Monday, May 25, 2026
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खुशबुओं की पालकी पर सवार तंदुरूस्ती के राज | Smell Retraining Therapy

सुगंध स्वास्थ की देखरेख और रोगो के उपचार की सदियों पुरानी विधा है। सुभाषित सुगंध और रंग बिरंगे फूलो का संबंध दिमाग से होता है, तन-मन और दिमाग यही हमारी प्राचीन चिकित्सा का मूलाधार रहा है। ऐसे में समझा जा सकता कि दुनिया को खूबसूरत और स्वस्थ बनाए रखने में मनमोहक सुगंधों के जादू और रंग-बिरंगे फूलो का कितना योगदान है। सुगंध और पुष्प के जरिए आयुर्वेद में उपचार कि एक पूरी प्रणाली लंबे समय से विकसित रही है जिसे एरोमा थैरेपी कहा जाता है।

सुगंध चिकित्सा का इतिहास करीब 5000 वर्षो से पुराना है। एरोमा शब्द की उत्पत्ति ग्रीक शब्द स्पाइस से हुई है। आधुनिक युग में इसका प्रयोग व्यापक तौर पर मधुर सुगंध के अर्थ के रूप में होता है। बीच की कुछ शताब्दियों में हमारी इस प्राचीन चिकित्सा विधा का लोप हो गया था, लेकिन अब यह फिर लोकप्रिय हो रही है।

आयुर्वेदिक उपचार में पूरे पौधे का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि सुगंध चिकित्सा में फूलों से निकाले गए सुगंधित तेलों का, इन सुगंधित तेलों में तमाम तरह के प्रतिरोधक, विषाणु-विरोधी तथा रोगाणुरोधक होते है।

इतिहास में उल्लेख मिलता है कि ईसा पूर्व भारत में फूलों और सुगंध की उपचार प्रणाली खूब विकसित थी। ऋग्वेदिक काल में सुगंधित पेड़-पौधे और तेल का उपयोग होता था। उस समय किए जाने वाले यज्ञो में सुगंधित पदार्थों का प्रयोग वातावरण को शुद्ध कर देता था।

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इस संसार में हरेक प्राणी सुगंध के साथ ही जी रहा है। मधुर सुगंध मस्तिष्क पर अच्छा प्रभाव डाल सकती है, जो कि औषधि का कार्य करती है। जब हम किसी को फूल भेंट करते है तो इस सुगंध द्वारा उसे अच्छा महसूस करने में मदद करते हैं। सुगंधित तेल जैरेनियम, चमेली, लैवेंडर आदि विभिन्न प्रकार की फूलों को सुगंध प्रदान करते है। इसमें रसायन होते हैं जो नाड़ी संस्थान को आराम पहुचाते हैं तथा चित्तवृति को शीघ्र ही शांत करते हैं।

सुगंध चिकित्सा में सुगंधित तेलों को सुंघाकर या त्वचा पर मलकर प्रयोग में लाया जाता है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि ये तेल न केवल शरीर पर बल्कि भावनाओं पर भी प्रभाव डालते हैं। सूंघते समय सुगंध के बहुत सूक्ष्म कण हमारे फेफड़ों में चले जाते हैं और रक्त में मिल जातें है, और अनुकूल असर पैदा करते हैं।

वर्तमान आधुनिक जीवन में प्रदूषण, तनाव तथा पौष्टिकता से रहित भोजन और अस्वस्थ दिनचर्या हमारे शरीर और मन दोनों पर कुप्रभाव डाल रही है।

सुगंध चिकित्सा हमारे प्राण और स्पर्श इन्द्रियों को प्रभावित कर तन-मन का संतुलन बनाए रखती है। सुगंध चिकित्सा तनाव, चिंता और मनौवेदिक विकारों, मांसपेशियों व जोड़ों में दर्द, पाचन संबंधी गड़बड़ी और स्त्रियों की शारीरिक समस्याओं के उपचार में विशेष रूप से प्रभावी है।

आज विभिन्न प्रकार के अनेक विशेषज्ञ जैसे सुगंध चिकित्सक, मनोवैज्ञानिक चिकित्सा परामर्शदाता, नर्से, डाॅक्टर, सौंदर्य चिकित्सक आदि सुगंधित तेलों का उपयोग कर मरीज का इलाज करते हैं। सुगंधित तेलों का उपयोग इतना व्यापक हो गया है कि जीवन के लगभग हर क्षेत्र में इनकी भूमिका बढ़ती जा रही है।

सुगंध देने वाली वनस्पतियाँ और चिकित्सकीय उपयोग –
चन्दन – इसकी सुगंध तने और टहनियों के काष्ठ से प्राप्त होती है। सुगंध चिकित्सा में इसका विशेष प्रयोग होता है। यह अवसाद, चिड़चिड़ापन व भय को शांत करने में सक्षम है, साथ ही व्यग्रता, अनिद्रा, नजला, सर्दी-खांसी व अन्य श्वसन रोग विकारों को दूर करने में कारगार है। इससे फोड़े-फुंसी, रूखी त्वचा, एक्जिमा व मुहांसे भी ठीक हो जाते हैं।

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रोजमेरी – इसके समस्त पौधे में ही सुगंध निहित होती है। कमजोर याद्दाश्त,
एकाग्रचितता की कमी व मानसिक थकान में उपयोगी है। मोटापा दूर करने में भी उपयोगी है। साथ ही यह मोच व जोड़ों के दर्द में लाभप्रद व पेट में दर्द, कब्ज दूर करने में कारगर है।

गुलाब – इसकी सुगंध पुष्पों से प्राप्त होती है। यह आँखों की तकलीफ, मुंह में छाले, अल्सर, गले के घाव मितली, कब्जियत, सरदर्द, माइग्रेन व अवसाद के उपचार में उपयोगी है। साथ ही त्वचा की झुर्रियां, एक्जिमा, शवसन व पाचन विकारों में भी सहायक है।

तुलसी – श्वास संबंधी तमाम बीमारियों खासकर खांसी व नजला-जुकाम, अनिद्रा, मानसिक अवसाद, क्षीण स्मरण शक्ति, अनिर्णय, एकाग्रचित्ता की कमी आदि में उपयोगी है।

कपूर – ह्रदय रोग के लिए उत्तम, उच्च व निम्न रक्तचाप में समान रूप से कारगर, कब्ज, अपच, वमन, आंतविकार में उपयोगी, दांत-दर्द, पेट में कीड़े, पित्त विकारों में लाभप्रद और पैरों में छाले पड़ना, गठिया, मूत्र बांध खोलने में कारगर है।

पिपरमिंट- सर्दी-खांसी, फ्लू, छाती के संक्रमण, गठिया, पीठ दर्द, नाक से रक्तचाप, गले के घाव ठीक करने में सक्षम, पेट के दर्द, मुंह के संक्रमण में लाभदायक है। साथ ही यह माइगे्रन के उपचार में भी लाभदायक है।

यूकलिप्टस – इसकी सुगंध कपूर की गंध के समान, ताजगी भरी तथा तेज होती है- यह बुखार, सर्दी, फ्लू, गले के संक्रमण, गुर्दे के संक्रमण, जोड़ों व मांसपेशियों के दर्द में उपयोगी है। इसके प्रयोग से बंद नाक, नजला व सरदर्द से राहत मिलती है।

– शिप्रा कुमारी

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देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
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