूषित जल के कारण इंदौर में हुई मौतों के बाद उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों और विभागों में खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन की आयुक्त रोशन जैकब द्वारा पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर प्लांट की जांच के लिए एक विशेष अभियान चलाया गया, जिसके तहत एक मंडल की टीमों ने दूसरे मंडलों में जाकर जांच की। जिसमें पाया गया कि यहां तो बड़े पैमाने पर गड़बड़झाला है। इसके बाद 164 प्लांट्स का लाइसेंस निलंबित कर दिया गया है और 104 यूनिट्स को छोटे बड़े कई प्रकार के सुधार करने के लिए नोटिस भेजा गया।
जांच के दौरान कई तरह की ऐसी कमियां भी पाई गईं जो जल प्रदूषण की अधिकता से भी कई गुणा ऊपर थीं। इसमें कुछ जगहों पर माइक्रोज ग्रोथ पाई गईं तो कहीं मिनरल्स की अधिकता देखी गई। विभाग के अनुसार, यूपी में पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर के कुल 850 यूनिट के पास सरकारी लाइसेंस है जिनमें से 560 की जांच की गई। 397 प्लांट में से पानी के नमूने लिए गए और उनकी जांच कराई गई। 194 प्लांट का स्ट्रैंडर्ड लो पाया गया, जबकि 119 में स्क्रेशिया कोलीव और कोलीफॉर्म बैक्टीरिया पाया गया। पानी में इसके कण की मौजूदगी मल-मूत्र होने की ओर इशारा करते हैं।
प्राप्त खबर के अनुसार, चित्रकूट के क्वीन, मैनपुरी के ग्लोबल, प्रयागराज के नीट एचटूओ, गोरखपुर के रिप्लायबल फ्रेश, बस्ती के कीवी और गोंडा के सुपर फाइव स्टार सहित कई ब्रांड्स पर प्रतिबंध लगाया गया है। साथ ही प्रशासन ने दुकानदारों को इन प्रतिबंधित ब्रांडों का स्टॉक नष्ट करने और आम जनता को बोतल बंद पानी खरीदते समय सुरक्षा मानकों जैसे ISI/FSSAI मार्क की जांच करने की भी सलाह दी है।
यानी जब स्क्रेशिया कोलीव शरीर में प्रवेश करते हैं, तो वे दस्त, पेट दर्द,और मूत्र मार्ग के संक्रमण जैसी गंभीर समस्याएं पैदा कर सकते हैं। इंदौर सहित गुजरात आदि कई शहरों में भी इसी समस्या को पाया गया था। दरअसल यह मुख्य रूप से दूषित पानी और भोजन के कारण शरीर को बीमार कर देता है।
दरअसल, भारत में जल प्रदूषण की समस्या अब धीरे-धीरे बढ़ती ही जा रही है। इसका प्रमुख कारण है 80% से अधिक सीवर लाइनें या तो अवरुद्ध हैं या उनका सही से उपयोग नहीं हो रहा है, जिसके कारण उनका गंदा पानी सीधे नदियों और जलाशयों में जाकर पीने वाले पानी को प्रदूषित कर रहा है।
नालियों का पानी जमीन में समा कर, फिर कुओं के माध्यम से या फिर बोरिंग मशीन या मोटर पंप आदि के माध्यम से पीने के काम में लाया जाता है। साधारणतया आम धारणा यही होती है कि यह जल जो भूमि से निकाला जा रहा है शुद्ध है। लेकिन इसमें भी वही पानी होता है जो नालियों से होकर भूमि में चला जाता है।
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