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खो-खो माता: भक्तों की पुरानी से पुरानी खांसी भी ठीक कर देती है

admin 13 December 2021
KHO-KHO MATA DEWAS MP
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अजय सिंह चौहान || मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में बसा पौराणिक नगर देवास आज प्रदेश का बहुत ही विशेष शहर माना जाता है। देवास शहर आज से नहीं बल्कि हजारों लाखों वर्षों से धर्म, अध्यात्म और संस्कृतिक के लिए महत्वपूर्ण रहा है और देवी सती के 52 शक्तिपीठों में से एक माना जाने वाला मां तुलजा भवानी तथा मां चामुंडा माता के शक्तिपीठ मंदिर के लिए भारत भर में प्रसिद्ध है। ऊंचे भवन पर विराजित करोड़ों लोगों की आस्था के प्रतिक ये दोनों ही सदन हजारों सालों से कई प्रसिद्ध ऋषि-मुनियों की तपोस्थली भी रहा है।

माता के मंदिर तक पहुँचने के लिए पहाड़ी की चढ़ाई शुरू करने से पहले एक भव्य और आकर्षक प्रवेश द्वार बना हुआ है जो आगरा-बोम्बे राजमार्ग के ठीक किनारे पर बना हुआ है। प्रवेश द्वार से लेकर मुख्य मंदिर तक पत्थरों की लगभग एक हजार आकर्षक सीढियाँ हैं। तथा बीच बीच में विश्राम के लिए कई स्थानक बनाये गए हैं।

श्रद्धालुजन जैसे-जैसे मंदिर की सीढ़ियां चढते जाते हैं वैसे-वैसे तन और मन में आस्था और श्रद्धा भाव बढ़ता जाता है और थकान का पता ही नहीं चलता। इसके अलावा यदि कोई सीढ़ियों के बजाय झूले से या रोप-वे के सहारे भी यदि मंदिर तक जाना चाहे तो यहां उसकी भी सुविधा उपलब्ध है। और यदि आप रोप-वे में बैठते हैं तो इससे श्रद्धालुओं को देवास शहर का भव्य नजारा देखने को मिल जाता है।

देवास की एक ऊंची पहाड़ी की दक्षिण दिशा में बने मंदिर में विराजित माता को बड़ी माता यानी तुलजा भवानी कहा जाता है। जबकि चामुंडा माता के मंदिर में विराजित माता यानी चामुंडा माता को छोटी माता कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि, माताओं की दोनों मूर्तियां स्वयंभू हैं और जागृत स्वरूप में हैं। माँ तुलजा भवानी और माँ चामुंड, दोनों बहनें हैं और दोनों ही माताओं के मंदिर विपरीत दिशाओं में स्थित हैं। इसमें छोटी माता यानी मां चामुंडा की एक खास विशेषता यह है कि यह मूर्ति दिन में तीन बार रूप बदलती है, जिसमें सुबह बचपन का रूप दोपहर को युवावस्था और शाम को वृद्धावस्थ का रूप देखने को मिलता है।

जितनी अलग-अलग मान्यताएं ऊंची पहाड़ी पर बने इस शक्तिपीठ को लेकर हैं उतने ही महत्वपूर्ण और अन्य विशेषताओं से भरपूर है इस शक्तिपीठ के परिक्रमा मार्ग में आने वाले अन्य मंदिर भी।

सीढ़ियां चढ़ने के बाद सबसे पहले ठीक सामने ही छोटी माता मां चामुंडा का मंदिर नजर आता है। लेकिन, मान्यता के अनुसार, सबसे पहले बड़ी माता यानी तुलजा माता के दर्शनों की परंपरा है। और उसके लिए यहां से बाएं तरफ की ओर जाना होता है। इस रास्ते में थोड़ा आगे चलने पर ही बड़ी माता तुलजा भवानी का मंदिर नजर आ जाता है।

और जब आप बड़ी माता तुलजा भवानी के दर्शन करने के बाद जैसे ही छोटी माता के दर्शनों के लिए आगे बढ़ते हैं तो पहाड़ी के परिक्रमा पथ पर चलते हुए रास्ते में कई अन्य मंदिर भी मिलते हैं जिनकी मान्यता भी कुछ कम नहीं है। इस रास्ते में सबसे पहले रामभक्त हनुमान जी का मंदिर आता है।

माना जाता है कि हनुमान जी की यह मूर्ति भी स्वयंभू है। और हनुमान जी के इस मंदिर को लेकर भी एक अलग मान्यता है। यहां आने वाले भक्त हनुमान जी का आशिर्वाद लेना नहीं भूलते। यहां से थोड़ा आगे बढ़ने पर मां कालिका का मंदिर आता है।

इस मंदिर के ठीक पास ही में बना हुआ है एक ऐसा कुंड जो काफी पुराना है। माना जाता है कि मालवा क्षेत्र में पड़ने वाली भीषण गर्मी के बावजूद पहाड़ी की उंचाई पर बने इस कुंड का पानी कभी नहीं सुखता। हालांकि, यह कुंड कितना पुराना है और किसने बनवाया इसके कोई प्रमाण मौजूद नहीं है।

भक्त और श्रद्धालुजन जैसे-जैसे इस परिक्रमा पथ पर आगे बढ़ते जाते हैं वैसे-वैसे श्रद्धा और भक्ति का भाव मन में बढ़ता जाता है। देवास जिला प्रशासन की ओर से इस परिक्रमा मार्ग के कई स्थानों पर भक्तों के लिए धूप से बचने के लिए, आराम करने के लिए और पीने के पानी की विशेष इंतजाम किए हुए हैं।

परिकक्रमा पथ पर कालिका माता के दर्शनों के बाद थोड़ा आगे चलने पर जो मंदिर आता है वह आपने आप में एक अनोखा और चर्चित मंदिर कहा जा सकता है। यह मंदिर है खो-खो माता का मंदिर। धर्म और विज्ञान के बीच आस्था का भाव रखने वाले भक्तों और श्रद्धालुओं के लिए यह मंदिर एक विशेष महत्व रखता है।

खो-खो माता के इस मंदिर को लेकर जो मान्यता है उसके अनुसार माता की शरण में आने वाले को यदि कितनी भी पुरानी खांसी हो यहां आकर वह ठीक हो जाती है। यहां आकर यदि कोई भक्त सच्चे मन से और पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ माता को चढ़ाया हुए जल को पी लेता है तो उसकी खांसी तीन से चार दिनों बिल्कुल ठीक हो जाती है।

यहां आने वाले भक्तों में से अधिकतर का भी यही मानना है कि हमने कई भक्तों को यहां पुरानी से पुरानी खांसी का इलाज करवा कर देख लिया लेकिन कोई फायदा नहीं हो रहा था लेकिन यहां आकर माता पर चढ़ाया हुआ जल पीने से उनकी खांसी ठीक होते हुए देखा है और वो भी मुफ्त में। और जिन लोगों की खांसी ठीक हो जाती है वे बाद में यहां आकर प्रसाद जरूर चढ़ाते हैं और अपनी श्रद्धा और भक्ति के साथ कुछ ना कुछ भेंट या दान भी करते हैं। कई भक्तों को यहां माता के सामने विशेष प्रार्थनाएं करते हुए भी देखा जा सकता है।

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परिक्रमा मार्ग में आने वाले इन मंदिरों में सबसे अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण मंदिर है छोटी माता यानी मां चामुंडा का। मंदिर के गर्भगृह में मां चामुंडा का भव्य और दिव्य रूप देखने को मिलता है। अभी तक मिले प्रमाणों के अनुसार मां चामुंडा की यह मूर्ति लगभग दसवीं शताब्दी की बताई जाती है। पुराविदों ने इस प्रतिमा को परमारकालीन बताया है। इतिहास में उल्लेखित जानकारी के अनुसार मां चामुंडा की प्रतिमा को चट्टान में उकेरकर आकार दिया गया है।

इसके अलावा यहां एक महत्वपूर्ण बात यह भी देखी जाती है कि यहां आने वाले कई श्रद्धालुजन मंदिर की दीवार पर स्वास्तिक उल्टी आकृति बना कर जाते हैं और मन्नत मांगते हैं कि यदि हमारी मनोकामना पूरी हो जाएगी तो हम एक बार फिर से दर्शनों के लिए आयेंगे और चांदी का स्वास्तिक चढ़ायेंगे।

मां चामुंडा के इसी मंदिर के ठीक बगल में स्थित है नौ देवियों के नौ रूपों के मंदिर। ये मंदिर आकार में छोटे जरूर हैं लेकिन बहुत ही आकर्षक लगते हैं और यहां आने वाले सभी भक्तों का ध्यान आकर्षित करते हैं। केसरिया रंग में रंगे ये सभी मंदिर मां चामुंडा के मंदिर के पास ही में स्थित हैं। यहां छोटे-छोटे नौ मंदिरों के माध्यम से माता के नौ रूपों को दर्शाया गया है।

हर साल चैत्र और शारदीय नवरात्रि के विशेष अवसरों पर यहां भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। माता के भक्त यहां देशभर से ही नहीं बल्कि विदेशों से भी आते हैं। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मुरादें मां के दरबार में प्राचीन समय से पूरी होती आ रहीं हैं।

इन सबके अलावा यहां शीलनाथजी की गुफा भी है जो मां चामुंडा माता मंदिर से कुछ नीचे की ओर योगीराज शीलनाथजी महाराज की तपोभूमि के नाम से जानी जाती है। बताया जाता है कि गुफा में एक सुरंग भी है जिससे होकर एक गुप्त रास्ता है जो लगभग 45 किमी लंबा है और यह रास्ता उज्जैन की भर्तहरि गुफा के पास निकलता है। इस इस सुरंग और गुफा से जुड़ा इतिहास बताता है कि उज्जैन के राजा भर्तहरि मां चामुंडा की आराधना के लिए इसी गुफा के रास्ते यहां आते थे। इसी गुफा में शंकर जी की पिंडी और पंचमुखी हनुमान जी का मंदिर भी है।

देवास शहर राष्ट्रीय राजमार्ग नम्बर 3 पर स्थित है जो आगरा बाॅम्बे रोड के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा यह मध्य प्रदेश के सभी प्रमुख शहरों से सड़क द्वारा जुड़ा हुआ है। इंदौर से इसकी दूरी मात्र 34 किलोमीटर और उज्जैन से भी इसकी दूरी 34 किलोमीटर है। जबकि भोपाल से 153 किलोमीटर है।

देवास का रेलवे स्टेशन यहां का एक महत्वपूर्ण जंक्शन है जो भारत के कई बड़े शहरों जैसे दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई तथा जयपुर आदि से जुड़ा हुआ है। यहां का सबसे नजदीकी हवाई अड्डा देवी अहिल्या बाई होलकर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है जो यहां से मात्र 45 किलोमीटर की दुरी पर इंदौर में स्थित है।

यदि आप लोग भी परिवार के साथ यहां आने का कार्यक्रम बना रहे हैं तो उसके लिए अगस्त से अप्रैल के बीच का मौसम देवास सहित संपूर्ण मालवा क्षेत्र का सबसे अच्छा मौसम कहा जा सकता है।

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