Sunday, May 10, 2026
Google search engine
Homeविविधषड़यंत्रधरोहरों का दुर्भाग्य - एक तरफ तो जोड़ रहे हैं दूसरी तरफ...

धरोहरों का दुर्भाग्य – एक तरफ तो जोड़ रहे हैं दूसरी तरफ तोड़ रहे हैं

मध्य प्रदेश के भिंड और मुरैना क्षेत्र के इतिहास का हमेशा से ही यह दुर्भाग्य रहा है कि पहले तो हमारे इतिहासकारों ने इसके प्राचीन इतिहास से दुनिया को दूर रखा और आजादी के बाद राजनेताओं ने यहां डर और आतंक को पनपने का अवसर दिया। इसी कारण न तो यहां का इतिहास ही बाहर आ सका और ना ही वर्तमान को इस क्षेत्र में प्रवेश करने दिया, जिसके कारण इसका खामिया भूगतना पड़ा इस क्षेत्र के निवासियों को और उस गौरवमई इतिहास और यहां की अमूल्य धरोहरों को जो आम लोगों की पहुंच से आज भी दूर है।

दरअसल, हम बात कर रहे हैं आगरा के ताजमहल से करीब 116 किमी दूर और ग्वालियर शहर से लगभग 37 किलोमीटर दूर, मुरैना जिले में मौजूद बटेश्वर, गढ़ी पड़ावली व मितावली के शिव मंदिरों की। बटेश्वर में आर्कियोलोजिकल सर्वे आॅफ इंडिया यानी भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के अफसरों ने यहां मौजूद सैकड़ों शिव मंदिरों के टूटे-फूटे अवशेषों के ढेरों को चुन-चुनकर उनमें से जिन 80-85 मंदिरों को किसी तरह खड़ा किया था, आज वे अब फिर से खतरे में हैं।

दैनिक भास्कर में 25 फरवरी, सन 2018 को प्रकाशित एक खबर के हवाले से पता चलता है कि यहां रेत और पत्थर की माइनिंग के अवैध व्यवसाय से जुड़े माफिया और राजनीतिक लोग अपने स्वार्थ के कारण यह भी नहीं देख रहे हैं कि वे जो कर रहे हैं उससे इस क्षेत्र के इतिहास और ऐतिहासिक धरोहरों के साथ वे कितना बड़ा खिलवाड़ कर रहे हैं और उन ऐतिहासिक धरोहरों को वे कितना बड़ा नुकसान पहुंचा रहे हैं।

दरअसल यहां की पहाड़ियों में बलुआ पत्थरों की भरमार है जिसके कारण खनन माफिया द्वारा यहां अवैध तरीके से इन पहाड़ियों में विस्फोट करके यहां की रेत और पत्थरों को ट्राॅलियों और ट्रकों में भरकर ले जाते हैं। रेत माफिया का दबदबा यहां इतना है कि वन विभाग का कोई भी अधिकारी या कर्मचारी यहां आने की हिम्मत नहीं करता, यहां तक कि पुलिस का गस्ती दल भी यहां आने से डरता है।

दैनिक भास्कर की यह खबर साफ-साफ बता रही है कि पहाड़ी के एक किनारे पर पुरातात्विक विभाग के द्वारा इतिहास को फिर से खड़ा करने की कोशिश की जा रही है और दूसरी तरफ अवैध खनन से इसे फिर मिट्टी में मिलाने जैसे हालात खड़े हो गए हैं।

खबर बताती है कि अगर भूले से कोई भी पर्यटक इन मंदिरों तक जाना चाहता है तो वह अपनी जान हथेली पर लेकर ही चलता है। क्योंकि मंदिरों तक पहुंचने वाले रास्ते में ऐसी कई खदानें देखने को मिलती हैं जहां खुलेआम ट्राॅलियों और ट्रकों में रेत भरते हुए देखा जा सकता है। या फिर उन खदानों में होने वाले विस्फोटों की आवाजें सुनी जा सकती हैं।

बटेश्वरनाथ के इन मंदिरों में डाकू और बागी भी मत्था टेकने आया करते थे

दूसरी बड़ी समस्या यह है कि यहां पहुंचने के बाद न पीने के लिए पानी मिलता है और न ही टाॅयलेट जैसी कोई सुविधा। हालांकि पर्यटन विभाग यहां आने वाले पर्यटकों के लिए सुविधाएं जुटाने की कोशिश कर रहा है लेकिन फिर भी यहां तक आने के लिए कोई ट्रांसपोर्ट सिस्टम उपलब्ध नहीं है इसलिए बाहर से आने वाले पर्यटकों को निजी तौर पर टैक्सी लेनी पड़ती है।

भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के अधीक्षक श्री अशोक कुमार पांडे ने वर्ष 2005 से 2008 के बीच यहां अपने कार्यकाल के दौरान बटेश्वर के इन मंदिरों को खड़ा करने में भरपूर योगदान दिया था। वर्तमान में तो वे रिटायर्ड हो चुके हैं लेकिन बताया जाता है कि आज भी वे यहां आते-जाते रहते हैं और इन मंदिरों का डाॅक्यूमेंटेशन तैयार कर इनको संवारने का प्रयास कर रहे हैं।

बटेश्वर के इन मंदिरों की अदभुत कृतियों का अध्ययन करने के लिए कुछ साल पहले ही ग्रीस से स्टेला नामक एक महिला पर्यटक भी विशेष तौर पर यहां आईं थीं। स्टेला ने भारतीय पर्यटन और यात्रा प्रबंधन संस्थान, ग्वालियर के प्रोफेसरों के साथ मिलकर यहां के मंदिरों का अध्ययन किया था।

स्टेला का कहना है कि ग्वालियर के नजदीक स्थित यह पुरातात्विक विश्व धरोहर आगरा और जयपुर की अनेकों धरोहरों से भी बेहतर कलात्मक और प्राचीन हैं। लेकिन, इन धरोहरों का दूर्भाग्य यह है कि पर्यटकों के यहां तक आने में उनकी सबसे बड़ी बाधा सुरक्षा और जरूरी सुविधाओं की कमी है। क्योंकि यहां तक आने के लिए न तो ट्रांसपोर्ट है और ना ही जन सुविधाएं।

धरोहरों का दुर्भाग्य
आश्चर्य और दूर्भाग्य की बात तो यह है कि जिस पहाड़ी पर बटेश्वर के ये ऐतिहासिक मंदिर चुन-चुनकर दौबारा खड़े किए गए हैं अब उसी पहाड़ी के चारों तरफ खनन के लिए विस्फोट हो रहे हैं।

वीरान और सुनसान पहाड़ियों में चल रही अवैध खदानों से आने वाली धमाकों की आवाजें पर्यटककों में डर पैदा करती हैं। श्री अशोक कुमार पांडे का भी मानना है कि खनन क्षेत्र होने के बावजूद यहां पुलिस की मौजुदगी का न होना भी पर्यटकों में भय पैदा करता है।

7वीं से 10वीं शताब्दी के बीच गुर्जर-प्रतिहार वंश के राजाओं द्वारा निर्मित इन शिव मंदिरों के समूह को पहले तो प्रकृति का प्रकोप झेलना पड़ा, फिर बाहरी आक्रांताओं यानी मुगल आक्रमणकारियों ने भारी नुकसान पहुंचाया और इनको खंडित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, और अब वर्तमान में यहां का खनन माफिया इन पहाड़ियों में बलुआ पत्थरों के लिए डेटोनेटर से विस्फोट करके इन मंदिरों को थर्रा रहे हैं।

सबसे बड़े आश्चर्य और दूर्भाग्य की बात तो यह है कि जिस पहाड़ी पर बटेश्वर के ये ऐतिहासिक मंदिर चुन-चुनकर दौबारा खड़े किए गए हैं अब उसी पहाड़ी के चारों तरफ खनन के लिए विस्फोट हो रहे हैं।

हालात यह है कि अवैध खनन रुकवाने के लिए यहां अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती के बावजुद भी यहां खनन रुक नहीं पा रहा है। अखबार लिखता है कि क्षेत्रीय नेताओं के बेटे व परिजन महंगी गाड़ियों में हथियारों से लैस होकर अपने गुर्गों के साथ अवैध खनन कर रहे डंपरों व ट्रैक्टर-ट्राॅलियों को कवरिंग देकर बड़ी आसानी से पुलिस की जद से बाहर ले जाते हैं। ऐसे में यह तो तय है कि किसी भी क्षेत्र में इतना बड़ा माफिया अगर सक्रिय हो तो स्थानीय स्तर पर इनको राजनीतिक और आधिकारी संरक्षण तो अवश्य ही मिलता होगा।

– dharmwani.com

About The Author

admin
adminhttp://dharmwani.com
देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
RELATED ARTICLES
- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments