पंडित राजकुमार मिश्र || भारतभूमि केवल एक भौगोलिक भूखंड नहीं है। यह ऋषियों, तपस्वियों, आचार्यों और सनातन साधना की भूमि है। यहाँ के पर्वत, वन, नदियाँ और तीर्थ केवल पर्यटन के स्थल नहीं, बल्कि हमारी आध्यात्मिक परंपरा की जीवित धरोहर हैं।
इसीलिए जब किसी पवित्र तीर्थ या तपोभूमि पर धर्म और प्रकृति की मर्यादा के विपरीत आचरण दिखाई देता है, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या हम अपनी ही आध्यात्मिक विरासत के प्रति संवेदनशील रह गए हैं?
विशेष रूप से बदरिकाश्रम और बद्रिकावन की परंपरा भारतीय धार्मिक चेतना में अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण है। पुराणों तथा महात्म्य-परंपराओं में इस क्षेत्र को भगवान विष्णु की तपोभूमि तथा महान ऋषियों की साधना-भूमि के रूप में वर्णित किया गया है। ऐसी पवित्र भूमि के विषय में हमारी दृष्टि केवल पर्यटन अथवा मनोरंजन की नहीं, बल्कि श्रद्धा, मर्यादा और संरक्षण की होनी चाहिए।
कलियुग के संबंध में शास्त्रीय साहित्य में धर्म के क्रमशः क्षीण होने का वर्णन मिलता है। ‘धर्म के एक पाद पर स्थित रहने’ का प्रसिद्ध रूपक भी इसी नैतिक अवनति की ओर संकेत करता है। इसका अर्थ यह नहीं कि किसी एक वर्तमान घटना को सीधे शास्त्र में वर्णित घटना घोषित कर दिया जाए; बल्कि यह हमारे लिए आत्मचिंतन का विषय है कि धर्म, तप, तीर्थ और प्रकृति के प्रति हमारी सामूहिक संवेदना किस दिशा में जा रही है।
ऐसे समय में आदि शंकराचार्य द्वारा प्रतिष्ठित दशनामि संन्यास-परंपरा और चारों शंकराचार्य पीठों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यह परंपरा केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं रही, बल्कि वेद, उपनिषद्, धर्मशास्त्र और अद्वैत वेदान्त की अखंड परंपरा के संरक्षण का दायित्व भी निभाती रही है।
आज आवश्यकता किसी व्यक्ति, दल अथवा सरकार के प्रति अंध-विरोध की नहीं है। आवश्यकता है कि धर्म के प्रश्नों पर शास्त्र, परंपरा और सत्य को आधार बनाया जाए तथा तीर्थों की पवित्रता, प्रकृति की रक्षा और सनातन मर्यादाओं के संरक्षण के लिए शांतिपूर्ण एवं वैधानिक स्वर में अपनी बात रखी जाए।
राजनीतिक संरक्षण अथवा सत्ता-समीपता को धर्म का प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार किसी व्यक्ति के बड़े अनुयायी-वर्ग को भी उसके आध्यात्मिक प्रामाणिक होने का स्वतः प्रमाण नहीं माना जा सकता। धर्म का वास्तविक आधार शास्त्र, सदाचार, साधना, त्याग और आचार्य-परंपरा है।
इसलिए आज आवश्यकता है कि हम शंकराचार्य परंपरा के प्रति पूर्वाग्रह छोड़कर उसके मूल स्वरूप और दायित्व को समझें। साथ ही प्रत्येक संत, महात्मा और धार्मिक संस्था का मूल्यांकन भी उसके आचरण और शास्त्रीय मर्यादा के आधार पर करें।
तीर्थों की पवित्रता केवल संतों की जिम्मेदारी नहीं, हम सभी की जिम्मेदारी है। धर्म की रक्षा केवल नारे से नहीं, धर्मानुकूल आचरण से होगी। और सनातन परंपरा की रक्षा केवल विरोध से नहीं, उसके मूल ज्ञान को समझने और जीवन में उतारने से होगी।
॥ धर्मो रक्षति रक्षितः ॥
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