हिमालय की बर्फ में दबा वह रास्ता किसी नक्शे पर नहीं था, वह केवल उन लोगों को मिलता था जिन्हें पहाड़ खुद बुलाते थे।
यह कहानी लखनऊ के एक पहाड़ी शोधकर्ता देवांश की है, जो संस्कृत पांडुलिपियों में छिपे भूगोल को ढूँढता था और एक दिन उसे माना गाँव में वह द्वार मिल गया जो हमारे लोक से दूसरे लोकों तक जाता था।
अध्याय 1 — माना की पांडुलिपि –
दिसंबर की आखिरी रात थी। बद्रीनाथ मंदिर के कपाट बंद हो चुके थे। माना, जिसे भारत का अंतिम गाँव कहते हैं, बर्फ से ढका था।
देवांश वहाँ एक बूढ़े पुजारी बद्रीदत्त जी के पास रुका था। उनके पास भोजपत्र पर लिखी एक जीर्ण प्रति थी — हिमवत्-परिक्रमा।
उसमें लिखा था:
उत्तरायण से तीन रात पहले, जब सप्तर्षि सीधे अलकनंदा पर झुकें, तब व्यास गुफा के पीछे की शिला हटती है। उसके नीचे वह मार्ग है जो भूमि को स्वर्ग से जोड़ता है। उसे देवयान नहीं, लोकयान कहते हैं।
पुजारी ने फुसफुसाकर कहा, “हर बारहवें वर्ष, पौष अमावस्या को, यह द्वार एक पहर के लिए खुलता है। मेरे दादा ने 1962 में देखा था। वे गए, पर लौटे नहीं। केवल उनकी खड़ाऊँ मिली थी, बर्फ में जमी हुई।”
देवांश ने तिथि गिनी। उस साल पौष अमावस्या तीन दिन बाद थी। बारहवाँ वर्ष पूरा हो रहा था।
अध्याय 2 — व्यास गुफा के नीचे –
तीन दिन तक बर्फीला तूफान चला। चौथी रात आकाश निर्मल हो गया। सप्तर्षि तारामंडल ठीक अलकनंदा घाटी के ऊपर था।
रात दो बजे देवांश, पुजारी और एक स्थानीय भोटिया गाइड ताशी, व्यास गुफा पहुँचे। गुफा के पीछे एक विशाल शिला थी जिस पर त्रिशूल और कमल खुदा था।
ताशी ने शिला पर गरम पानी डाला, जैसा पांडुलिपि में लिखा था। बर्फ पिघली। पत्थर के नीचे से हल्की नीली आभा फूटी।
अचानक जमीन काँपी नहीं, बल्कि ध्वनि हुई — जैसे शंख की गूँज भीतर से आ रही हो। शिला धीरे-धीरे बाईं ओर सरक गई। उसके पीछे एक संकरी सुरंग थी, इतनी संकरी कि एक आदमी ही झुककर जा सके। दीवारों पर अभ्रक चमक रहा था, जैसे हजारों जुगनू पत्थर में जड़े हों।
हवा गर्म थी, जबकि बाहर माइनस पंद्रह डिग्री था। भीतर से चंदन और पुरानी धूप की गंध आ रही थी।
पुजारी ने कहा, “आगे मत जाना। यह मार्ग लेने से ज्यादा माँगता है।”
देवांश ने अपनी डायरी, एक तांबे का लोटा, और दादा की दी हुई रुद्राक्ष माला ली और भीतर कदम रखा। शिला उसके पीछे फिर से बंद हो गई।
अध्याय 3 — गुप्त मार्ग –
सुरंग नीचे नहीं, सीधे भीतर जाती थी। लगभग दो सौ कदम बाद वह एक विशाल गुफा हॉल में खुली। छत इतनी ऊँची थी कि दिखती नहीं थी।
बीच में एक कुंड था, जिसका पानी काला नहीं, पारदर्शी नीला था, और उसमें तारे तैरते लगते थे। कुंड के चारों ओर सात द्वार थे, हर द्वार पर अलग-अलग लिपि।
देवांश ने पांडुलिपि याद की। पहला द्वार — सिद्धलोक, जहाँ तपस्वी शरीर छोड़कर भी साधना करते हैं। दूसरा — गंधर्वलोक, जहाँ ध्वनि ही रूप है। तीसरा — यक्षलोक, धन और स्मृति के रक्षक। चौथा — पितृलोक, जहाँ पूर्वज प्रतीक्षा करते हैं। पाँचवाँ — नागलोक, छठा — देवलोक, सातवाँ — शून्यलोक, जहाँ से कोई लौटता नहीं।
कुंड के पास एक शिला पर लिखा था: जिस लोक में प्रवेश चाहो, उसका सत्य अपने भीतर धारण करो।
देवांश ने आँखें बंद कीं। उसे सिद्धों की कहानियाँ याद आईं। वह ज्ञान के लिए आया था, अहंकार के लिए नहीं। उसने सिद्धलोक वाले द्वार को छुआ।
पत्थर पिघल गया।
अध्याय 4 — सिद्धलोक –
आँख खुली तो बर्फ नहीं थी। हल्की सुनहरी धूप थी, पर सूरज नहीं दिखता था। हवा में सब कुछ तैर रहा था — पत्थर, जल की बूँदें, मंत्र।
वहाँ शरीर वाले लोग नहीं थे। केवल प्रकाश के आकार थे, जो कभी-कभी मानव रूप लेते। एक आकार देवांश के पास आया।
“तू द्वार से आया है। क्यों?”
देवांश ने कहा, “मैं जानना चाहता हूँ कि क्या लोक वास्तव में अलग हैं, या एक ही चेतना के तल?”
प्रकाश हँसा, बिना ध्वनि के। “प्रश्न सही है। देख।”
अचानक देवांश को अपना बचपन दिखा, फिर माँ की मृत्यु, फिर लखनऊ की लाइब्रेरी में रातें। फिर वही दृश्य सिद्धलोक के किसी साधक की आँखों से दिखा। भावनाएँ वही थीं, केवल भाषा अलग।
साधक ने कहा, “लोक स्थान नहीं, दृष्टि हैं। हिमालय का यह मार्ग पृथ्वी की चुंबकीय नाड़ी पर बना है। जब ग्रह एक सीध में आते हैं, यहाँ का पर्दा पतला हो जाता है। तुम जिसे दूसरा लोक कहते हो, वह तुम्हारे मन की आवृत्ति बदलने पर दिखता है।”
देवांश को वहाँ समय का बोध नहीं रहा। उसने वहाँ कई दिन, या कई पल बिताए। उसे एक मंत्र दिया गया — ॐ ह्रीं लोकान्तराय नमः — जिसे जपने से द्वार स्थिर रहता है।
जब उसने वापस जाने की इच्छा की, कुंड फिर प्रकट हुआ।
अध्याय 5 — यक्षलोक की परीक्षा –
कुंड ने उसे सीधे वापस नहीं भेजा। दूसरी आवृत्ति खिंच गई। वह यक्षलोक में पहुँचा।
यहाँ सब कुछ ठोस था — सोने जैसे वृक्ष, नदियों में पिघला चाँदी जैसा जल। पर हर वस्तु पर पहरा था।
एक यक्ष, जिसका चेहरा बाघ जैसा और आँखें मनुष्य जैसी थीं, सामने आया।
“तू सिद्धलोक से आया है। पर क्या तू ले जाने योग्य है?”
उसने देवांश के सामने तीन वस्तुएँ रखीं — एक मणि जो भविष्य दिखाती थी, एक पात्र जो कभी खाली न होता, और एक पंख जो किसी भी लोक में ले जा सकता था।
“एक चुन।”
देवांश ने क्षण भर सोचा। भविष्य जानने की लालसा थी, भूख मिटाने की इच्छा भी। पर उसने पंख उठाया।
यक्ष मुस्कुराया। “तूने साधन चुना, साध्य नहीं। यही परीक्षा थी। जो भविष्य माँगता है, वह यहीं रुक जाता है। जो पेट माँगता है, वह यहीं बिक जाता है।”
उसने पंख देवांश की रुद्राक्ष माला में बाँध दिया। “जब मार्ग बंद होने लगे, यह तुझे खींचेगा।”
अध्याय 6 — पितृलोक –
तीसरा द्वार अपने आप खुला। वहाँ धुंध थी, और धुंध में हजारों चेहरे।
देवांश ने अपने दादा को देखा, जो 1984 में गुजरे थे। वे युवा दिख रहे थे।
दादा ने कहा, “हमने भी यही मार्ग ढूँढा था, पर हम सिद्धलोक में रुक गए। तू आगे गया। अच्छा किया।”
देवांश ने पूछा, “क्या आप मुक्त नहीं हुए?”
“मुक्ति कोई स्थान नहीं, बेटा। हम यहाँ तुम्हारी प्रतीक्षा करते हैं, ताकि जब तुम आओ, तो तुम्हें रास्ता बता सकें। पितृलोक जेल नहीं, दीया है। हम तुम्हारी पीठ पर हाथ रखते हैं।”
दादा ने उसके लोटे में कुंड का जल भर दिया। “इसे ले जा। एक बूँद किसी मरते हुए को दे देना। वह शांति से जाएगा।”
तभी धुंध में घंटी बजी। पितृलोक का समय पूरा हुआ।
अध्याय 7 — वापसी –
देवांश फिर उस सात द्वार वाले हॉल में था। अब कुंड का पानी घट रहा था। दीवारें काँप रही थीं। पौष अमावस्या का एक पहर समाप्त हो रहा था।
उसने देवलोक के द्वार की ओर देखा। वह सबसे चमकदार था। भीतर से अप्सराओं का संगीत आ रहा था। मन खिंचा। पर तभी उसकी माला में बंधा पंख गरम हो गया। यक्ष की चेतावनी याद आई — जो रुक गया, वह लौटता नहीं।
उसने आँखें बंद कर मंत्र जपा — ॐ ह्रीं लोकान्तराय नमः। कुंड में कूद गया।
पानी नहीं, प्रकाश था। वह गिरता गया, फिर खिंचता गया।
आँख खुली तो वह व्यास गुफा के बाहर बर्फ पर पड़ा था। सुबह हो रही थी। ताशी उसे झिंझोड़ रहा था। पुजारी रो रहा था।
“हमने सोचा तू गया। तू बारह घंटे भीतर था।”
देवांश के हाथ में तांबे का लोटा था, आधा जल से भरा। माला में एक सफेद पंख बंधा था, जो बर्फ में भी गरम था। उसकी डायरी भीगी थी, पर उसमें नई लिपि में सात श्लोक लिखे थे, जो उसने लिखे नहीं थे।
उपसंहार
देवांश लखनऊ लौटा। उसने कभी उस मार्ग का स्थान सार्वजनिक नहीं किया। उसने केवल एक छोटी पुस्तक लिखी — लोकयान — जिसमें उसने लिखा:
हिमालय में गुप्त रास्ता पत्थर का नहीं, चेतना का है। वह हर बारहवें वर्ष खुलता है, पर केवल उनके लिए जो लेने नहीं, समझने जाते हैं। सिद्धलोक हमें सिखाता है कि ज्ञान स्थान नहीं है। यक्षलोक सिखाता है कि चुनाव ही भाग्य है। पितृलोक सिखाता है कि हम अकेले नहीं चलते।
वह लोटे का जल उसने अपने जीवन में तीन बार उपयोग किया — एक बार अपनी माँ के मित्र के लिए, एक बार कारगिल के एक घायल जवान के लिए, एक बार खुद के पिता के अंतिम समय में। हर बार मरने वाले के चेहरे पर शांति आई।
पंख अब भी उसकी माला में है। हर पौष अमावस्या को वह माना जाता है, शिला के पास बैठता है, पर द्वार नहीं खोलता। वह कहता है, “पहाड़ जब बुलाएगा, तब जाऊँगा।”
गाँव वाले कहते हैं कि कभी-कभी रात में व्यास गुफा के पीछे से नीली रोशनी आती है, और शंख जैसी ध्वनि सुनाई देती है। जो सुनते हैं, वे सपने में सात द्वार देखते हैं।
और हिमालय चुपचाप खड़ा रहता है — बर्फ में लिपटा, अपने भीतर अनंत लोकों को छिपाए, उस एक गुप्त रास्ते की रखवाली करता हुआ जो इस दुनिया को दूसरों से जोड़ता है।
साभार – रक्षा भारती जी की वाल से
