भविष्य पुराण के चतुर्थ अध्याय में लिखा है कि “दस वर्ष का ब्राह्मण बालक 100 वर्ष के क्षत्रिय के लिये पिता के समान है।” जबकि यही 10 वर्ष का ब्राह्मण बालक वैश्य का पितामह तथा शूद्र का प्रपितामह जैसा पूज्य है।”
भविष्य पुराण में यह भी लिखा है कि किसी भी व्यक्ति के माननीय कहे जाने के 5 कारण हैं जिनमें — धन, बन्धु, अवस्था, कर्म तथा विद्या प्रमुख हैं। इनमें धन की अपेक्षा बन्धु, बन्धु की अपेक्षा अवस्था, अवस्था की अपेक्षा कर्म तथा कर्म की अपेक्षा विद्या को सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
इसके अलावा भविष्य पुराण में यह भी लिखा है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य— इन तीनों में से जिसमें पाँचों गुण अधिक हों, वही सबसे अधिक सम्मान के योग्य कहा गया है। शूद्र भी यदि वयोवृद्ध है, तब वह भी इसी प्रकार से सम्मान का पात्र है।
ब्राह्मणं दशवर्षं च शतवर्षं च भूमिपम्। पितापुत्रौ विजानीयाद्ब्राह्मणस्तु तयोः पिता ॥ ६८॥
इत्येवं क्षत्रियपिता वैश्यस्यापि पितामहः । प्रपितामहश्च शूद्रस्य प्रोक्तो विप्रो मनीषिभिः ।। ६९ ।।
वित्तं बन्धुर्वयः कर्म विद्या भवति पञ्चमी। एतानि मान्यस्थानानि गरीयो यद्यदुत्तरम्॥ ७० ॥
पञ्चानां त्रिषु वर्गेषु भूयांसि गुणवन्ति च। यस्य स्युः सोऽत्र मानार्हः शूद्रोऽपि दशमीं गतः ।। ७१॥
दरअसल ब्राह्मण के इस सम्मान का कारण ये है की उसके पास विद्या की वो क्षमता है जिसके दम पर वह साधारण मनुष्यों को भी ईश्वर से साक्षात्कार करवा सकता है या वहां तक जाने का मार्ग दिखला सकता है। लेकिन इसके बावजूद आज के राजनेता और राजनीति ही नहीं बल्कि साधारण लोग भी उनका उपहास उड़ाते हैं।
