अजय चौहान || भविष्य पुराण में लिखा है कि कलयुग काल में जब वेदों एवं देवों की वाणी यानी ब्राह्मी वाणी या लिपि से अलग जब अन्य कई प्रकार की लिपियां विकसित होने लगेंगी और उनका प्रचार होने लगेगा तब समझ लेना कि उन भाषाओं का प्रयोग करने वाले लोग ही सबसे अधिक कलयुग के भी जनक और प्रचारक होंगे।
भविष्य पुराण में यह भी लिखा है कि कलयुग में अनेक भाषाओं का उदय और प्रयोग इसलिए होता जाएगा ताकि उन भाषाओं के माध्यम से अपशब्द, अभद्रता और उपहास अधिकता में किया जा सकेगा। लोग उन अपशब्द, अभद्रता और उपहास आदि का प्रयोग करने वालों को सभ्य, आधुनिक तथा विकसित विचारों का जानकार उलटा उनका सम्मान भी करेंगे और उनसे डरेंगे भी। जबकि ब्राह्मी और वेदवाणी आई का प्रयोग करने वालों का ही वे लोग उपहास उड़ाएंगे और उनका अपमान भी करेंगे। वास्तव में ऐसे अपशब्द, अभद्रता से युक्त शब्द और ऐसे विचार ब्राह्मी वाणी या लिपि आना संभव ही नहीं हैं इसीलिए कलियुग में इन तमाम भाषाओं और बोलियों का उदय होना निश्चित हुआ है।
अगर बात करते हैं कलयुग की उन आधुनिक भाषाओं में से एक की तो मध्य एशिया के कुछ आधुनिक इतिहासकार भले ही उर्दू को अपनी भाषा और अपने आधुनिक लोगों द्वारा किया गया आविष्कार मानते हैं लेकिन इसका वास्तविक इतिहास तो पुराणों तक में वर्णित है और ये बात वे भी अच्छे से जानते हैं लेकिन कुछ लोग बता जाते हैं तो अधिकतर अपना वास्तविक और कलंकित इतिहास छुपा लेते हैं। जबकि पश्चिम भारत यानी आज के अफगानिस्तान, तुर्की ईरान आदि में ऋज्राश्व नाम का एक ऋषि था। जरदस्त्र नाम का जिसका दौहित्र (नाती) था, वह ब्राह्मणों से द्वेष रखता था। दरअसल, उसी के नाम से आज के पश्चिमी एशिया के अधिकतर इतिहास को जाना जाता है। असल में यरूशलम और अन्य कई भूभागों का इतिहास उसी ऋषि की देन है।
ब्राह्मणों से द्वेष रखने के कारण उसने ब्राह्मणों से संबंधित ब्राह्मी लिपि को छोड़कर, विपरीत (उल्टे) क्रम से लिखी जाने वाली खरोष्ठी (आज की उर्दू) नामक लिपि की कल्पना की और उसे साकार भी कर दिया। जबकि इसके पहले तक वहाँ ब्राह्मी लिपि ही चलती थी।
दरअसल, ब्राह्मी लिपि बाँई ओर से दाहिनी ओर लिखी जाती है, जबकि खरोष्ठी लिपि दाहिनी ओर से बांई ओर लिखी गई। स्वभाव और प्रकृति के अनुरूप ही खरोष्ठी लिपि शाकद्वीप तथा अन्य देशों में खूब प्रचलित हुई।
आगे चलकर इसी खरोष्ठी लिपि के विकार से अनेक ऐसी लिपियाँ भी उत्पन्न हुईं जो आज तक चल रहीं हैं, हालांकि वे सब खरोष्ठी की तरह उल्टी तो नहीं लिखी जाती लेकिन मूल भाषा से मिलती हैं। जरदस्त्र के अनुयायी लोगों का आचरण भी इसी लिपि के समान ही विपरीत था इसलिए उन लोगों में यह जल्दी फैलने लगी। आगे चलकर वहां से कई लोग भारत भूमि पर आए और अपने साथ उस खरोष्ठी भाषा और लिपि को भी लाए।
भारत में भी धीरे धीरे खरोष्ठी लिपि व्यवहार में आने लगी। जबकि यहां पहले से ब्राह्मी लिपि चलती थी। इस प्रकार यहां दोनों प्रकार की लिपियों का प्रसार-प्रचार होता चला गया और जिसके कारण धीरे-धीरे ब्राह्मी लिपि तथा खरोष्ठी दोनों ही लिपियों में कुछ-कुछ विकृतियाँ आने लगीं।
इस बात को हजारों वर्ष बीत चुके थे। किंतु भारत का भूभाग देवभूमि होने के कारण नकारात्मक स्वभावों और लोगों से दूर ही रहता था इस कारण खरोष्ठी लिपि को पनपने का उचित अवसर नहीं मिल पा रहा था। लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। युग परिवर्तन हुआ और काल के प्रभाव के अनुसार ही मूल हिंदुओं का अपनी ब्राह्मी लिपि से धीरे-धीरे मोह भंग होने लगा।
हालांकि फिर भी भारत भूमि पर इसका आम लोगों के बीच प्रचार और उपयोग इसी कलयुग के आते-आते तब शुरू हुआ जब चंद्रगुप्त मौर्य के पोते यानी बिम्बसार के पुत्र सम्राट अशोक ने अपने शासनकाल में बौद्ध अनुयाइयों को दिल खोल कर शरण दी और फलने-फूलने के लिए उनका खूब सहयोग भी किया। उसका दुष्परिणाम ये हुआ कि उन्हीं बौद्धों के अनावश्यक शांति संदेशों के दुष्प्रभावों के कारण हमारी पश्चिमीन सीमाएं लगातार कमजोर होने लगीं और तभी भारत की पश्चिमी सीमा से यानी आज के अफगानिस्तान, तुर्की ईरान आदि क्षेत्रों से वे आताताई लोग शांति संदेशों की आड़ में अपना लाभ लेने के लिए आसानी से भारत में प्रवेश करने लगे जो खरोष्ठी भाषी यानी म्लेच्छ थे।
इस प्रकार ब्राह्मी लिपि से अलग यानी बाँई ओर से चलने वाली तथा दाहिनी ओर से चलने वाली दोनों ही प्रकार की कई विकृत लिपियाँ हैं जो आज तक प्रायः समस्त स्थानों पर देखी जाती हैं।
