Monday, June 22, 2026
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हिन्दुओं को आज कैसा नेता चाहिए? | Leader for Hindutva

अजय सिंह चौहान || भारत इस समय एक घोर सैक्युलरवादी देश है। इतना घोर सैक्युलरवादी की इसमें पाये जाने वाली उस विशेष सैक्युलर प्रजाति का कोई ईमान-धर्म है ही नहीं। यदि ईमान-धर्म है भी तो मात्र इतना कि दूसरा जाये भाड़ में। जबकि इसके पीछे का आंखे खोल देने वाला सच ये है कि यही घोर सैक्युलर प्रजाति फिलहाल अल्पसंख्यकों में स्थान रखती है, शासन आज भी उसी का और उसी के लिए चलता है, संविधान की तमाम धाराएं और तमाम कानून व्यवस्थाएं भी करीब-करीब उसी घोर सैक्युलरवादी का पालन करतीं हैं और बहुसंख्यक समाज यानी भारत का मूल निवासी उन सैक्युलरवादियों के घर का चूल्हा जलाने के लिए मात्र एक मुफ्त का मजदूर बन कर रह गया है।

हालांकि, इसी सैक्युलर देश में एक समुदाय ऐसा भी है जो कहने को तो वह बहुसंख्यक है और अपने आप को हिंदू होने पर गौरवान्वित महसूस करता है। लेकिन, ये भी सच है कि यही हिंदू अपने अधिकार और अपने अस्तित्व को उस अल्पसंख्यक घोर सैक्युलर से बचाने का भी प्रयास रहा है। भारत के बहुसंख्यक मूल निवावी, यानी हिंदुओं का हिंदुत्व अपने हक के साथ-साथ अस्तित्व के लिए इसलिए लड़ने का प्रयास कर रहा है क्योंकि वह अपने प्राचीन देश भारत की रक्षा भी करना चाहता है और मरना भी नहीं चाहता। लेकिन, साथ ही साथ इसी बहुसंख्यक हिंदू समुदाय के अधिकतर लोग ये भी चाहते हैं कि उन्हें वह सब कुछ मुफ्त में मिल जाये इसलिए वे भी अब धीरे-धीरे मुफ्तखोर यानी सैक्युलर होते जा रहे हैं।

जहां एक ओर कुछ कट्टर हिन्दू किसी भी हालत में तड़प-तड़प कर अपने हिंदुत्ववादी अस्तित्व को बचाये हुए हैं वहीं, एक कटू सत्य ये भी है कि आज के इस हालात के लिए वह खुद ही जिम्मेदार भी है। जिम्मेदार इसलिए क्योंकि वह चाहता तो है कि देश में एक बार फिर से भगत सिंह जैसा वीर योद्धा पैदा हो, महाराणा और शिवाजी जैसे अन्य कई योद्धा हों, लेकिन, उनके अपने घर में नहीं, बल्कि पड़ोसी के घर में, ताकि उनके खुद के घर का केई भी चिराग उस लड़ाई से दूर रहे, या उसके घर में किसी भी प्रकार से उस धर्मयुद्ध के दौरान मातम न मनाया जाये। वह तो बस खिड़की खोल कर यह देखना चाहता है कि उसके हक की लड़ाई में कौन-कौन लड़ रहा है और उसका नतीजा उसके अनुसार हो भी रहा है कि नहीं।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इसी घोर सैक्युलर देश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा यानी यहां की मूल हिंदू आबादी अपने हिंदूत्व के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ने के मुड़ में दिख रही है। इसे पूरी तरह से यह नहीं कहा जा सकता है कि वह फिर से उसी प्रकार का हिंदू राष्ट्र होना चाहता है जैसा कि चैदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दियों तक हुआ करता था। बहुसंख्यक हिंदू ये बात जानता है कि इसमें खतरे बहुत हैं लेकिन, प्रयास तो किया ही जा सकता है। इसमें कोई गुप्त या घातक तैयारियां नहीं बल्कि खुलेआम और सामाजिक प्रयासों के द्वारा आम हिंदुओं को जागृत कर उन्हें फिर से अपनी शक्तियों को जगाने के लिए प्रयास किया जा रहा है।

हैरानी होती है कि हिंदू राष्ट्र और हिंदुत्व का सपना देखने वालों में न तो कोई RSS और न ही कोई राष्ट्रवादी पार्टी या कोई राजनेता जैसा संगठन या ठेकेदार हैं। बल्कि यह कार्य तो एक आम हिंदू और विशेषकर युवा शक्ति इसमें अपने-अपने स्तर पर योगदान देकर अपने पूर्वजों और बुजुर्गों के उस सपने को पूरा करने का प्रयास कर रही है और अपने एवं अपनी आने वाली पीढ़ियों की रक्षा करने के लिए आगे आ रहे हैं।

रही बात आर.एस.एस. की तो सीधे-सीधे इसमें यही कहा जा सकता है कि हिन्दू और हिंदुत्व के नाम और दम पर अपने आपको जो व्यक्ति सबसे बड़ा मानता है वही मोहन भागवत जैसा महान व्यक्ति यदि उन्हीं घोर सैक्युलरवादी अल्पसंख्यकों के मंच से यह कह दे कि हम सब का डीएनए एक ही है इसलिए हमें मूर्तिपूजा को भी छोड़ देना चाहिए तो फिर समझ लेना चाहिए कि भला ऐसा मंच और ऐसी विचारधारा वाला संगठन हिंदू राष्ट्र और हिंदुत्व का सपना भला कैसे दिखा सकता है।

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यह सच है कि अपने आप को भारत के मूल निवासियों और बहुसंख्यकों का ठेकेदार समझने वाले RSS के श्रीमान मोहन भागवत जी खुलेआम उस घोर सैक्युलरवादी विचारधारा के मंच से यह ज्ञान दिया था कि पूर्ति पूजा को छोड़ कर पूरी तरह से एक सैक्युलर हिंदू बन कर रहने में ही भलाई है। लेकिन, हैरानी होती है कि श्रीमान मोहन भागवत जी ने यही ज्ञान उसी घोर सैक्युलरवादी मंच से खुद उन्हीं लोगों को क्यों नहीं दिया। सीधी सी बात है कि मोहन भागवत यह जानते हैं कि मेरी बात को कौन मान सकता है और कौन नहीं। कहा उसी को जा सकता है जो कहना मान ले। आज्ञा उसी को दी जानी चाहिए जो उसका पालन करे। फिर चाहे उस सलाह और उस आज्ञा का परिणाम कुछ भी निकले।

इधर सिक्के का दूसरा पहलू भी है। मोहन भागवत की नजर में उनके अनुयायियों में अगर लचर और लाचार दोनों ही प्रकार के हिंदू हैं तो दूसरी तरफ ऐसे भी हैं जो एक दम कट्टरतावादी सनातनी हिंदू हैं। सनातनी हिंदू आज भी किसी राजनेता या किसी सैक्युलर देश पार्टी को नहीं मानता और न ही आर.एस.एस. जैसे संगठन या उसके किसी मोहन भागवत जैसों के इशारों पर चलने के लिए तैयार है। क्योंकि आज भी एक सच्चा हिंदू और हिंदुत्व अपने निर्णय लेना जानता है।

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आज भले ही हम एक घोर सैक्युलरवादी विचारधारा के देश में रह रहे हैं। लेकिन अब हमें अच्छी बात ये देखने को मिल रही है कि इसमें अब भी हिंदू और हिंदुत्व किसी न किसी प्रकार से जीवित है। भले ही आर.एस.एस. जैसे संगठनों या फिर तमाम प्रकार की राजनीतिक और सैक्युलरवादी पार्टियों वाले इस देश में अब तक एक सच्चा हिंदू अपने अधिकार के लिए आवाज नहीं उठा सकता, लेकिन, वहीं अब धीरे-धीरे और दबी जबान में ही सही, आवाज तो उठनी शुरू हो ही चुकी है, बल्कि हिंदूत्ववादी यह आवाज अब इस कदर उठने लगी है कि भारत को एक हिंदू राष्ट्र घोषित करवाने तक भी पहुंच भी पहुंचने लगी है।

हालांकि, हिंदू राष्ट्र के लिए उठने वाली यह आवाज एक सपना भी हो सकता है। लेकिन, उसके लिए हिंदुओं को अपनी आवाज कुछ और जोर से उठानी होगी और सामुहिक तौर पर कुछ कड़े और दमदार निर्णय भी लेने होंगे। कुछ कड़े और दमदार निर्णयों में ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि हिंदुत्ववादी युवाओं को आतंकवादी या अलगाववादी के रूप में उभर कर सामने आना होगा। लेकिन, सामने तो आना ही होगा। उदाहरण के तौर पर यहां हम कह सकते हैं कि अश्विनी उपाध्याय के उस ‘‘भारत जोड़ो आंदोलन’’ की भांति जो जंतरमंतर पर हुआ था।

जाहिर सी बात है कि कड़े और दमदार निर्णय लेने के लिए हिंदुत्व को दमदार नेतृत्व की भी आवश्यकता पड़ेगी। तो ऐसे में यहां यही बात आती है कि हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए हिंदुत्व को आज कैसा नेता चाहिए? क्या नरेंद्र मोदी जैसा, अमित शाह जैसा या योगी आदित्यनाथ जैसा, हेमंत विश्वशर्मा जैसा, या फिर नरोत्तम मिश्र जैसा। तो ये तो रही नेताओं की बात। अब बारी आती है कि संतों में से वो कौन से संत हैं जो हिंदू राष्ट्र के लिए आवाज उठा रहे हैं? भले ही संतों में हमारे पास राजनेताओं से अधिक नाम हैं लेकिन, वे भी अब जोरशोर से इस आवाज को उठा भी रहे हैं और बिना सुरक्षा की परवाह के वे अब अपनी जान भी गंवाने को तैयार हैं।

रही बात इसमें आम जनता की तो जाहिर-सी बात है कि आम जनता में से हिंदू राष्ट्र के लिए हर मुहल्ले और क्षेध, हर जिले से आवाज तो उठने वाली है नहीं। अगर ऐसा होता तो हमारा देश 15 अगस्त सन 1947 वाले दिन से ही हिंदू राष्ट्र कहलाता। ऐसे में सन 47 से लेकर आज तक के तमाम राजनीतिक दल और तथाकथित समाजसेवी जो राजनीति के दम पर अपनी तिजोरियों में माता लक्ष्मी को कैद किये हुए चले आ रहे हैं उन्होंने ही इस शुभ कार्य में सबसे बड़ी बाधा बन कर इस कार्य को अपने लाभ के चक्कर में उलझा कर रखा हुआ है।

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लेकिन, बंटवारे के बाद मिली उस सन 1947 की आजादी के बाद भी हिंदू उन घावों को भूला नहीं है। भले ही उन न भूलने वाले हिंदुओं की संख्या अब समय के साथ-साथ कम होती जा रही है लेकिन, फिर भी उनकी संख्या के आधार पर कहा जा सकता है कि आज भी हिंदू राष्ट्र की कल्पना को साकार करने के लिए आवाजें तो उठ ही रहीं हैं। भले ही इसमें तथाकथित समाजसेवी और अन्य प्रकार के माता लक्ष्मी के परम पूजक राजनेताओं ने अडंगा डाल रखा है।

आज हिंदू और हिंदुत्व की समस्या ये है कि उनके समाज के कई तथाकथित संत देश के तमाम क्षेत्रों में मंदिरों और धर्म के नाम पर मुफ्त की जमीने हथियाकर उन पर कब्जा जमाए बैठे हैं, उनसे भला ये उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे भी अपने निजी हितों से ऊपर उठ कर हिंदू और हिंदुत्व की बात करें। सच तो ये है कि जो तथाकथित संत आज राजनेताओं और राजनीतिक पार्टियों की चापलूसी के दम पर अपनी-अपनी तोंद फुलाए बैठे हैं वे ही आज हिंदू और हिंदुत्व की समस्याओं को उजागर नहीं होने दे रहे हैं।

लेकिन, फिर भी कहीं न कहीं सोशल मीडिया के इस दौर में आज एक बार फिर से न सिर्फ एक आम हिंदू की आवाज को सूना जा सकता है बल्कि उसके प्रताढ़ित दर्द को भी महसूस किया जा सकता है। देश के किसी भी दूरदराज के क्षेध में बैठे एक आम सनातनी की आवाज में भी अब हिंदू राष्ट्र के सपने को साकार करने जैसे शब्दों की खनक सुनाई देने लगी है।

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देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
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