Friday, July 24, 2026
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बालपन से लेकर युवावस्था की स्मृतियों का खजाना है “भावसरि: अरण्य, दुर्ग और पलामू”

पलामू के अरण्य इतने मनमोहक हैं कि नयन इन्हें देखकर जुड़ाते हैं तो अंगुलियां लिखकर अघाती हैं। जिन लोगों ने यहां की हरीतिमा को जिया हैं, उनके श्वांस में यहां के वृक्षों से निकला ऑक्सीजन बसा हुआ है। इन्हीं में से एक हैं डॉ. प्रियांकी। मरीजों के इलाज के लिए जिस कुशलता से पुर्जा लिखती हैं, उसी कुशलता से तरुवर की पूजा के शब्द लिखती हैं।

‘भावसरि: अरण्य, दुर्ग और पलामू’ (पेपरबैक, 101 पेज) डॉ. प्रियांकी (Priyanki Mishra) की पुस्तक है। लेखिका में और मुझ में काफी समानताएं हैं। दोनों के पापा मित्र रहे हैं। एक कॉलेज में पढ़ाते थे। एक मुहल्ले में रहते थे। बेतला के जंगलों और पलामू किला को समान रूप से निहारने की क्षमता रखते थे। दोनों ने अपनी संतानों को ऐसे संस्कार दिए कि ये भी पलामू से अथाह प्रेम करने लगे। प्रियांकी की पुस्तक में बालपन से लेकर युवावस्था तक की अनमोल स्मृतियां भरी पड़ी हैं।

एक जगह लेखिका का बचपन और परिपक्वता दोनों देखने को मिलता है। वह लिखती हैं, ‘चश्मा गोद में लेकर बैठी थी।उठी तो संभवतः औरंगा की निर्मल धारा ने उसे अपनी गोद में समेट लिया। मुझे तो बहुत बाद में याद आया कि मेरा चश्मा गायब है। बहुत ढूंढा, नहीं मिलना था, नहीं मिला।‌ अभी भी लगता है कि बेतला की धरती ने जानबूझकर मेरा कुछ सामान अपने पास रख लिया है। उसे भी तो यादों की कुछ धरोहर चाहिए।’

केचकी स्टेशन के लिए वह लिखती हैं, ‘एक छोटा सा लाल ईंटों से बना कमरा और क्रॉसिंग, अभी भी ब्रिटिश जमाने की याद कराते हैं। ऐसे वक्त पर बार-बार मेरे जेहन में आर.के. नारायण की किताब कौंधती है, मालगुडी डेज। हमारा तो मालगुडी यही था।’ सही में हर पलामूवासी को यहां यही फीलिंग आती है। अनूप लाल मेरे अभिन्न मित्र हैं। छिपादोहर में उनके बाबूजी और मामा का भी आरा मिल था। पुस्तक में उनके मामा बिंदेसर प्रसाद के घर में रहने वाली हिरणी का जिक्र है। यह हिरणी प्रजनन काल में जंगल में चली जाती थी और फिर वापस आ जाती थी।

लेखिका के नाना छिपादोहर में वन विभाग में अधिकारी थे। लेखिका ने भले अपने नाना और मौसी के बारे में लिखा है पर हर इंसान के नाना और मौसी ऐसे ही होते हैं। जिन बच्चियों के कान नहीं छिदे होते हैं, उनकी मौसी धागे में बांध कर बालियां लटका देती हैं। प्रियांकी की मौसी ने भी ऐसा किया है। छिपादोहर में बीगन की गुमटी की मिठाइयां और जीएलए कॉलेज के हॉस्टल के शिव मंदिर की चर्चा भावुक करने वाली है।

बहन प्रियांकी ने अपनी पुस्तक के लिए शुभकामना‌ लिखने का अवसर देकर मेरा सम्मान बढ़ाया है। जब मैंने पुस्तक ऑनलाइन मंगाई और पढ़ने लगा तो ‘अपनी बात’ में उसने मुझसे प्रेरणा मिलने की बात लिखी है। भाई के रूप में इस बात को स्वीकार करना मेरे लिए थोड़ा कठिन रहा।

डॉ. प्रियांकी ऐसे ही लिखती रहें, यही कामना है। पलामू, बेतला, छिपादोहर को जानने वालों को यह पुस्तक भावनाओं से सराबोर कर देगी।

पुस्तक काव्य कुमुद पब्लिकेशन मीडिया से छपी है जो अमेज़ॉन पर उपलब्ध है।

– प्रभात मिश्र

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देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
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