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युगों-युगों के रहस्य और आधुनिक इतिहास का साक्षी है महेश्वर

admin 19 December 2021
History of Maheshwar & Ahilyabai in Madhya Pradesh
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अजय सिंह चौहान | महेश्वर यानी भगवान महादेव का अति प्रिय नगर, मंदिरों और देवालयों का नगर और ऐसा नगर जिसमें शिवालयों की संख्या सबसे अधिक हो, तो भला ऐसे स्थान से संत और तपस्वी लोग दूर कैसे रह सकते हैं। अपने पौराणिक, धार्मिक महत्व और रामायण व महाभारत जैसे ग्रंथों में जिस नगर का गुणगान लिखा हो और जिसे पुण्य सलिला नर्मदा नदी अपने जल से हजारों-लाखों वर्षों से सींचती आ रही हो, भला ऐसे पवित्र धाम महिष्मती या महेश्वर में कौन-सा तपस्वी होगा जो अपने जीवन में कम से कम एक बार तप-साधना या देव दर्शन करना नहीं चाहता होगा। और इसी कारण इस महेश्वर या महिष्मती को गुप्त काशी भी कहा जाता है।

महेश्वर के नाम से प्रसिद्ध इस शहर का उल्लेख रामायण और महाभारत जैसे गं्रथों में महिष्मती के नाम से मिलता है। अपने धार्मिक महत्त्वों और अध्यात्म की नगरी होने के कारण यह शहर भगवान शिव की नगरी काशी जितना ही महत्व रखती है। इसके अलावा, अपने पौराणिक महत्व में स्कंध पुराण, रेवा खंड, तथा वायु पुराण आदि के नर्मदा रहस्य में भी इसका महिष्मति नाम से विशेष उल्लेख मिलता है। ऐतिहासिक महत्त्व में यह शहर भारतीय संस्कृति में स्थान रखने वाले राजा महिष्मान, राजा सहस्त्रबाहू जैसे राजाओं और वीर पुरुषों की राजधानी रहा है।

हालांकि, समय के साथ-साथ यह नगरी पौराणिक और ऐतिहास महत्व खोती जा रही थी। लेकिन बाद में, होलकर वंश के कार्यकाल में इसे एक बार फिर प्रमुखता प्राप्त हुई। महेश्वर के अत्यंत गौरवशाली और पौराणिक महत्व और इतिहास को ध्यान में रखते हुए देवी अहिल्या बाई ने इसे अपनी राजधानी बनाया। देवी अहिल्याबाई होलकर के समय में यहाँ के धार्मिक तथा पौराणिक महत्व के कई मंदिरों को एक बार फिर से संवारा गया।

यहां के मुख्य मंदिरों में श्री राजराजेश्वर मंदिर, काशी-विश्वनाथ मंदिर, अहिल्येश्वर महादेव, ज्वालेश्वर महादेव, बाणेश्वर, कालेश्वर शिव मंदिर, सप्तमातृका, कदम्बेश्वर मंदिर आदि हैं। कुछ मंदिर नव निर्मित हैं जो भव्य और आकर्षक भी हैं जिनमें सहस्त्रधारा क्षेत्र में बना दत्तधाम है। लम्बा-चैड़ा नर्मदा तट एवं उस पर बने अनेकों सुन्दर घाटों को तरीके से संवारा गया, जिसके कारण आज भी घाटों के किनारे बने मंदिरों और इमारतों के प्रतिबिंब नदी में खूबसूरत दिखाई देते हैं।

महेश्वर के राजा सहस्त्रार्जुन ने रावण को भी बना लिया था बंदी

Maheshwar__Ghats_of_Maheshwar
देवी अहिल्या के शासनकाल में महेश्वर में स्थित नर्मदा तट एवं उस पर बने अनेकों सुन्दर घाटों को तरीके से संवारा गया।

नदी के किनारे बना महेश्वर का किला पाषाण कला, यानी विशाल पत्थरों पर की गई नक्काशी और कारीगरी का एक सुन्दर, आकर्षक और आश्चर्यचकित कर देने वाली संरचनाओं में से एक माना जाता है। यह किला इस शहर और प्रदेश के लिए ही नहीं बल्कि देश और दुनियाभर के पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का प्रमुख केन्द्र है। महेश्वर के इन घाटों, मंदिरों और यहां के किले को कई फिल्मों और ऐतिहासिक टीवी धारावाहिकों में प्रमुखता से दर्शाया गया है।

समय-समय पर इस शहर की गोद में मनाये जाने वाले तीज-त्यौहार, उत्सव-पर्व इस शहर की रंगत में चार चाँद लगाते हैं, जिनमें शिवरात्रि स्नान, निमाड़ उत्सव, गणगौर पूजा, नवरात्री, गंगादशमी, नर्मदा जयंती, अहिल्या जयंती एवं श्रावण माह के अंतिम सोमवार को भगवान काशी विश्वनाथ के नगर भ्रमण की ‘‘शाही सवारी‘‘ प्रमुख है।

सागर जिला (MP) का पोराणिक इतिहास | History of District Sagar MP

नर्मदा नदी के किनारे बसा यह खुबशुरत पर्यटन स्थल म.प्र. शासन द्वारा पवित्र नगरी का दर्जा प्राप्त है। कला, धर्म, अध्यात्मक, संस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व को समेटे यह वर्तमान शहर हजारों वर्ष पुराना है।

खरगौन जिला मुख्यालय से महेश्वर की दूरी लगभग 35 किलोमीटर और ओमकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर से इसकी दूरी लगभग 60 किलोमीटर है। यहां का सबसे नजदीकी रैलवे स्टेशन खण्डवा है जो यहां से लगभग 120 किलोमीटर दूर है। इसके अलावा यह शहर इंदौर-खण्डवा-खरगौन सड़क मार्ग से लगा हुआ है। इंदौर खण्डवा राज मार्ग पर माहेश्वर शहर की दूरी इंदौर के हवाई अड्डे से लगभग 100 किमी है।

महेश्वर में ठहरने के लिए बजट के अनुसार अनेकों प्रकार के होटल और धर्मशालाएं है, और अगर आप यहां परिवार के साथ जाना चाहते हैं तो उसके लिए सबसे अच्छा समय सितंबर से मार्च के बीच का है।

अगर आप लोग भी पौराणिक, धार्मिक और एतिहासिक स्थानों में दिलचस्पी रखते हैं तो कम से कम एक बार तो महिष्मती या महेश्वर नामक इस नगर या शहर में जरूर जाना चाहिए, और जानना चाहिए कि आखिर ऐसे क्या कारण हैं कि हमारी जिन ऐतिहासिक संरचनाओं को देखकर दुनिया के लोगों की आँखों में आश्चर्य आता है, उन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं?

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