Sunday, June 21, 2026
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हस्ती तो कब की मितानी शुरू हो चुकी है लेकिन…

 

जो सभ्यता और संस्कृति अपने अतीत को संभल कर नहीं रख पाती उसका हश्र क्या होता है यह बताने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इस बात के तमाम उदहारण मौजूद हैं। हालाँकि हिन्दू समाज आज भी उस एक कहावत को बेवजह बिना कुछ सोचे समझे रटता रहता है जिसमें कहा जाता है कि- “हस्ती है की मिटती नहीं।” जबकि सच तो ये है कि हस्ती तो कब की मितानी शुरू हो चुकी है। यदि विश्वास न हो तो यहाँ देख लें और खुद ही तय करें की क्या सच है और क्या नहीं।

उदहारण के लिए वर्ष 1995 में राजपूत पृष्ठभूमि पर बनी एक की फ़िल्म आई थी “करण-अर्जुन” जिसमें एक गीत था –

“छत पे सोया था बहनोई, मैं तन्ने समझ के सो गई।
मुझको राणाजी माफ करना, गलती म्हारे से हो गई।।”

इस फ़िल्म के आने से पहले तक “राणाजी” मात्र के शब्द ही नहीं बल्कि विशेषण और अत्यंत रौबदार तथा सजीले, मर्यादित और सभ्य व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होता था, और प्रायः राजस्थान के जितने भी लोकगीत हैं उनमें राणाजी, यानी महाराणा प्रताप अथवा मेवाड़ के महाराणाओं के लिए प्रयोग किया जाता था। मात्र इतना ही नहीं बल्कि, वीर सम्राट महाराणा प्रताप के सम्पूर्ण संघर्षमय जीवन को सम्बोधित कर, ठेठ ग्रामीण स्त्रियां और गोड़िया लुहार आदि सभी अपने विरहा में उस दर्द को गाते रहते थे। इसके अलावा, मीराबाई के कई भजनों में भी यही सम्बोधन पड़ने और सुनने को मिलता है।

लेकिन बॉलीवुड का एक गीतकार जिसका पूरा नाम था श्यामलाल बाबू राय उर्फ़ इन्दीवर। उसी इन्दीवर ने एक गीत लिखा और उस गीत में विशेषतौर पर “राणाजी” शब्द पर जोर दिया। ऐसा लगता है कि इन्दीवर ने यह गीत किसी विशेष व्यक्ति या समाज के प्रभाव और दबाव में आकर लिखा और न सिर्फ उस हिन्दू सम्राट को बल्कि उस सम्राट पूजने वालों को भी नीचा दिखाने के लिए इस गीत को जानबूझ कर लिखा था। इन्दीवर ने उस गीत में “राणा” को जोड़कर जिस प्रकार से अश्लील अर्थ प्रचारित किया, एक श्रेष्ठ शब्द का न सिर्फ भयंकर उपहास हुआ बल्कि अपमान भी हो गया।

यह भी सच है कि वह जमाना आर्केस्ट्रा का था, इसलिए उन दिनों रात भर फरमाइश पर इसी गीत की ताल पर बड़े घरों की बेटियां नाचती रहती थीं। गीत के बोल पर पढ़े-लिखे और सभ्य शहरी लोग भी सबसे अधिक मजे ले लेकर थिरकते देखे जा रहे थे. लेकिन इसका अर्थ इतना घटिया यह बात बहुत ही कम लोग जानते थे।

उधर राजस्थान के किसी भी गांव में उक्त शब्द को गाना या गुनगुनाना तो दूर, बोलना भी पाप और अपराध था। ऐसा नहीं था की सरकार या कोई कानून इसको बुरा मानता था, बल्कि सच तो ये है कि आज भी राजस्थान के किसी भी गांव में इस गीत या इस प्रकार के बोल आदि को असभ्य, अनैतिक, संस्कारहीन, और जिहादी मानसिकता माना जाता है।

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जिन शहरी लोगों को यह मनोरंजन से भरपूर गीत लगता है और बहनोई के साथ सोना, मुँह काला करवाना एक साधारण सी बात लगती है उसके ठीक एकदम उलट, किसी भी सभ्य ग्रामीण समाज और जीवन के लोगों के बीच बहनोई के साथ सोना या मुँह काला करवाना जैसे शब्दों को सुनकर आज भी तलवारें चल जाती हैं अथवा सिर धड़ से अलग कर दिया जाता है।

इस प्रकार के घ्रणित और घटिया गाने को लेकर किसी शहर में रहने वाले लोगों को अफसोस भले ही नहीं हुआ हो, लेकिन ग्रामीण जीवन के लिए यह एक प्रकार का बहुत बड़ा अपमान साबित हुआ और आज भी हो रहा है. बावजूद इसके शहरी लोग इस गाने पर खूब थिरकते रहे और संस्कारों की खिल्ली उड़ाते रहे और तत्कालीन भारतीय समाज ने खुलकर नाच किया और मर्यादा तार-तार होती रही।

आज भी जिस प्रकार से राजस्थान के राजपूत समाज में एक असंतोष और अपमान की टीस सी दिखती है उसका कारण यह भी है कि भारत की जिहादी फ़िल्म इंडस्ट्री ने राजस्थान के राजपूतों को ऐसे ही प्रतीकों से जोड़कर इतना कुप्रचार फैलाया और शेष समाज उस पर मजे लेता रहा।

हद तो तब हो गई जब इसके बाद फिल्म “जोधा-अकबर” और फिर “पद्मावती” जैसी फ़िल्में आईं और इन फिल्मों के द्वारा राजस्थानी संस्कृति और मर्यादा आदि का अवमूल्यन चरम पर पहुंच गया। राजस्थान के वे लोग जो कभी “राणाजी” शब्द सुनकर आँखों में आक्रोश और हृदय में तड़प अनुभव करता था, अब वहां अश्लील फब्तियां ही बच गईं हैं।

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हालाँकि राजपूतों का यह दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि राजपूतों द्वारा ही पालित राजस्थान के मुस्लिम “मंगनियार” कलाकारों ने भी कई ऐसे गीत लिखे और गाये जिनमें राजपूत योद्धाओं की वीरता के बजाय अपमान ही हुआ। ओर तो ओर, वीरता की प्रतीक भूमि उदयपुर को भी मात्र झीलों की एक सुन्दर और पर्यटन की नगरी बना कर रख दिया गया है।

एक ऐसा ही गीत था जो थार रेगिस्तान के लोक संगीतकार के रूप में मुस्लिम मंगनियार कलाकारों द्वारा गाया जाता था, जिसमें कहा गया कि “राणा तू अलबेले ना धोखो मते दए!” यानी इस लोकगीत में भी महाराणा को कहा गया है कि तुम अकबर को धोखा मत देना और उसकी बात मान लेना।

आज के दौर में राजपूती वेश और संस्कृति को जिस प्रकार से आधुनिक रूप देकर, उसका अश्लील और फूहड़ तरीके से नृत्य प्रचारित किये जा रहे हैं और जिस प्रकार से जनता तालियां बजाये जा रही है यह मार्ग न सिर्फ राजस्थान के लिए बल्कि सम्पूर्ण हिन्दू समाज के लिए पतन का कारण बनने जा रहा है।

बॉलीवुड आज जो पाप आर रहा है उसकी सजा उसे तो नहीं लेकिन उसी समाज को मिल रही है जो इसको देख और सुन कर खूब तालियाँ बजा रहा है। इस महाभयंकर पाप की कोई सजा आज तक बॉलीवुड में किसी को भी नहीं मिली, जबकि हिन्दू समाज धीरे-धीरे पतन की और चला जा रहा है।

हिंदुओं को अपनी सांस्कृतिक और गौरवशाली धरोहर व विरासत आदि को संजो कर रखना ही होगा, नहीं तो हमारी संस्कृति से होने वाला खिलवाड़ किसी के लिए व्यावसाय और किसी के लिए मृत्यु का कारण बन जाएगा। हमें ये भी ध्यान रखना होगा कि इसके लिए वे लोग आगे नहीं आने वाले है जो खुद हमारा नाश करने पर तुले हुए हैं।

– गणपत सिंह चौहान, खरगोन (मध्य प्रदेश)

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देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
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