Thursday, June 18, 2026
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सूरज को ठंडा करने में जुटे वैज्ञानिक कहीं अनर्थ न कर बैठे

दुनिया की कई बड़ी कंपनियों ने मिलकर अब ये विचार किया है की क्यों न भगवान सूर्य के क्रोध यानी तपन को कम करने की नई तकनीक पर काम शुरू कर दिया जाय. यानी अगर ये कंपनियां इसमें सफल हो जाती हैं तो वे यहाँ भी खूब पैसा कमाने लग जाएंगे। क्योंकि जिस प्रकार से वैज्ञानिकों ने पहले तो पृथिवी का तापमान बढ़ाने के लिए अनावश्यक प्रयोगों पर कार्य किया और प्राकृतिक संसाधनों का खूब दोहन किया और ग्लोबल  वार्मिंग करके पृथिवी पर विनाशलीला को आमंत्रित किया। अब यही वैज्ञानिक पृथिवी के उस तापमान को कृत्रिम तरीकों से कम करने के लिए भी एकजुट हो रहे हैं और ईश्वर की इस रचना के साथ खिलवाड़ करने का एक और आपराधिक प्रयास कर रहे हैं। सीधे सीधे कहें तो हमारे वैज्ञानिक पृथिवी पर तबाही लाने की कोशिश कर रहे हैं।

खबरों के अनुसार, “ब्रिटिश एनजीओ डिग्रीज इनिशिएटिव” ने न सिर्फ ऐलान किया बल्कि इसपर कार्य करना भी शुरू कर दिया है, जिसके तहत “सोलर जियोइंजीनियरिंग” नामक एक प्रोजेक्ट चलाया जाएगा और इस प्रोजेक्ट के लिए लगभग नौ लाख डॉलर का खर्च किया जाएगा। इस खर्च के अंतर्गत फिलहाल यह रिसर्च कुल 15 देशों में की जा रही है। इस एनजीओ के अलावा और भी कुछ संस्थाएं हैं, जो इस विषय पर फंडिंग कर रही हैं, जबकि हार्वर्ड और ऑक्सफोर्ड जैसी प्रसिद्ध शिक्षण संस्थान मिलकर इसपर रिसर्च कर रही हैं।

 

कहां से मिला यह आईडिया –

खबरों के अनुसार वैज्ञानिकों को यह आईडिया तब आया जब फिलीपींस में स्थित माउंट पिनेताबू नाम के ज्वालामुखी में जून 1991 में  विस्फोट हुआ। यह विस्फोट सदी का सबसे बड़ा विस्फोट माना गया। इस विस्फोट से फैली राख आसमान में लगभग 28 मील तक छा गई। इसके बाद से अगले करीब 15 महीनों तक पूरी दुनिया का तापमान लगभग 1 डिग्री तक कम हो गया था। क्योंकि इसकी राख के कारण सूरज की किरणें उस क्षेत्र की धरती तक पहुंच ही नहीं पा रही थीं. बस यहीं से वैज्ञानिकों को यह नया आइडिया आया और उन्होंने सोचा कि अगर सूरज और वायुमंडल के बीच किसी कृत्रिम चीज की एक परत खड़ी कर दी जाए तो सूरज की किरणें हम तक सीधे सीधे नहीं पहुंचेंगी और धरती का तापमान कम हो जाएगा।

 

क्या होगी नई तकनीक –

खबरों के अनुसार कहा जा रहा है कि सूरज की धूप को कम करने की तकनीक कुछ उसी प्रकार से काम करेगी, जैसे किसी तेज़ गर्म चीज पर पानी का छिड़काव होने से वह जल्दी ठंडी हो जाती है। वैज्ञानिकों ने इसे “सोलर जियोइंजीनियरिंग” का नाम दिया है. इस प्रोसेस के तहत वैज्ञानिक कई सारे बड़े बड़े गुब्बारों के जरिए वायुमंडल के ऊपरी हिस्से जिसे अंग्रेजी में स्ट्रैटोस्फीयर कहा जाता है उसपर सल्फर डाइ ऑक्साइड का छिड़काव करेंगे। “स्ट्रैटोस्फीयर” एक ऐसी परत है जो प्राकृतिक तौर पर वायुमंडलीय तापमान के वातावरण को बनाये रखने का काम करती है।

दरअसल, इस तकनीक के द्वारा जिस सल्फर डाइ ऑक्साइड का छिड़काव किया जाएगा उससे सूर्य की तेज किरणों को परावर्तित कर दिया जाएगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे धरती को तेज धूप और भीषण गर्मी से छुटकारा मिल सकेगा।

Solar Geoengineering Research Project 3
सोलर जियोइंजीनियरिंग रिसर्च प्रोजेक्ट तकनीक के द्वारा जिस सल्फर डाइ ऑक्साइड का छिड़काव किया जाएगा उससे सूर्य की तेज किरणों को परावर्तित कर दिया जाएगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे धरती को तेज धूप और भीषण गर्मी से छुटकारा मिल सकेगा।

अन्य तकनीकों पर भी चल रहा है काम –

सल्फर के छिड़काव की इस तकनीक के अलावा वैज्ञानिक कई दूसरे तरीकों की भी खोज कर रहे हैं, जिनमें से एक है- “स्पेस सनशेड”। “स्पेस सनशेड” की तकनीक में अंतरिक्ष में दर्पण जैसी किसी वस्तु के द्वारा सूर्य की किरणों को परावर्तित करके उनका रास्ता बदल दिया जाएगा। इसके अलावा “क्लाउड सीडिंग” तकनीक पर भी विचार किया गया। “क्लाउड सीडिंग” के जरिये हवा में लगातार समुद्री पानी से बादल बनाकर नमी रखी जाएगी ताकि गर्मी का सीधा असर पृथिवी पर कम हो सके। इसके अलावा कुछ अन्य छोटे विकल्प भी सुझाये गए जिसमें सभी इमारतों की छतों को सफेद रखा जाये।

गरीब देश हैं इस प्रयोग का टारगेट –

इस “सोलर जियोइंजीनियरिंग” रिसर्च प्रोजेक्ट का सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि इसमें ग्लोबल वार्मिंग कम करने का दावा करने के लिए सबसे पहले कुछ ऐसे देशों को चुना गया है जो गरीब या कम आय वाले देश हैं, जबकि ग्लोबल वार्मिंग के ज़िम्मेदार वे देश हैं जो ज्यादा प्रदूषण फैलाते हैं और वे सबसे अधिक विकसित हैं।

उदहारण के तौर पर हम देख सकते हैं कि एक आम भारतीय सालभर में करीब 1.8 मैट्रिक टन कार्बन डाइ ऑक्साइड पैदा करता है, जबकि एक औसत अमेरिकी व्यक्ति सालभर में करीब 14.7 मैट्रिक टन कार्बन डाइ ऑक्साइड पैदा करता है। ऐसे में ग्लोबल वार्मिंग के लिए ज़िम्मेदार सबसे अधिक बड़े देश हैं, जबकि “सोलर जियोइंजीनियरिंग” रिसर्च प्रोजेक्ट के लिए टारगेट गरीब या बहुत ही कम आय वाले देशों को बनाया जा रहा है. हालांकि खबरों की माने तो इसके लिए दुनियाभर के कई वैज्ञानिक इसपर भी एतराज उठा रहे हैं। क्योंकि इसके लिए रिसर्च का क्षेत्र या देश वैज्ञानिक नहीं बल्कि राजनेता ही चुनते हैं।

 

किसने लगाया इस प्रयोग पर बैन –

सूरज की धूप को कृत्रिम तरीके से कम करने के लिए वैज्ञानिकों ने “सोलर जियोइंजीनियरिंग” रिसर्च प्रोजेक्ट के तहत “मेक सनसेट्स” नाम की एक स्टार्टअप कंपनी के जरिये जब वर्ष 2022 के आखिर में सल्फर डाइ ऑक्साइड से भरे दो बड़े गुब्बारे मैक्सिको के आसमान पर भेजे, तो मैक्सिको सरकार ने अपने यहां तुरंत इस प्रयोग पर बैन लगा दिया। मैक्सिको सरकार का कहना है कि वायुमंडल की परत को किसी भी प्रकार की कृत्रिम और जहरीली गैस से ढंकना भले ही क्लाइमेट चेंज को रोकने का विकल्प हो सकता है, लेकिन पृकृति के साथ यह बहुत बड़ा और खतरनाक खिलवाड़ साबित हो सकता है।

 

क्यों खतरनाक है सोलर जियोइंजीनियरिंग –

दुनियाभर के कई अन्य वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों ने “सोलर जियोइंजीनियरिंग” के इस प्रयोग और इसके प्रभावों पर अपनी राय देते हुए पृकृति तथा मानवता के साथ छेड़छाड़ करने वाला अबतक का सबसे खतरनाक प्रयोग करार दिया है और इसको तुरंत बंद करने की सलाह दी है।

मेसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों का दावा है कि इस प्रयोग में इस्तमाल की जाने वाली किसी भी प्रकार की कृत्रिम गैस की वजह से सूरज की धूप आर्टिफिशियल ढंग से परावर्तित तो हो जाएगी, लेकिन इसके बाद पृथिवी पर भयंकर तरीके से सूखे और अकाल की आशंका बढ़ जाएगी।

सबसे बड़ा खतरा तो तब हो सकता है जब यही सल्फर गैस पृथिवी की ओजोन लेयर पर असर करेगी. क्योंकि यदि पृथिवी की ओजोन लेयर को नुकसान होता है तो इससे हमें खतरनाक अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाने वाली प्राकृतिक परत पतली होती जाएगी, जिससे किसी एक स्थान पर ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण पृथिवी पर कैंसर जैसी अन्य कई घातक बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाएगा और मानवता खतरे में पड़ जायेगी।

वैज्ञानिकों को डर है कि क्योंकि सल्फर डाइ ऑक्साइड अपने-आप में एक जहरीली गैस है, इसलिए  पृथिवी पर स्वांस सम्बन्धी दूसरी कई बीमारियां जन्म ले सकती हैं। इसके अलावा हमारे वायुमंडल में हमेशा के लिए कुछ ऐसे मानवजनित एरोसोल्स जमा हो सकते हैं, जिससे हमें आसमान का नीला रंग दिखना बंद हो जाएगा। क्योंकि अभी तक हम जिन एरोसोल के उदाहरणों को देखते आ रहे हैं उनमें कोहरा, धुंध, धूल, धुआं, आदि प्राकृतिक हैं और ये बिलकुल भी खतरनाक नहीं है।

– अजय चौहान

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देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
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