Tuesday, August 11, 2026
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प्लास्टिक का बढ़ता साम्राज्य: भाग – दो

अजय चौहान | आधुनिक विज्ञान की देन प्लास्टिक का कचरा आज मानव सभ्यता के सामने खड़े उन गंभीर संकटों में से एक है, जिसका प्रभाव केवल हमारी धरती की सुंदरता ही नहीं, बल्कि मनुष्य के भविष्य, स्वास्थ्य और अस्तित्व के लिए भी गंभीर खतरा बनता जा रहा है। हर एक नदियों, समुद्रों, खेतों और जंगलों में जमा प्लास्टिक का कचरा धीरे-धीरे टूटकर सूक्ष्म प्लास्टिक कणों में बदल रहा है, जो जल, मिट्टी, भोजन और यहाँ तक कि मानव शरीर तक भी आसानी से पहुँच रहा है। प्लास्टिक के कारण असंख्य पशु-पक्षी और समुद्री जीव हर वर्ष मर रहे हैं तथा जल और मिट्टी की प्राकृतिक गुणवत्ता लगातार प्रभावित हो रही है।

प्राप्त सरकारी आंकड़ों और अनुमान के अनुसार भारत में प्लास्टिक के कचरे के उत्पादन के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण आधिकारिक आँकड़ा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड यानी CPCB और राज्यों द्वारा एक रिपोर्ट के माध्यम से जारी किया गया। इसके अलावा मार्च 2026 में संसद में दिए गए एक सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2020–21 में 41,26,808 (इकतालीस लाख छब्बीस हजार आठ सौ आठ) टन, 2021–22 में 39,01,802 (उनतालिस लाख एक हजार आठ सौ दो) टन और 2022–23 में 41,36,188 (इकतालीस लाख छत्तीस हजार एक सौ अट्ठासी) टन है। यानी 2022–23 में आधिकारिक रूप से भारत में लगभग 41.36 लाख टन plastic waste यानी प्लास्टिक का कूड़ा दर्ज किया गया। यहाँ इस बात को भी ध्यान रखना होगा कि ये प्लास्टिक का ये कूड़ा “भारत में कुल प्लास्टिक उत्पादन” का हिस्सा नहीं है; बल्कि ये तो एक अनुमान के आधार पर दिया गया आंकड़ा यानी reported plastic waste generation है।

भारत में plastic waste –
CPCB यानी भारत के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा सन 2021–22 के उपलब्ध राज्यवार आंकड़ों के अनुसार plastic waste में प्रमुख योगदानकर्ताओं में कर्नाटक करीब 13.53% आंकड़ों के साथ सबसे ऊपर है। बाद तेलंगाना का नाम आता है जो 12.68% में दूसरे स्थान पर और तीसरे स्थान पर तमिलनाडु है जो 10.18% के साथ शामिल हैं। हालाँकि ये आंकड़े प्लास्टिक उत्पादन के आधार पर हैं। असल में इसकी रैंकिंग प्रतिवर्ष राज्यवार बदलती रहती है। लेकिन ये आंकड़े इस प्रतिशत से भी कहीं अधिक हो सकते हैं, क्योंकि ऐसे बहुत से लघु उद्योग और उत्पादक होते हैं जिनका आंकड़ा कभी सामने नहीं आ पाते।

भारत में अधिकतर लोगों की आम धारणा और अज्ञानता के अनुसार प्लास्टिक प्रदुषण की समस्या केवल सिंगल यूज़ plastic bags है। जबकि, कई तरह की food packaging, multilayer packaging, पानी की बोतलें, प्लास्टिक की फैंसी पन्नियां, सिंगल यूज़ शॉपिंग बैग, केवल एक बार उपयोग होने वाले डिब्बे, खेती में उपयोग होने वाली प्लास्टिक, औद्योगिक उत्पादन सामग्री की पैकिंग वाला सिंगल यूज़ प्लास्टिक, गाड़ियों में लगने वाले विभिन्न पार्ट, सिंथेटिक वस्त्र, घरेलू उत्पाद, मेडिकल और अन्य उपयोग के प्लास्टिक सामान आदि। यही कारण है कि प्लास्टिक प्रदूषण के लिए हम केवल एक मात्र केरी बैग को बंद करने से नहीं होगा।

भारत ने अबतक क्या कदम उठाए हैं? –
भारत में “पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय” द्वारा “प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016” के तहत प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन का regulatory framework यानी “नियामक ढांचा” बनाया गया था। इसके बाद 2021 में मात्र कुछ ही सिंगल यूज़ प्लास्टिक उत्पादों को खतरनाक मान कर उनपर प्रतिबन्ध लगाया गया था, जैसे कि – प्लास्टिक स्टिक, कप, प्लेट, स्ट्रॉ और कैरी बैग आदि उसमें शामिल किया गया, और 1 जुलाई 2022 से इसको प्रभावी भी कर दिया गया। लेकिन इसका प्रभाव केवल कागज़ों और भ्रष्टाचार में ही सिमट कर रह गया।

क्या भारत में plastic recycling हो रही है? –
यदि पूछा जाय कि, क्या भारत में plastic की recycling हो रही है? तो उत्तर मिलेगा हाँ। क्योंकि भारत में plastic waste के recycling और processing का बड़ा ecosystem मौजूद है। लेकिन इसके लिए चुनौती ये है कि इसके तहत हर प्रकार का plastic आसानी से recycle नहीं किया जा सकता। क्योंकि इसके तहत खासकर कई प्रकार से मिले-जुले प्लास्टिक, कई परतों में की जाने वाली पैकेजिंग, दूषित और झूठी प्लास्टिक, काम कीमत वाली पैकेजिंग पन्नियां आदि को एकत्र कर अलग उसको पुनः रीसायकल करना कठिन और महँगा हो सकता है। फिलहाल प्लास्टिक का “recycling” होना बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके कम होने और reuse से पहले recycling को समाधान मानना पर्याप्त नहीं है। क्योंकि प्लास्टिक से होने वाला नुकसान केवल पर्यावरण और हमारी सेहत तक सीमित नहीं है बल्कि अब इसके द्वारा हमारे समस्त संसाधनों को प्रभावित किया जा रहा है।

भविष्य में क्या हो सकता है? –
यदि दुनिया ने प्लास्टिक का मौजूदा खपत और इसके लिए waste-management trends को स्थाई तौर पर नहीं देखा गया तो समस्या तेजी से बढ़ सकती है। इसीलिए तो OECD के आंकड़ों के अनुसार सन 2060 तक प्लास्टिक का कचरा लगभग लगभग तीन गुना हो सकता है। हालाँकि ये भविष्यवाणी कोई निश्चित नहीं हैं। क्योंकि आकड़े इससे भी कहीं अधिक भयंकर हो सकते हैं।

क्या दुनिया को प्लास्टिक छोड़ देना चाहिए? –
हालाँकि यह भी व्यावहारिक या वैज्ञानिक समाधान नहीं है की प्लास्टिक को स्थाई रूप से अब छोड़ ही देना चाहिए। क्योंकि प्लास्टिक के अनेक महत्वपूर्ण उपयोग होने लगे हैं जो अब हमारे लिए एक प्रकार से प्राकृतिक वास्तु समझा जाने लगा है। जैसे कि मेडिकल उद्योग में, खाद्य सामग्रियों  पैकेजिंग में, उद्योग उत्पादन की पैकेजिंग में, हलके वाहनों के उपकरणों में, जल एवं स्वच्छता आदि में। यही कारण है कि हर प्रकार के प्लास्टिक को खत्म करना अब इतना आसान नहीं है जितना की सन 1907 की शुरुआत में इसके जन्म में ही संभव था। लेकिन हम सभी एक लक्ष्य लेकर चल सकते हैं जिसके अनुसार अनावश्यक प्लास्टिक का इस्तमाल कम करना, सिंगल उसे प्लास्टिक का उपयोग बंद करना, reuse बढ़ाना, recycling को बढ़ाना, बेवजह प्लास्टिक का कचरा करने से रोकना और microplastic sources को कम से कम होने देना।

प्लास्टिक का बढ़ता साम्राज्य: भाग – एक

सबसे प्रभावी समाधान क्या है? –
प्लास्टिक के कचरे की समस्या को केवल “कचरा उठाने” से हल नहीं किया जा सकता, बल्कि इसके उत्पादन से समाधान तक के पूरे जीवन-चक्र पर नज़र रखान होगा। और ये काम काम लोगों से संभव नहीं हो सकता इसलिए सरकारों को ही आगे आना होगा। सरकारों की नीतियों के द्वारा यदि शुरुआत में ही अनावश्यक प्लास्टिक का उत्पादन कम हो जाए तो अंत में इसके Recycle होने की समस्या भी कम होगी।

growing empire of plastic part two in hindi

भारत क्या कर सकता है? –
भारत जैसे विशाल देश को प्लास्टिक कचरे से निजात पाने के लिए कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण कदम उठाने आवश्यक होते जा रहे हैं, जिसमें – प्राकृतिक कचरे और प्लास्टिक कचरे को अलग-अलग रखना। खुले में कचरा जलाने से रोकना, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में खुले में पड़े प्लास्टिक कचरे को एकत्र कर एक जगह रखना। नदियों और नालों में प्लास्टिक कचरे को फैलने से रोकना और विशेष निगरानी रखना। जिस किसी भी कंपनी द्वारा पैकेजिंग में प्लास्टिक का उपयोग हुआ है उसके waste को collection और recycling में उत्तरदाई ठहराना आदि।

दुनिया के सामने बड़ी चुनौती क्या है? –
आज का विज्ञान एक ऐसी सामग्री का उत्पादन कर रहा है जो बेहद टिकाऊ तो है, लेकिन उसका उपयोग बेहद खतरनाक है। दूसरी भाषा में कहें तो हम एक ऐसी सामग्री बना रहे हैं जिसकी आयु बहुत लंबी है, लेकिन उसके इस्तेमाल करने का समय बहुत छोटा है। फिर चाहे वो सिंगल उसे प्लास्टिक हो या बार बार उपयोग में आने वाला हो।

आधुनिक सभ्यता की सबसे उपयोगी और सबसे चुनौतीपूर्ण सामग्रियों में से एक बन चुका है प्लास्टिक। जहां एक और 1950 के दशक में लगभग 2 मिलियन टन वार्षिक उत्पादन से शुरू होकर आज वही प्लास्टिक वैश्विक स्तर पर सन 2019 तक लगभग 460 मिलियन टन पहुँच चुका था। इसी के साथ 2019 में लगभग 353 मिलियन टन ये कचरा बनकर भी सामने आ गया और लगभग 22 मिलियन टन प्लास्टिक पर्यावरण में जहर की तरह फ़ैल भी गया।

भारत में तो ये समस्या और भी गंभीर है, क्योंकि यहां सरकारों को इनकी जानकारी है अथवा नहीं कोई फर्क ही नहीं पड़ता। फिर भी सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत में सन 2022–23 में लगभग 41.36 लाख टन प्लास्टिक का कचरा दर्ज किया गया। सोच कर देखिये की क्या इस कचरे का असर केवल मनुष्य द्वारा दिखाई देने वाले कचरे तक ही सीमित होगा। जबकि ये प्लास्टिक मिट्टी में दब जाता है और microplastics में टूट कर उर्वरता को ख़त्म करता है, यही प्लास्टिक हमारी नदियों में जाता है, वहाँ से समुद्र में पहुँचता है, नालियों को जाम कर देता है।

ऐसे में यदि प्लास्टिक के अंधाधुंध उत्पादन और उपयोग पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया और पुनर्चक्रण और जिम्मेदार कचरा प्रबंधन को जीवनशैली का हिस्सा नहीं बनाया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को ऐसी धरती विरासत में मिल सकती है जहाँ स्वच्छ जल, उपजाऊ मिट्टी, सुरक्षित भोजन और स्वस्थ पर्यावरण दुर्लभ हो जाएँ। इसलिए प्लास्टिक का संकट केवल पर्यावरण की समस्या नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के अस्तित्व और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की चुनौती है।

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देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
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