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अमेरिकी राष्ट्रवादी विचारधारा के पेंच में फंसा पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का फेसबुक अकाउंट

admin 6 May 2021
Donald Trump
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अजय चौहान  || अंतराष्ट्रीय मीडिया में जिस प्रकार से अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके प्रतिबंधित फेसबुक अकाउंट को लेकर खबरें आ रही हैं उसे देखते हुए लगता है कि जल्द ही उनके यानी डोनाल्ड ट्रंप के फेसबुक अकाउंट से प्रतिबंध हट सकता है। जो लोग नहीं जानते हों उनके लिए यहां बता देना भी जरूरी है कि इसी वर्ष जनवरी की शुरुआत में अमेरिकी संसद यानी कि यूएस कैपिटल हिल पर डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों द्वारा हमले के बाद फेसबुक ने उनके अकाउंट को सस्पेंड कर दिया था।

वैसे अगर हम एक आम राष्ट्रवादी भारतीय विचारधारा की बात करें तो हमारे देश के लिए ये एक आम बात है। क्योंकि यहां तो न जाने कितने हजार या कितने लाखा फेसबुक अकाउंट रोज ही प्रतिबंधित होते रहते हैं। कुछ अकाउंट तो हमेशा के लिए हटा भी दिये जाते हैं। लेकिन, फिलहाल यहां हमारे लिए ये महत्वपूर्ण नहीं है कि भारतीय राष्ट्रवादी विचारधारा के कितने फेसबुक अकाउंट रोज प्रतिबंधित होते हैं या हटा दिये जाते हैं। बल्कि महत्वपूर्ण तो ये है कि ऐसा होता क्यों है? क्योंकि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप न तो भारतीय हैं और ना ही उन्होंने भारत को कोई फायदा पहुंचाया है।

सबसे बड़ी बात तो ये है कि डोनाल्ड ट्रंप तो खुद उसी देश के राष्ट्रपति रह चुके हैं और उससे भी बड़ी बात तो ये है कि न सिर्फ उनका फेसबुक अकाउंट प्रतिबंधित हुआ था बल्कि ट्विटर और यूट्यूब पर भी उन्हें प्रतिबंधित कर दिया गया था। और जिस वक्त उनके तमाम सोशल मीडिया अकाउंट प्रतिबंधित हुये थे उस वक्त भी वे अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर आसीन थे। यानी उस वक्त भी वे दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के सबसे शक्तिशाली शासक थे। वे चाहते तो कुछ भी कर सकते थे। लेकिन अपने ही घर में वे बेबस और बेआबरू हो कर चुप बैठ गये थे।

अगर हम डोनाल्ड ट्रंप को भारतीय नजरिये से देखें तो ट्रंप एक प्रकार से अमेरिका के लिए वो राष्ट्रवादी हैं जो अपने पद पर रहते हुए अमेरिका के अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे थे। लेकिन, उनकी गलती ये थी कि वे इस लड़ाई को ऐसे मैदान में लड़ रहे थे जो खुद दुश्मन का ही था।

ऐसे में अगर हम फेसबुक कंपनी के मालिक मार्क जुकरबर्ग की विचारधारा के बारे में सीधे-सीधे कहें तो यहां आप समझ लीजिए कि जुकरबर्ग ने खुद भी ट्रंप के फेसबुक अकाउंट पर लगाए गए प्रतिबंध को सही ठहराते हुए कहा था कि ट्रंप को पोस्ट करने की अनुमति देना एक बहुत बड़ा जोखिमभरा और खतरनाक हो सकता है।

यानी जिस फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया के प्लेटफार्म का वे इस्तमाल कर रहे थे वे उसी वामपंथी विचारधारा के हैं जो खुद अपने ही देश अमेरिका को बर्बाद करने के लिए तैयार बैठे हैं। ऐसे में यहां हमारे मन में ये सवाल भी उठना ही चाहिए कि खुद अमेरिका का राष्ट्रपति भी वामपंथ के आगे बेबस हो सकता है तो फिर उसी फेसबुक, उसी ट्विटर और उसी यूट्यूब के आगे भारत जैसे देशों के राष्ट्रवादियों की औकात क्या है।

हम भारतीयों को और खास तौर पर उन राष्ट्रवादियों को ये बात बहुत अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए कि डोनाल्ड ट्रंप तो उसी अमेरिका के मूल निवासी हैं जिस देश के वे राष्ट्रपति रह चुके हैं, जिस देश की फेसबुक, ट्वीटर और यू-ट्यूब जैसी दिग्गज कंपनिया हैं। तो ऐसा क्या हुआ और क्यों हुआ कि उनके अकाउंट्स को प्रतिबंधित कर दिया था।

तो ऐसे में अगर हमें अपने नजरिये से यानी भारतीय नजरिये से इस विवाद और रहस्य को समझना हो तो यहां ये बात जान लेनी चाहिए कि डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के मूल निवासी जरूर हैं, लेकिन, वे वामपंथी नहीं बल्कि एक राष्ट्रवादी हैं। सीधे-सीधे कहें तो फेसबुक एक ऐसी कंपनी है जो सिर्फ व्यावसाय ही नहीं करती बल्कि भारतीय सैक्युलरवादियों की तरह ही अमेरीकीयों का भी भाग्य तय करती हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो फेसबुक के ओवरसाइट बोर्ड में ‘वामपंथी’ विचारधारा के लोगों की संख्या इतनी ज्यादा है कि ये भी एक खबर बन कर ही रह सकती है कि डोनाल्ड ट्रंप के फेसबुक अकाउंट से प्रतिबंध हटने वाला था, लेकिन उनकी राष्ट्रवादी या राष्ट्र-प्रेम वाली विचारधारा के डर के कारण नहीं हटाया जा सका।


अगर हम सीधे-सीधे देशी भाषा में बात करें तो ये कि फेसबुक के ओवरसाइट बोर्ड में कुल 20 सदस्य शामिल हैं, जो ये फैसला करते हैं कि फेसबुक के लिए यानी वामपंथ के लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा है, और उन 20 सदस्यों में से सिर्फ पांच ही अमेरिकी सदस्य हैं और उन पांच में से कितने अमेरिकी हैं और कितने वामपंथी ये भी आम लोगों को नहीं पता।

सवाल तो ये भी उठ रहे हैं कि इस 20 सदस्यीय बोर्ड में वामपंथी विचारधारा वाले सदस्यों की संख्या ज्यादा है। इसलिए ये भी हो सकता है कि ट्रंप के फेसबुक अकाउंट को हमेशा के लिए खत्म ही कर दिया जाये। ताकि ना राष्ट्रवादी हो और ना उठे राष्ट्रवाद की, यानी देश-प्रेम की आवाज।

यहां ये भी ध्यान रखना चाहिए कि अगर फेसबुक के इस ओवरसाइट बोर्ड के सदस्यों के वेतन का भुगतान फेसबुक कंपनी, यानी मार्क जुकरबर्ग ही करता है, और मार्क जुकरबर्ग की विचारधारा ट्रंप की विचारधारा और रास्ते दोनों ही अलग-अलग हैं तो फिर उन 20 सदस्यों में से भला किसकी हिम्मत होगी कि उनके साथ कोई नमक हरामी कर सके।

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