अजय चौहान । साधारणतया भले ही हम विभिन्न कथाओं के माध्यम से यह जानते और पढ़ते हैं कि भगवान श्रीकृष्णा ने आतताइयों के बार-बार होने वाले आक्रमणों से बचने के लिए सिंधु सागर, यानी आज के अरब सागर में एक दिव्य द्वारिका नगरी का निर्माण कराया था। लेकिन जब हम उस विषय से जुड़ी कथाओं को अन्य ग्रंथों में भी, और अधिक गहनता से अध्ययन करते हैं तो ज्ञात होता है कि समुद्र के जल में द्वारका नगरी का निर्माण तो उन्होंने अपने एक भक्त को आशीर्वाद के रूप में दिया था।
#श्रीगर्ग-संहिता के द्वारिका खण्ड में नौवें अध्याय के अनुसार एक कथा आती है जिसमें, राजा बहुलाश्व नारद जी से भगवान श्रीकृष्ण के विषय में कई जानकारियों से जुड़े प्रश्न पूछते हैं और नारद जी उनके सभी प्रश्नों के उत्तर देते हैं। उन्हीं में से एक प्रश्न जो राजा बहुलाश्व पूछते हैं कि तीनों लोकों में विख्यात द्वारकापुरी, जहाँ साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण निवास करते हैं उसके विषय में भी बताइए। आप ही के मुख से सुना है कि द्वारकापुरी साक्षात् श्रीकृष्ण के अङ्ग से प्रकट हुई है तो कृपया ये भी बताइए कि किस काल में और कैसे यह पूरी यहाँ पृथ्वी पर आयी, कृपया यह भी मुझे बताइये।
तो, इसपर #श्रीनारदजी ने बताते हैं कि तुम्हें साधुवाद है जो तुमने इतना अच्छा किया। तुमने द्वारका के पृथ्वी पर आगमन का कारण पूछा है तो जिसे सुनकर पापी भी पाप से मुक्त हो जाते हैं, तो सुनो, अब मैं उस द्वारिका पूरी के पृथ्वी पर आगमन का कारण और महत्व बताता हूं।

और फिर नारद जी उनको आगे बताते हैं कि, मनु के पुत्र शर्याति नामक एक राजा हुए, जो चक्रवर्ती सम्राट् थे। उन्होंने दस हजार वर्षों तक इस भूतल पर धर्मपूर्वक राज्य किया। उनके तीन पुत्र हुए, जिनके नाम थे- उत्तानबर्हि, आनर्त और भूरिषेण। राजा शर्याति ने अपने उस सबसे बड़े पुत्र उत्तानबर्हि को पूर्व दिशा और सबसे छोटे पुत्र भूरिषेण को दक्षिण दिशा का शासक नियुक्त कर दिया और मझले पुत्र आनर्त को संपूर्ण पश्चिम दिशा का राज्यभार सौंप दिया।
इसके बाद वे पुत्रों से बोले- ‘यह सारी #पृथ्वी मेरी है। मैंने धर्मपूर्वक इसका पालन किया है तथा बलपूर्वक इसका अर्जन किया है; अतः अब तुम लोग भी इस धर्म इसका पालन करो।’ पिता की यह बात सुनकर मझले पुत्र आनर्त ने हँसते-मुस्कुराते हुए अपने पिता को ही एक ज्ञानमय वचन कह दिया।
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उस मझले पुत्र आनर्त ने पिता से पूछा की – राजन् ! न तो आप ने कभी इस पृथ्वी का पालन किया है और न आपके बल से इसका अर्जन हुआ है। हे पिता! बलिष्ठ तो भगवान् श्रीकृष्ण ही हैं, अतः यह पृथ्वी श्रीकृष्ण की है। यह सारी पृथ्वी आपकी कैसे हो सकती है? उन्होंने इसका पालन किया और उन्हीं के तेज से इस सम्पूर्ण वसुंधरा का अर्जन हुआ है। इसलिए भगवान् श्रीहरि के समान बलिष्ठ दूसरा कोई नहीं है। वे ही भगवान् अपने द्वारा प्रकट किये गये इस जगत की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं। वे ही #परब्रह्म परमात्मा हैं और वे ही ‘काल’ हैं। जो सम्पूर्ण भूतों के भीतर प्रवेश करके सबका आश्रय है, साक्षात् परिपूर्णतम श्रीहरि तो वे ही हैं। जिनके भय से हवा चलती है, जिनके भय से सूर्य तपते हैं, जिनके भय से मृत्यु घूमती रहती है। अतः हे राजन ! उन साक्षात् परिपूर्णतम परमेश्वर श्रीकृष्ण का सम्पूर्ण हृदय से अहंकारशून्य होकर भजन कीजिये।
श्रीनारदजी आगे कहते हैं कि, राजा शर्याति महाज्ञानी होकर भी पुत्र के वाणीरूपी बाणों से आहत होकर स्वयं को अपमानित महसूस करने लगे और क्रोधित होते हुए अपने उस मझले पुत्र आनर्त से बोले – ओ खोटी बुद्धिवाले बालक! दूर हट जाओ। तुम गुरु की भाँति मुझे उपदेश कैसे कर रहे हो? चले जाओ यहाँ से, और जहाँ तक मेरा राज्य है वहाँ तक की भूमि पर अब तुम निवास नहीं करोगे। तुमने जिन सर्वसहायक श्रीकृष्ण की आराधना की है, वे भगवान् भी अब तुम्हें नई भूमि नहीं दे सकते। क्योंकि पृथ्वी तो एक ही है। यदि दे सकते हैं तो जाओ और जाकर उनसे अपने लिए कोई नयी पृथ्वी मांग लो।

श्रीनारद जी आगे कहते हैं कि, उनके यों कहने पर दूसरों को मान देने वाले आनर्त ने राजा से कहा— जो आज्ञा पिताश्री, आपका वचन मेरे लिए आदेश के समान है। जहाँ तक पृथ्वी पर आपका राज्य है, वहाँ तक मेरा निवास नहीं होगा?’ पिता राजा शर्याति द्वारा निकाले गये आनर्त उनसे विदा ले समुद्र के तट पर चले गये और समुद्र के एक दम किनारे पर पहुँचकर दस हजार वर्षों तक उसके जल में तपस्या करते रहे।
आनर्त की कठोर तपस्या और भक्ति से प्रसन्न हो भगवान् श्रीहरि ने उन्हें अपने स्वरूप का दर्शन कराया और वर माँगने के लिये कहा। आनर्त हाथ जोड़कर शीघ्रतापूर्वक उठे और भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में प्रणाम किया। फिर आनर्त बोले- हे देव! मेरे पिता ने मुझे राज्य से बाहर निकाल दिया है, अतः मैं आपकी शरण में आया हूँ। मुझे दूसरी कोई ऐसी भूमि दीजिये, जहाँ मैं निवास कर सकूं।
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श्रीभगवान् आनर्त से बोले- इस लोक में दूसरी कोई पृथ्वी तो है नहीं, फिर मैं क्या करूँ? परन्तु तुम्हारी भक्ति से मैं संतुष्ट हूँ, अतः अपनी बात सत्य करने के लिये तुम्हें अपने दिव्यलोक वैकुण्ठ धाम का सौ योजन लंबा-चौड़ा अत्यन्त निर्मल तथा शुभ भाग भूखण्ड के रूप में इस पृथ्वी पर लाकर देता हूँ। जो इस भूमि से अलग ही होगा।
भक्त आनर्त से यों कहकर भगवान् श्रीकृष्ण ने वैकुण्ठ से सौ योजन विशाल भूखण्ड उखाड़ मँगाया और भयंकर शब्द करने वाले समुद्र में सुदर्शन चक्र की नींव बनाकर उसी के ऊपर उस भूखण्ड को स्थापित कर दिया। राजा आनर्त ने एक लाख वर्षों (वैकुण्ठ के समयानुसार) तक पुत्र-पौत्रों से सम्पन्न हो वहाँ राज्य किया। उस राज्य में वैकुण्ठ का वैभव भरा हुआ था।
आनर्त के पिता महाराज शर्याति ने जब यह समाचार सुना, तब उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। कहा जाता है की राजा आनर्त के नाम से ही ‘आनर्त’ नामक देश प्रकट हुआ। उन आनर्त के रेवत नाम का एक पुत्र भी हुआ जो कुशस्थली पुरी का निर्माण करा के वहाँ दीर्घकाल तक राज्य करने के पश्चात् अपनी कन्या रेवती को साथ ले सशरीर ब्रह्मलोक में गये थे। यह वही रेवती है जिनका विवाह श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलदेव जी से हुआ था। इसी कारण पुण्यमयी द्वारकापुरी को देवताओं ने ‘मोक्ष का द्वार’ माना है।
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