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अन्याय और अधर्म का प्रतिकार ही सनातन धर्म है: जगद्गुरु शंकराचार्य

admin 11 March 2026
Sanatan Dharma is the resistance against injustice and unrighteousness saysJagadguru Shankaracharya swami avimukteshwaranand
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• अन्याय और अधर्म सहने से ही समाज में पाप बढ़ता हैं : जगद्गुरु शंकराचार्य
• लखनऊ के ‘धर्मयुद्ध शंखनाद’ में पूज्य शंकराचार्य जी ने फूँका ‘गविष्ठि’ (गोयुद्ध) का बिगुल।
• आगामी 3 मई से सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में प्रारम्भ होगी ‘समग्र गविष्ठि गोयुद्ध यात्रा’।
• योगी और विरक्त का पद-लोलुप होना ‘दानवी प्रवृत्ति’, वेशधारियों को दी कड़ी

लखनऊ (11 मार्च) “धर्म जहाँ पालन करने से बढ़ता है, वहीं अधर्म केवल सह लेने से बढ़ जाता है। इसलिए जितना ज़रूरी धर्म का पालन है, उतना ही आवश्यक अधर्म का प्रखर विरोध भी है।” उक्त उद्गार परमाराध्य परमधर्माधीश उत्तराम्नाय ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती ‘1008’ ने आज लखनऊ के मान्यवर कांशीराम स्मृति स्थल मैदान में आयोजित ‘धर्मयुद्ध शंखनाद’ कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए व्यक्त किए।

Retaliation against injustice & unrighteousness is the eternal religion
3 मई 2026 से सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में प्रारम्भ होगी ‘समग्र गविष्ठि गोयुद्ध यात्रा’।

3 मई से ‘समग्र उत्तर प्रदेश गविष्ठि गोयुद्ध यात्रा’ –
महाराजश्री ने मंच से एक ऐतिहासिक घोषणा करते हुए कहा कि गौ-माता को राष्ट्रमाता का सम्मान दिलाने और गौ-हत्या के कलंक को भारतभूमि से मिटाने के लिए आगामी 3 मई से सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में 81 दिवसीय ‘समग्र गविष्ठि गोयुद्ध यात्रा’ का शुभारम्भ किया जाएगा। उन्होंने ‘गविष्ठि’ शब्द की वैदिक व्याख्या करते हुए बताया कि यह केवल यात्रा नहीं, बल्कि गौ-वंश की प्रतिष्ठा हेतु छेड़ा गया एक धर्मयुद्ध है। ऋग्वेद के मन्त्रों का उद्धोष करते हुए उन्होंने कहा— ‘अहं हनं वृत्रं गविष्ठौ’ अर्थात् इस गोयुद्ध में हम अधर्म रूपी वृत्रासुर का समूल नाश करेंगे।

अधर्म का प्रतिकार ही सनातन धर्म –
पूज्य महाराजश्री ने शास्त्र की पंक्ति ‘अन्यायप्रतिकारो हि धर्मः खलु सनातनः’ का उल्लेख करते हुए कहा कि अपराध को सहना अधर्म को बढ़ावा देना है। उन्होंने राजा परीक्षित का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह उन्होंने गौ-माता के आँसू पोंछते हुए कलि को दंडित किया था, आज के शासकों को भी उसी मार्ग पर चलना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि जिस राज्य में गाय रोती है, उस राज्य का विनाश निश्चित है—
‘राज्यं नश्यति तस्याशु यत्र गावो रुदन्ति वै’।।
*वेशधारियों और पद-लोलुपों को चेतावनी*
गुरु गोरखनाथ जी की वाणी का उद्धरण देते हुए उन्होंने तीखा प्रहार किया — “गऊ हमारी माता हम गऊ के लाल, मांस खावे सो नर जाये जम के जाल।” उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो ‘गोरख झोली’ में एक साथ गौभक्तों का वोट और गौहत्यारों का नोट रखने की कोशिश कर रहे हैं, वे कभी गोरखपंथी नहीं हो सकते। इसी तरह सन्यासी और विरक्त का लाभ के पदों पर बैठना और ‘शर्तनामा’ लगाना दानवी प्रवृत्ति है। उन्होंने आगाह किया कि धर्म की शपथ लेने के बाद धर्मनिरपेक्षता की शपथ नहीं ली जा सकती । जिन्होंने भी यह किया हो उन्हें तत्काल किसी एक शपथ पर स्थिर हो जाना चाहिये अन्यथा सन्त समाज से उनका बहिष्कार किया जायेगा।

लक्ष्मणपुरी का गौरव और गोमती विद्या –
महाराजश्री ने लखनऊ का प्राचीन नाम ‘लक्ष्मणपुरी’ बताते हुए कहा कि यह शेष-अवतार लक्ष्मण की भूमि है, जिन्होंने गौ-रूपी पृथ्वी के आँसू पोंछने का संकल्प लिया था। उन्होंने गोमती नदी को ‘गोमती विद्या’ का जीवंत स्वरूप बताया और कहा कि लक्ष्मण का बाण कभी व्यर्थ नहीं जाता — ‘लक्ष्मणस्य शरो नैव व्यर्थो याति कदाचन’।

मतदान और गौ-हत्या का पाप –
मनुस्मृति और महाभारत के सन्दर्भों से उन्होंने जनता को आगाह किया कि केवल कसाई ही हत्यारा नहीं है, बल्कि गौ-वध की अनुमति देने वाला और मौन रहने वाला भी उसी पाप का भागी है। जो अपने मतदान से ऐसी सरकारों को चुनते हैं जो गौ-वध नहीं रोक पा रहीं, वे भी कल्पों तक नर्क के भागी होते हैं।

निर्णायक कदम: शंकराचार्य चतुरंगिणी का गठन –
अंत में महाराजश्री ने धर्म की रक्षा हेतु ‘शंकराचार्य चतुरंगिणी’ की घोषणा की। जो सन्त समाज में व्याप्त अशास्त्रीयता और अधर्म को दूर करने का कार्य करेगी। उन्होंने कहा कि धार्मिक समाज में धर्मनिरपेक्ष शपथ नहीं, बल्कि ‘धर्म की शपथ’ ही चलेगी।

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