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कितना पुराना है हमारा देश | Ancient History of India

admin 17 August 2021
Lothal - Indus Valley Civilization in Gujarat
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अजय सिंह चौहान || भारतीय सभ्यता और संस्कृति कितनी पुरानी इै इस बात को लेकर अक्सर बहस छिड़ जाती है और कुछ लोग सिर्फ और सिर्फ यही बात दोहराते रहते हैं कि आर्य संस्कृति भारत में ज्यादा पुरानी नहीं है और इरान से आये हुए लोगों ने ही भारत में सभ्यता और संस्कृति के रूप में कदम रखा था। लेकिन, कई प्रकार की पुरातात्विक खोजों और प्राचीन भारतीय ग्रंथों से इस बात की पुष्टि होती है कि भारत की मानव सभ्यता का इतिहास हजारों वर्ष नहीं बल्कि लाखों-करोड़ों वर्ष पुराना है और इस बात के भी प्रमाण मिलते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप में और विशेषकर नर्मदा नदी के आसपास के क्षेत्रों में जब मानव सभ्यता और संस्कृति विकसित हो चुकी थी उस समय तक भी आधी से अधिक धरती पर मानव का अस्तितव ही नहीं था। हालांकि, सृष्टि की संरचना के आरंभ से लेकर कलियुग के आरंभिक दौर में हुए विक्रमादित्य जैसे महान सम्राट और फिर मध्य युगीन क्रुर मुगल शासकों से अंग्रेजी राज तक का भारतीय इतिहास बड़ा ही उतार-चढ़ाव भरा रहा है।

पौराणिक साक्ष्य –
भारत की मानव सभ्यता के इतिहास को लेकर एक ओर जहां सैकड़ों धार्मिक, पौराणिक और साहित्यीक साक्ष्य मिलते हैं वहीं कई पुरातनकालीन प्रमाणों में विभिन्न धर्मस्थलों से प्राप्त शिलालेख, पुरातन लेख, हजारों वर्ष पुरानी मुद्रा, कई स्मारकों के अवशेष, भित्तिचित्र, स्मारकों में प्रयोग किये जाने वाले खंभे, मूर्तियां, मिट्टी के बर्तन, खिलौने और अन्य अनेकों प्रकार के सामानों के आधार पर भी इस बात की पुष्टि होती है कि मानव सभ्यता और धर्म की शुरूआत भारत भूमि से ही हुई है।

रामायण जैसे पवित्र धर्म ग्रंथ में भी हजारों वर्ष पहले लिखी गई भारतभूमि की विस्तृत भौगोलिग जानकारियां हमें आज भी पढ़ने को मिलती हैं। इसके अलावा महर्षि वेद व्यास द्वारा रचित महाभारत को महत्वपूर्ण ऐतिहासिक साक्ष्यों से युक्त ग्रंथ माना जाता है। इसमें प्राचीन भारत की भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक परिस्थितियों का विस्तार से वर्णन मिलता है।

इसके अलावा ऐसे अन्य कई ऐतिहासिक और धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में भी इस बात की जानकारी मिलती है कि मात्र भारतीय इतिहास ही नहीं बल्कि संपूर्ण संसार के कालचक्र और सभी युगों की जानकारियों का विस्तारपूर्वक वर्णन हमारे विभिन्न धर्मग्रंथों ने ही आधुनिक दुनिया को दिया है।

पवित्र ग्रंथों में –
हमारे विभिन्न धर्मग्रंथों में इस बात के भी ठोस प्रमाण उपलब्ध हैं कि भाषा और संस्कृति का उद्गम भारत भूमि से ही हुआ है। सारी दुनिया के लोग आज भी धार्मिक मान्यताओं, उच्च आदर्शों, आध्यात्मिकता एवं सामाजिक गठन की प्रक्रियाों से संबंधित विभिन्न प्रकार के उदाहरणों और स्रोतो को खोजने और उन पर अध्ययन करने के लिए भारत भूमि पर आते हैं।

हमारे वैदिक ग्रंथों में जहां ऋग्वेद का विशेष महत्व है वहीं, जैन ग्रंथों में परिशिष्टपर्वन, भद्रबाहु का कल्प सूत्र, भद्रबाहुचरित्र, कथाकोष, लोक-विभाग, त्रिलोक-प्रज्ञप्ति, आवश्यक सूत्र, भगवती सूत्र, कालिकापुराण जैसे अन्य अनेक जैन ग्रन्थ हैं जिनमें भारत के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं।

जबकि बौद्ध ग्रंथों में अंगुत्तर निकाय, दीपवंस, महावंस, मंजूश्री मूलकल्प, ललित विस्तार आदि ग्रंथ हैं, जिनमें भारतीय इतिहास की संपूर्ण सामग्री उपलब्ध है।

और यदि दक्षिण भारती संगम साहित्य के ग्रंथों में भारत के पौराणिक साक्ष्यों को खोजा जाय तो उसमें तोल्काप्पियम, एत्तुतौकै, पत्तुपात्तु, शिलप्पादिकारम, मणिमेखलै और जीवक चिन्तामणि का नाम प्रमुखता से आता है जिनमें विशेषकर दक्षिण भारत के ईसा पूर्व के इतिहास को प्रमुखता से दर्ज किया गया है। इस साहित्य के रचना काल को 300 ईसा पूर्व से भी अधिक पुराना बताया जाता है।

विभिन्न धर्मों में –
भारत की सभ्यता और इसके पौराणिक इतिहास को जानने के विभिन्न साधनों में हिन्दू, जैन और बौद्ध धर्म के ग्रंथों के अलावा दक्षिण भारतीय साहित्य में संगम साहित्य का भी अधिक महत्व है। भारतीय साहित्य के अन्य प्रमुख ग्रंथों में विशाखा दत्ता का मुद्रा राक्षस, मार्गसंहिता, कादम्बरी, सन 1149-50 में कल्हण द्वारा लिखी गई

राजतरंगिणी, पतंजलि का महाभाष्य, शुक्रनीतिसार, कौटिल्य का अर्थशास्त्र, पाणिनि की अष्टाध्यायी, कालिदास का मालविकाग्निमित्रम, बाणभट्ट का हर्ष चरित, हरिषेण की प्रशस्ति जैसे और भीअनेक ग्रंथ हैं जो तात्कालिक और उससे भी सैकड़ों वर्ष पूर्व के इतिहास का विवरण देते हैं।

तमिलनाडु के शिवअंगा जिले में पल्लीसंताई थिडल में आर्किओलाॅजिकल सर्वे आफ इंडिया की ओर से कराई गई खुदाई में यहां से संगम साहित्य में भारतीय इतिहास से संबंधित आंकड़ों के कई साक्ष्य मिले हैं। खुदाई में कीलाडी गांव का सेटलमेंट हड़प्पा और मोहनजोदड़ों की तरह विशाल होने का अनुमान लगाया गया। इसमें पहले चरण की पड़ताल में ही इस बात का पता चल गया कि यह अति प्राचीन काल का शहरी आवासीय स्थल था।

ऐतिहासिक साक्ष्य –
यदि हम भारतीय इतिहास की शुरुआत को पुरा पाषाण काल से भी मानते हैं तो यह काल 35,000 ईसा पूर्व से 9,000 ईसा पूर्व तक चला। भारतीय उपमहाद्वीप के अलावा दुनिया के अन्य हिस्सों में इस काल के दौरान माानव सभ्यता के कोई खास प्रमाण नहीं मिलते।

दुनियाभर के इतिहासकारों का मानना है कि इस काल में व्यक्ति को किसी भी प्रकार की कला का कोई ज्ञान नहीं था। लेकिन, भीम बैठका की गुफाओं में की गई उस समय की चित्रकारी से इस बात के ठोस प्रमाण मिलते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप में उस समय की मानव सभ्यता को चित्रकारी जैसी कला का ज्ञान था।

न जाने वे कौन से इतिहासकार थे या आज भी हैं जिन्होंने इस बात का प्रचार किया कि भारतवर्ष में मानव सभ्यता बाहर से आई है।

जबकि, कुछ इतिहासकारों ने सिंध और बलूचिस्तान की सीमा पर स्थित ‘कच्छी मैदान‘ में बोलन नदी के किनारे मेहरगढ़ नामक स्थानों को मानव सभ्यता के लिए नव पाषाणकालीन महत्त्वपूर्ण स्थान माना है। हालांकि, इस समय की मानव सभ्यता पूरी तरह से प्रकृति पर ही निर्भर थी। लेकिन, यहां पर पाये गये मानव सभ्यता के अवशेषों के आधार पर यह अनुमान लगाया जाता है कि यहीं से कृषि करने की कला का विकास हुआ होगा। इस सभ्यता के लोगों ने अग्नि का प्रयोग करना भी प्रारम्भ कर दिया था। मिट्टी के बर्तन बनाने की कला की शुरूआत भी सर्वप्रथम इसी स्थान और इसी काल से मानी जाती है।

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विदेशी यात्रियों से –
इसके अलावा बात यदि विदेशी साहित्य की की जाये तो उसमें भारत की सभ्यता और इसके पौराणिक इतिहास से संबंधित संपूर्ण जानकारियों के लिए मेगास्थेनेस द्वारा रची गई इंडिका, हेरोडोटस की हिस्टोरिका, टाॅलमी और प्लिनी द्वारा भारत के भौगोलिक और प्राकृतिक संपदा और सभ्यता से संबंधित माहौल का विवरण चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के काल में भारत आए एक चीनी यात्री फाह्यान ने भी किया है। जबकि हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आए एक अन्य चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने भी यहां की सभ्यता, भाषा, धर्म, राजपाट, समृद्धि और इतिहास का विस्तार से वर्णन किया है।

फाह्यान और ह्वेनसांग नामक दोनों ही चीनी यात्रियों के बाद इत्सिंग नामक एक अन्य चीनी यात्री ने भी भारत की यात्रा की थी। इन तीनों सुप्रसिद्ध यात्रियों के अतिरिक्त कुछ अन्य चीनी लेखकों से भी भारतीय इतिहास की महत्वपूर्ण सामग्री प्राप्त होती है। जबकि इन तीनों ही यात्रियों से भी पहले, बहुत पहले चीन के प्रथम इतिहासकार कहे जाने वाले शुमाशीन ने लगभग प्रथम शताब्दी ई.पू. में इतिहास की जो पुस्तक लिखी थी उसमें भी उसने प्राचीन भारत की जानकारियों को विस्तार से बताया है। जिससे इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि भारत का इतिहास मात्र 10 या 15 हजार सालों का ही नहीं बल्कि मानव सभ्यता से जुड़ा हुआ है।

चीनी यात्रियों के अलावा अरब और ईरान की ओर से आने वाले यात्रियों में अल बरूनी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। अल बरूनी के इतिहास की किताब, किताब-उल-हिन्द और तहकीक-ए-हिन्द में तात्कालीन भारत की धर्म, अध्यात्म और परंपराओं और समृद्धि से संबंधित अनेकों सटीक जानकारियां मिलती हैं।

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