अजय सिंह चौहान | मध्य प्रदेश के कटनी जिले में विजय राघवगढ़ नाम के एक छोटे से कस्बे में करीब 200 वर्ष पूर्व निर्मित एक दुर्ग है जो “विजय राघवगढ़ का किला” के नाम से पहचाना जाता है। यह किला आज भी अपने भीतर इतिहास, धर्म, लोकविश्वास और 1857 की क्रांति से जुडी शौर्य की अनगिनत कहानियाँ समेटे हुए खड़ा है। यहाँ की प्रकृति, पर्वत, नदियाँ, वन और दुर्ग की संरचना केवल पत्थरों से निर्मित संरचना ही नहीं हैं, बल्कि क्षेत्रीय गौरव, धार्मिक आस्था, परंपरागत राजवंशीय शौर्य की गाथाओं से ओतप्रोत और कई प्रकार से संघर्ष की स्मृतियों से जुड़े इस दुर्ग में अतीत के साथ-साथ वर्तमान को भी आकर्षित करता है।
भौगोलिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्त्व के अनुसार, “बुंदेलखंड” और “बघेलखंड” मध्य भारत के दो प्रमुख क्षेत्र हैं जो भारत के प्रायद्वीपीय पठार का प्राकृतिक हिस्सा हैं। विजय राघवगढ़ का यह किला “बघेलखंड क्षेत्र” के कटनी जिले के अंतर्गत आता है। इसलिए इस गढ़ का इतिहास समझने के लिए आवश्यक है कि हम इसके लोकस्मृतियों, प्राचीन और क्षेत्रीय पृष्ठभूमि के साथ मध्यकालीन राजनीतिक परिस्थितियों में जाकर मुगलकालीन प्रभावों और आधुनिक युग की स्थिति को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखें और फिर निर्णय करें की इस किले का इतिहास आज भी हमारे लिए कितना महत्त्व रखता है।
लोकजीवन की सांस्कृतिक विरासत –
सबसे पहले तो हमें ये समझना चाहिए कि भारत के लगभग हर एक दुर्ग का निर्माण केवल सुरक्षा और शासन की आवश्यकताओं के कारण ही नहीं हुआ करते थे, बल्कि इन दुर्गों के आस-पास मंदिर, देवी-देवताओं के स्थान, धार्मिक परंपराएँ और स्थानीय लोककथाएँ भी विकसित होती रहती थीं। विजय राघवगढ़ दुर्ग के इतिहास को भी इसी व्यापक सांस्कृतिक परंपरा के संदर्भ में देखा जा सकता है।

दुर्ग का नामकरण –
इसके ‘विजय राघवगढ़‘ नाम के विषय में कहा जाता है कि ‘विजय‘ और ‘राघव‘ शब्द भारतीय सांस्कृतिक चेतना के आधार पर लिए गए हैं। यहां “विजय” का संबंध जीत, सफलता, पराक्रम और धर्म की स्थापना से है, जबकि “राघव” शब्द भगवान श्रीराम के लिए प्रयोग होता है।
ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार, बुंदेलखंड और बघेलखंड क्षेत्र में रामकथा, शिवोपासना, देवी-पूजा और ग्रामदेवताओं से संबंधित अनेक लोकपरंपराएँ अनादिकाल से प्रचलित रही हैं। यही कारण है कि यहां विजय राघवगढ़ से जुड़ी किसी विशेष पौराणिक कथा, धार्मिक घटना या इसकी प्राचीनता के बारे में अलग से पुष्टि करने की आवश्यकता भी नहीं है।
क्षेत्रीय सभ्यताओं और राजसत्ताओं की पृष्ठभूमि –
कटनी जिले के आसपास का भू-भाग प्राचीनकाल से ही मध्य भारत की भौगोलिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए व्यापक क्षेत्र के रूप में रहा है। जबकि विंध्याचल पर्वतमाला के निकटवर्ती भूभाग, वन-संपदा और जलस्रोतों को जोड़ने वाले मार्गों ने इस क्षेत्र को ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बनाया है। इसी तरह मध्य भारत में अलग-अलग कालखंडों में अनेक जनसमुदायों, स्थानीय शासकों और क्षेत्रीय राजवंशों का प्रभाव रहा है।
हालाँकि, किसी क्षेत्र की प्राचीनता और उसमें निर्मित दुर्ग का निर्माण-काल दो अलग-अलग विषय होते हैं, इसीलिए कटनी क्षेत्र की प्राचीनता के आधार पर यह निष्कर्ष थोड़ा मुश्किल हो सकता है। कहा जाता है कि विजय राघवगढ़ का किला भी उसी प्राचीन काल में निर्मित हुआ था, फिर भी इसके निर्माण की तिथि, आरंभिक स्थापत्य स्वरूप और संस्थापक के संबंध में प्रामाणिक ऐतिहासिक स्रोतों का सहारा लेना आवश्यक हो जाता है।

हालाँकि सम्पूर्ण भारत में ऐसे ही और भी कई दुर्ग हैं जिनका विकास अनादिकाल से माना जाता रहा है और प्रारंभिक काल से ही दुर्ग निर्माण का कार्य किसी ऊंचे स्थान पर सुरक्षा चौकी या छोटी गढ़ी के रूप में बनाई जाती रही है। दुर्गों की स्थिति का चुनाव सामान्यतः प्राकृतिक सुरक्षा, जल की उपलब्धता, आवागमन के मार्गों पर नियंत्रण और आसपास के कृषि क्षेत्र की रक्षा को ध्यान में रखकर ही किया जाता था।
विजय राघवगढ़ जैसी ऐतिहासिक संरचनाओं का निर्माण भी इसी दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इसकी निर्माणशैली, धार्मिक संरचनाओं और कई स्थानीय अभिलेखों का अध्ययन क्षेत्रीय इतिहास की अनेक कड़ियों को जोड़ती है। स्थानीय लोगों और पुरातत्ववेत्ताओं का मानना है कि यदि यहां भी ईमानदारी से सर्वेक्षण, शिलालेखों का अध्ययन और राजस्व अभिलेखों की पड़ताल हो जाएं तो इसके आरंभिक इतिहास को अधिक स्पष्ट करने में चौकाने वाले ऐतिहासिक खुलासे हो सकते हैं।
यहां हम ये कह सकते हैं की विजय राघवगढ़ क्षेत्र से जुड़ा प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास केवल किसी एक तिथि या एक राजा तक ही सीमित नहीं रहा है, बल्कि यह उस व्यापक ऐतिहासिक परिदृश्य का हिस्सा है जिसमें मध्य भारत की स्थानीय राजनीतिक शक्तियों, सामाजिक जीवन और सांस्कृतिक परंपराओं ने परस्पर एक-दूसरे को बहुत अधिक प्रभावित किया।
विजय राघवगढ़ दुर्ग का निर्माण –
विजय राघवगढ़ किला मुख्य रूप से राजपूत और बुंदेलखंड स्थापत्य शैली के अनूठे मिश्रण से बना हुआ है। कटनी जिला प्रशासन के ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, इसकी वर्तमान संरचना का निर्माण विजय राघवगढ़ रियासत के राजा प्रयागदास जी के नेतृत्व में सन 1826 ईस्वी में आरंभ हुआ था और इसे पूरा होने में अगले कई वर्ष लग गए। जबकि कुछ स्थानीय लोगों का मानना है कि किला तो यहां पहले से ही मौजूद था, जबकि राजा प्रयागदास जी ने तो किले का जीर्णोद्धार करवाया था। यानी वर्तमान संरचना को बने हुए अभी ठीक से दो सौ साल भी नहीं हुए हैं। इसलिए इसको हम मुग़लकाल से भी नहीं जोड़ सकते। दरअसल, प्रयागदास जी को इस क्षेत्र की जागीर मिलने के बाद यहाँ जो एक सुदृढ़ राजकीय केंद्र विकसित हुआ यह उसका मुख्यालय हुआ करता था।
जिला प्रशासन के विवरण में विजय राघवगढ़ दुर्ग की विशेषता इसकी रक्षात्मक शैली की संरचना मानी जाती है, जिसमें इसके दो तरफ नदियों और तीसरी ओर पहाड़ी से मिलने वाली प्राकृतिक सुरक्षा है। किले की दीवारें, प्रवेश द्वार, बुर्ज और अन्य रक्षात्मक व्यवस्थाओं का होना इस बात को दर्शाता है कि इसके निर्माण में सुरक्षा को विशेष महत्त्व दिया गया था।
किले के भीतरी हिस्सों में स्थित रंगमहल, रानियों और अन्य महिलाओं के निवास, राघवजी का मंदिर और स्थापत्य अवशेष से इसके राजसी जीवन की झलक को दर्शाते हैं। रंगमहल की नक्काशी मनमोहक और कलात्मकता का परिचय देती है, जबकि रानियों के निजी जीवन और महल की आंतरिक व्यवस्था के लिए बने कक्ष भी अपनी भव्यता को दर्शाते हैं। महल के लिए बावड़ी और जल-संग्रह की व्यवस्थाएँ भी इस दुर्ग के आम जीवन में पानी के महत्त्व को बतातीं हैं।

यानी हम कह सकते हैं कि विजय राघवगढ़ दुर्ग मात्र एक सैनिक चौकी ही नहीं था बल्कि उस समय के लिए यह एक प्रशासनिक गतिविदियों, राजपरिवार, धार्मिक आस्था, प्राचीन एवं परंपरागत स्थापत्य कला और स्थानीय अर्थव्यवस्था का के परिचय का केंद्र भी हुआ करता था।
विजय राघवगढ़ का मुगलकालीन इतिहास –
हालाँकि जब इस दुर्ग का निर्माण कार्य प्रारम्भ हुआ उस समय तक मुग़लों का दौर लगभग समाप्त हो चूका था। वैसे भी बुंदेलखंड और बघेलखंड पर मुग़ल शासकों के प्रभाव इतने अधिक देखने को नहीं मिले थे जितने समझे जाते हैं। यही कारण है कि बुंदेलखंड, बघेलखंड और आसपास के लगभग सभी मध्य भारतीय क्षेत्रों में स्थानीय हिन्दू राजवंशों ने अपनी राजनीतिक पहचान जस की तस बनाए रखी। पहले मुगल सत्ता और फिर अंग्रेज़ों के आने के बाद भी क्षेत्रीय शासकों ने अपनी-अपनी सैन्य शक्ति, भू-राजस्व व्यवस्था और किलों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देना नहीं छोड़ा था। इसीलिए विजय राघवगढ़ समृद्धशाली विरासत के तौर पर विकसित होता जा रहा था।
संभव है कि विजय राघवगढ़ दुर्ग के निर्माण से पहले यहां के व्यापक भू-भाग पर विभिन्न क्षेत्रीय शक्तियों का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष प्रभाव रहा हो, लेकिन इसके निर्माण में किसी विशिष्ट मुगल शासक का, प्रत्यक्ष नियंत्रण अथवा यहाँ हुए किसी युद्ध का दावा करने के लिए हमें ऐसे कोई प्रमाण नहीं मिलते। दरअसल, इतिहास की सुंदरता केवल वीरगाथाओं में नहीं, बल्कि तथ्यों की ईमानदार व्याख्या में भी निहित होती है।
विजय राघवगढ़ दुर्ग में सुरक्षा, सौंदर्य का संगम –
किसी दुर्ग की पहचान केवल उसकी ऊंचीं दीवारों से नहीं होती, बल्कि उसकी संपूर्ण योजना से होती है। उसी तरह से विजय राघवगढ़ दुर्ग की स्थापत्य विशेषताएँ भी उसके ऐतिहासिक महत्त्व को और अधिक बढ़ाती हैं। इसकी सुरक्षा-दीवारें, प्रवेशद्वार, निगरानी-चौकियां, जल-संग्रह की व्यवस्थाएँ और राजमहल के विभिन्न हिस्से मिलकर एक ऐसी संरचना को दर्शाते हैं जो शासन और रक्षा दोनों के लिए उपयोगी होती है।
जानकारों का मानना है कि विजय राघवगढ़ किले के निर्माण के दौरान प्राकृतिक और भौगोलिक परिस्थितियों में कुछ हद तक इसकी उपयोगिताओं के आधार पर बदलाव किया गया था। साथ ही किले के भीतर की इमारतों में उपयोगिता के साथ सौंदर्य का भी ध्यान रखा गया था। रंगमहल की कलात्मक सज्जा, दीवारों की नक्काशी और राघवजी का मंदिर इस बात का संकेत है कि राजकीय जीवन में धर्म और कला का महत्त्व क्या रहता था। ऐसे दुर्गों में धार्मिक स्थल केवल पूजा के स्थान ही नहीं होते थे; बल्कि वे शासक परिवार की आस्था, सांस्कृतिक पहचान और दिनचर्या में सामाजिक जीवन का भी हिस्सा होते थे।
1857 की क्रांति में विजय राघवगढ़ दुर्ग –
स्थानीय लोगों और इतिहासकारों के अनुसार, विजय राघवगढ़ क्षेत्र और दुर्ग के इतिहास का सर्वाधिक प्रेरक अध्याय सन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा हुआ था। दरअसल, जिस दौरान इसका निर्माण हो रहा था उस दौरान भारत के विभिन्न भागों में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध व्यापक असंतोष फैल रहा था। और इसके लगभग 30 वर्षों बाद सैनिकों के विद्रोह ने अनेक स्थानीय शासकों, जमींदारों और आम लोगों ने अंग्रेजी सत्ता का जो विरोध किया उसमें विजय राघवगढ़ का भी योगदान रहा।
स्थानीय लोगों और इतिहासकारों के अनुसार, विजय राघवगढ़ रियासत के राजा प्रयागदास जी के पुत्र राजा सरयू प्रसाद इस संघर्ष से जुड़ने वाले प्रमुख व्यक्तित्वों में गिने जाते हैं। कटनी जिला प्रशासन के अभिलेखों के अनुसार, उन्होंने क्षेत्रीय स्तर पर अंग्रेजों के विरुद्ध एक बड़े और शसक्त विद्रोह का नेतृत्व किया और निडर होकर इस किले को संघर्ष का महत्त्वपूर्ण केंद्र बना दिया। जिला प्रशासन के अनुसार सरयू प्रसाद के उस विद्रोह में शामिल होने की घटनाओं का विस्तृत विवरण अलग-अलग स्रोतों में मिलता है।
हालाँकि, अंग्रेजी सैन्य शक्ति ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम को दबा दिया। लेकिन तब तक उस संघर्ष के कारण विजय राघवगढ़ दुर्ग को भारी क्षति पहुँच चुकी थी, और रियासत की स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता भी समाप्त हो गई। जिसके कारण इस क्षेत्र और इसके दुर्ग की परंपरागत राजकीय पहचान पर औपनिवेशिक शासन का अधिपत्य होता गया।
विजय राघवगढ़ दुर्ग के वर्तमान हालात –
दुर्ग की संरचना को देखने पर इसकी दीवारें आज भी हमें याद दिलाती हैं कि स्वतंत्रता का इतिहास केवल प्रसिद्ध सेनानायकों, बड़े नगरों और विशाल युद्धों का ही इतिहास नहीं रहा, बल्कि देश के लगभग सभी दूरस्थ क्षेत्रों में भी अनेक स्थानीय लोगों और रियासतों ने भी अपने-अपने अधिकारों और स्वाभिमान की रक्षा के लिए संघर्ष किया था। विजय राघवगढ़ क्षेत्र और इसका ये दुर्ग आज भी उसी क्षेत्रीय प्रतिरोध की एक महत्त्वपूर्ण स्मृति है।
विजय राघवगढ़ दुर्ग के कुल निर्मित क्षेत्रफल या इसकी चारदीवारी से घिरे परिसर के क्षेत्रफल का विवरण सरकारी स्रोतों में अब तक भी प्रमाणित रूप से देखने को नहीं मिला है। इसलिए यहां ये बताना मुश्किल है कि ये दुर्ग कितने एकड़ या हेक्टेयर में बना हुआ है और उस समय इसके निर्माण की लागत कुल कितनी रही होगी। हालाँकि ये दुर्ग भी अन्य प्राचीन दुर्गों की ही भाँती एक परंपरागत ऊँची चार दीवारी से घिरा हुआ है। चार दीवारी के भीतर एक सुन्दर महल, दरबार, मंदिर, आवासीय भवन और अन्य संरचनाओं द्वारा घेरा गया है।
वर्तमान परिस्थितियाँ और संरक्षण की आवश्यकता –
भले ही विजय राघवगढ़ का ये दुर्ग संवैधानिक शासन के आगे अनदेखी का शिकार होने के कारण जर्जर अवस्था में पहुंचता जा रहा है, लेकिन फिर भी ये अपने उसी गौरवशाली अतीत की स्मृतियों को संजोए हुए वर्तमान सत्ताओं की और मात्र इसलिए देख रहा है ताकी कोई तो आएगा जो इसकी संरचना का पुनः जीर्णोद्धार करेगा और संवारेगा। इसकी ऐतिहासिक दीवारें, धार्मिक स्थल, राजमहल के अवशेष और स्थापत्य कला आज भी स्थानीय परंपरा, इतिहास, वीरता और शौर्य से ओतप्रोत हैं और पर्यटकों, इतिहास प्रेमियों तथा शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र हैं।
विजय राघवगढ़ दुर्ग की वर्तमान दशा –
वर्तमान समय में विजय राघवगढ़ की जर्जर अवस्था बताती है की इसको अति शीघ्र एक बड़े जीर्णोद्धार कार्य की आवश्यकत है।
= किले की अधिकतर दीवारों, प्रवेशद्वारों और रंगमहल सहित अन्य सभी को पुरातात्त्विक सर्वेक्षण तथा नियमित संरक्षण की आवश्यकता को दर्शा रही है।
= किले से जुड़े प्रामाणिक इतिहास, अभिलेखों, स्थानीय लोककथाओं और इससे जुड़े मौखिक इतिहास को संकलित कर व्यवस्थित रूप से सुरक्षित किये जाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
= दूर-दूर से आने वाले पर्यटकों और शोधकर्ताओं की सुविधाओं का विशेष ध्यान रखते हुए किले तक मार्ग, सूचना-पट्ट, स्वच्छता, पेयजल और प्रशिक्षित स्थानीय गाइड जैसी प्राथमिक सुविधाओं पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
= स्थानीय समुदायों के साथ विद्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और स्थानीय नागरिकों को इस विरासत के संरक्षण के कार्यो से जोड़कर जागरूक अभियान चलाये जाएँ।
ऐसे ही तमाम इन प्रयासों से न केवल विजय राघवगढ़ दुर्ग की ऐतिहासिक पहचान सुरक्षित रह सकती है, बल्कि स्थानीय युवाओं के लिए पर्यटन, मार्गदर्शन और सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से रोजगार के अवसर भी विकसित हो सकते हैं। क्योंकि राघवगढ़ की पहचान केवल इस किले की जर्जर अवस्था तक ही सीमित नहीं है, बल्कि कटनी जिले की ऐतिहासिक पहचान का भी महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। स्थानीय प्रशासन ने भी इसे अपने प्रमुख ऐतिहासिक पर्यटन स्थलों में स्थान दिया है।
