Sunday, June 14, 2026
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क्या पोलियो की दवाई बनने से पहले हमारे पूर्वज चल-फिर नहीं कर पाते थे?

जरा सोच कर देखिए कि, गूगल से प्राप्त इस सूचना के अनुसार, पोलियो की वैक्सीन का अविष्कार ही मात्र 1955 में Dr. Jonas Salk द्वारा किया गया था, जो एक इंजेक्शन के रूप में दी जाती थी। और इसके बाद, 1961 में Dr. Albert Sabin के द्वारा मुंह से दी जाने वाली, यानी ओरल पोलियो वैक्सीन विकसित की, जिसने दुनिया भर में इसके टीकाकरण बेहद आसान हो गया। यानी इसके बाद ही भारत में भी पोलियो की दवाई दी जाने लगी।

लेकिन, सवाल तो ये है कि क्या इसके पहले भारत में कोई भी बच्चा स्वस्थ जन्म नहीं ले पाता था, या भारत की जनसंख्या बिल्कुल भी स्वस्थ नहीं रहती थी? क्या पृथ्वीराज चौहान, शिवाजी, महाराणा प्रताप और ऐसे ही सैकड़ो, हजारों, लाखों और करोड़ों वीर योद्धा और आमजन, महिला-पुरुष आदि पोलियो की दवाई के बिना चल-फिर नहीं कर पा रहे थे? और क्या हमारे वे सारे पूर्वज इस पोलियो की दवाई के बिना अपंग ही पैदा होते थे?

यदि नहीं तो फिर क्या कारण और क्या उद्देश्य है कि आज-इन टीकों का कोई विरोध नहीं करते? आजकल तो खासकर भारतीय शहरों में किसी भी स्त्री के गर्भवती होने के बाद उसे तुरंत कई प्रकार के टीके लगने लग जाते हैं। गर्भावस्था से लेकर बच्चों के जन्म होने और लगभग 1 से 5 वर्ष की आयु तक आते-आते उसे न जाने कितने इंजेक्शन लग जाते हैं।

इन टीकों और इंजेक्शन से जुड़ी तमाम खबरें तो ऐसी भी हैं की इन टीकों के कारण वर्तमान में मानसिक और शारीरिक तौर पर कई बच्चे कम विकसित और विकलांग पैदा हो रहे हैं। उनको जन्म देने वाली माताएं स्वयं भी उसके बाद शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर लगातार परेशान रहती हैं। तो फिर विदेशी चंदों पर पलने वाले एनजीओ और स्वयंसेवी संगठन, वैज्ञानिक या फिर विषय से जुड़े कुछ खास एक्सपर्ट आवाज क्यों नहीं उठाते? और यदि आवाज उठती भी है तो उसे दबा क्यों दिया जाता है?

दरअसल, खबर ये है कि उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद स्थित डूंडाहेड़ा एसटीपी के दूषित पानी की जांच में पोलियो वायरस मिलने से हड़कंप मच गया है। स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट में वायरस की पुष्टि होने के बाद विभाग अलर्ट मोड पर है और 107 टीमें घर-घर जाकर सैंपल जुटाने में लग गई हैं।

सवाल ये है कि यदि, एहतियात के तौर पर, WHO की टीम ने भारत के स्वास्थ्य विभाग के साथ मिलकर डूंडाहेड़ा सहित 12 संवेदनशील क्षेत्रों में घर-घर जाकर सर्वे शुरू कर दिया है
तो इसमें विदेशी स्वास्थ विभाग यानी WHO की टीम का क्या काम है? मामला तो भारत के स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा है!

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देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
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