Saturday, June 27, 2026
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बगुला: धैर्य, मौन और एकाग्रता और प्रतीक्षा का प्रतीक

अजय चौहान | बगुला न केवल धैर्य, एकाग्रता और प्रकृति का शांत प्रहरी माना जाने वाला पक्षी है बल्कि सनातन भारतीय परंपरा में भी इसका ऐतिहासिक, पौराणिक महत्व है। इसलिए बगुले से जुड़े तमाम वैज्ञानिक तथ्यों एवं भारत में पाए जाने वाले उदाहरणों के आधार पर प्रस्तुत है  विस्तृत लेख:

बगुला मात्र एक साधारण पक्षी नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति, साहित्य, दर्शन और लोकजीवन में गहरे रूप से जुड़ा हुआ पक्षी है। किसी तपस्वी की भाँती तालाबों, नदियों और धान के खेतों के किनारे एक टांग पर स्थिर खड़ा रहने वाला सफेद बगुला सदियों से धैर्य, प्रतीक्षा और एकाग्रता का प्रतीक माना जाता रहा है। दूसरी ओर देखें तो भारतीय लोककथाओं में “बगुला भगत” जैसे कुछ मुहावरों के माध्यम से इसको कपटपूर्ण और आडंबर का प्रतीक भी बनाया गया है। इस प्रकार बगुला प्रकृति और संस्कृति—दोनों में विशेष स्थान रखता है।

वास्तव में देखा जाय तो बगुला मात्र एक साधारण पक्षी ही नहीं है, बल्कि बगुला समुदाय (Heron Family) के कई पक्षियों के लिए प्रयुक्त सामान्य नाम है। इस समुदाय या परिवार में बगुले (Herons), एग्रेट (Egrets) और बिटर्न (Bitterns) भी शामिल हैं। भारत में पाए जाने वाली इसकी प्रजाति में मुख्यतः सफेद रंग के बगुले सबसे अधिक दिखाई देते हैं, जिनमें प्रमुख हैं — Great Egret (महाबगुला), Intermediate Egret (मध्यम बगुला), Little Egret (छोटा बगुला) और प्रमुख है Indian Pond Heron (तालाब बगुला)

वैज्ञानिक दृष्टि से वर्गीकरण –
दुनिया भर में बगुलों (Herons) की लगभग 60 से 64 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। बगुलों की इतनी विविधता होने का मुख्य कारण इनका अलग-अलग क्षेत्रों और जलवायु के अनुसार खुद को ढालना है। इसके अतिरिक्त इन्हें मुख्य रूप से तीन उप-परिवारों में बांटा गया है, जैसे की – असली बगुले (Ardeinae) – जैसे ग्रेट ब्लू हेरॉन और ग्रे हेरॉन।
– मवेशी बगुले (Egret) – सफेद रंग के बगुले जो अक्सर खेतों में मवेशियों के साथ दिखते हैं।
– बिटरन (Botaurinae) – ये दलदली इलाकों में छिपने वाले थोड़े छोटे और भूरे रंग के होते हैं।
इनमें से ग्रे हेरॉन (Grey Heron) और मवेशी बगुला (Cattle Egret) भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में सबसे आम हैं।

heron birds facts 2

बगुले की शारीरिक बनावट और पहचान –
बगुले की पहचान मुख्य्तः उसकी लंबी गर्दन, नुकीली चोंच और लंबे पैरों से होती है। इसकी सामान्य विशेषताओं में लंबी गर्दन, भाले जैसी तीखी चोंच, लंबे पैर, उड़ते समय गर्दन को अंग्रेजी के “S” आकार में मोड़ लेना, सफेद या भूरे रंग की प्रजातियाँ और अत्यंत तीक्ष्ण दृष्टि आदि।

बगुले के प्राकृतिक आवास –
मुख्य्तः बगुले सबसे अधिक जलस्रोतों के आसपास ही रहना पसंद करते हैं, इसलिए इनके सामान्य आवासों में बड़े या मध्यम आकर के तालाब, झील, नदियाँ, दलदली क्षेत्र, धान के खेत, मैंग्रोव वन यानी जो तटीय या ज्वारीय क्षेत्र होते हैं और जहां उगने वाले खारे पानी के पेड़-पौधे होते देखे जाते हैं, इसके अलावा समुद्री तटीय क्षेत्र, बाढ़ के मैदान और जहाँ का पानी उथला होता है वहाँ बगुले अधिक दिखाई देते हैं। बगुले की उपस्थिति बताती है कि वहाँ के क्षेत्रों में पर्याप्त जल और जलीय जीव उपलब्ध हैं। और वहाँ यह मछलियों, मेंढकों और कीटों की संख्या को संतुलित रखने में भी सहायता करता है।

बगुले का प्रजननकाल – 
बगुले (Herons) मुख्य रूप से मानसून या वसंत ऋतु में प्रजनन करते हैं और एक बार में मादाबगुला आमतौर पर हल्के नीले, सफेद या जैतून के रंग के 3 से 5 अंडे देती है। जिन्हें नर और मादा दोनों मिलकर लगभग 18 से 24 दिनों तक सेते हैं। बगुलों के प्रजनन चक्र और उनके व्यवहार का मौसम (Breeding Season) अधिकांशतः मानसून के आगमन या वसंत (फरवरी से सितंबर) के दौरान का होता है। घोंसला बनाने के लिए मुखयतः नर बगुले को ही आगे आना होता है और इसके लिए वो सूखी टहनियां और सामग्री इकट्ठा करता है। जबकि मादा बगुला उन टहनियों से घोंसला तैयार करती है। ये अपने घोसके अधिकतर पानी के किनारों, दलदली क्षेत्रों या द्वीपों पर स्थित ऊंचे पेड़ों पर बड़े और सपाट घोंसले बनाते हैं। सुरक्षा की दृष्टि से अक्सर कई बगुले एक साथ मिलकर झुंड में कॉलोनियां (Heronry) बनाते हैं। मादा को आकर्षित करने के लिए नर पक्षी अपनी चोंच आसमान की तरफ करके विशेष मुद्रा के माध्यम से आकर्षित करता है। बगुले की एक खासियत है की ये घोंसले के निर्माण और प्रेमालाप के बाद ये पक्षी जीवनभर के लिए एक-दूसरे के प्रति वफादार (Monogamous) रहते हैं। इसके अलावा अंडों से चूजों के निकलने के बाद माता-पिता दोनों उन्हें छोटी मछलियाँ और कीड़े आदि जो वे पचाकर वापस उगलते हैं वैसा खाना खिलाते हैं। इनके चूजे लगभग एक महीने में उड़ना सीख जाते हैं।

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बगुले का भोजन –
बगुला सबसे अधिक जलस्रोतों के आसपास इसीलिए रहना पसंद करता है क्योंकि यह पूर्णतः मांसाहारी पक्षी है। इसके भोजन में मुख्य्तः छोटी मछलियाँ, मेंढक, केकड़े, झींगे, घोंघे, कीट-पतंगे, छिपकलियाँ और छोटे साँप इत्यादि।

बगुले की शिकार करने की कला –
सभी जानते हैं की बगुला अपने धैर्य के लिए प्रसिद्ध है। क्योंकि अपने शिकार को पाने के लिए यह कई मिनटों तक बिल्कुल एक जैसी स्थिति में और वो भी एक ही टांग पर स्थिर खड़ा रह सकता है और जैसे ही कोई मछली या अन्य कोई शिकार पास आता है, यह अपनी तीखी चोंच से पलभर में उसे पकड़ लेता है। यही कारण है की यह याने की बगुला प्रकृति का सबसे धैर्यवान शिकारी माना जाता है। इसके एक टांग पर खड़े होने के पीछे का रहस्य यह है की इससे इनके शरीर की ऊर्जा बचती है और यह शिकार को पकड़ने के लिए पूरी तरह स्थिर रह पाते हैं।

भारतीय बगुला –
भारत के लगभग सभी राज्यों में बगुला बहुतायत में पाया जाता है, इसलिए भारत यह भारत के सबसे सामान्य जलपक्षियों में से एक है। समयतः तो बगुला घने वनों और मानव बस्तियों से दूर ही रहना पसंद करता है लेकिन गाँवों के तालाब, खेतों के किनारे और शहरों की झीलों में इन्हें अक्सर देखा जा सकता है। कभी-कभी महानगरों के आसपास भी देखने को मिल जाता है।

कई हफ्तों तक लगातार हवा में उड़ते हुए रह सकता है “ग्रेट फ्रिगेट”

बगुले सबसे अधिक कहाँ पाया जाता है –
आम तौर पर तो भारत में बगुला लगभग सभी राज्यों, झीलों, तालाबों और गांवों के आसपास पाए जाते हैं। लेकिन फिर भी आप इसमें से अत्यंत दुर्लभ और लुप्तप्राय ‘सफेद पेट वाले बगुले’ (White-bellied Heron) की प्रजाति को देखा चाहते हैं तो यह मुख्य रूप से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों, विशेषकर अरुणाचल प्रदेश के नामदफा राष्ट्रीय उद्यान और असम के कुछ हिस्सों में ही पाया जाता है। इसके अलावा बगुले की सबसे अधिक आबादी भारत के कुछ प्रमुख पक्षी अभयारण्यों में देखी जाती है जो इस प्रकार से हैं — केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, चिल्का झील, सुल्तानपुर राष्ट्रीय उद्यान, नल सरोवर पक्षी अभयारण्य, वेदांथंगल पक्षी अभयारण्य और रंगनाथिटु पक्षी अभयारण्य आदि।

बगुले का शिकार –
ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में यूरोप और अमेरिका में अधिकतर महिलाओं के द्वारा पहनी जाने वाली टोपियों को सजाने के लिए सफेद बगुलों के सुंदर पंखों की अत्यधिक माँग हो रही थी। और क्योंकि भारत में उन दिनों अंग्रेज़ों का ही शासन था इसलिए यहां लाखों बगुलों का शिकार कर उनके पंखों का निर्यात होने लाग था। लेकिन बाद में कुछ भारतीयों द्वारा उनके संरक्षण के लिए किये गए आंदोलनों और वन्यजीव कानूनों के कारण इनकी संख्या में फिर से सुधार हुआ।

भारतीय पौराणिक एवं सांस्कृतिक संदर्भ –
भले ही भारतीय पौराणिक एवं सांस्कृतिक संदर्भ में बगुले का नाम किसी प्रमुख धार्मिक ग्रन्थ में किसी विशिष्ट देववाहन के रूप में नहीं मिलता, परंतु भारतीय साहित्य, नीति-कथाओं और लोकजीवन में इसका उल्लेख बार-बार हुआ है। दरअसल बगुला एक परभक्षी जीव है इसलिए इसका उल्लेख किसी भी पौराणिक ग्रन्थ में किसी विशिष्ट देववाहन के रूप में नहीं है, लेकिन उदाहरों के स्वरुप अवश्य मिलता है, जैसे की “बगुला भगत”। दरअसल, बगुला भगत भारतीय लोकभाषा का प्रसिद्ध मुहावरा है जो मुख्यतः उस व्यक्ति के लिए प्रयोग में लाया जाता है जो बाहर से तो अत्यंत शांत, धार्मिक या विनम्र दिखाई देता है लेकिन, भीतर से छलपूर्ण हो। देखा जाय तो यह पक्षी के वास्तविक स्वभाव का नहीं, बल्कि उसके लंबे समय तक स्थिर खड़े रहने के दृश्य से प्रेरित एक रूपक है।

नीति साहित्य में बगुले का उल्लेख –
पंचतंत्र (Panchatantra) जैसी प्रमुख और अन्य नीति-कथाओं में बगुले का उपयोग कभी एक धैर्यवान तो कभी चालाक पात्र के रूप में किया गया है। असल में यहां इन कथाओं का उद्देश्य नैतिक शिक्षा देना है, न कि पक्षी के वास्तविक व्यवहार का वर्णन। इसी तरह योग और ध्यान की परंपरा में भी बगुले की स्थिरता और एकाग्रता को एक साधक के मन की एकाग्र अवस्था के प्रतीक के रूप में देखा गया है।

दुनिया की अन्य संस्कृतियों में बगुले का स्थान –
भारतीय संस्कृति में इस गुण को ‘ध्यानस्थ योगी’ (मौन और एकाग्रता) की उपमा दी जाती है। हालाँकि, हिंदी मुहावरे जैसे “बगुला भगत” का प्रयोग कपटी या ढोंगी व्यक्ति को दर्शाने के लिए भी किया जाता है।

प्राचीन मिस्र (Egyptian) संस्कृति में बगुले को ‘बेनू’ (Bennu) नामक पक्षी से जोड़ा जाता था, जो पुनर्जन्म और सूर्य देवता का प्रतीक था। यह पक्षी अमरता का भी प्रतिनिधित्व करता था।

चीनी और जापानी संस्कृति और सभ्यताओं में सफेद बगुले को सौभाग्य, कुलीनता, लंबी आयु और शुद्धता का प्रतीक माना जाता है। जापानी कला में इसे अक्सर चीड़ के पेड़ के साथ चित्रित किया जाता है, जो दृढ़ता और शालीनता को दर्शाता है।

इसी तरह से अमेरिका की मूल आदिवासी (Native American) संस्कृति की जनजातियों में बगुले को ज्ञान, धैर्य और आत्म-चिंतन का प्रतीक माना जाता है और इसे एक ऐसे पक्षी के रूप में देखा जाता है जो पृथ्वी और जल के बीच संतुलन बनाता है।

बगुले की संरक्षण स्थिति और खतरा –
प्रकृति संरक्षण के लिए जाना जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय संघ के वैज्ञानिकों ने बगुले को इसकी आदतों और पहचान के आधार पर अधिकांशतः कुछ अलग-अलग प्रजातियों में स्थान दिया है, जैसे ग्रेट इग्रेट (Great Egret) और लिटिल इग्रेट (Little Egret) आदि। इसके अलावा बगुले की संख्या या आबादी को देखते हुए वैज्ञानिकों ने इसको फिलहाल खतरे से बाहर यानी कम से कम चिंता का विषय (Least Concern) की श्रेणी में रखा गया है। बावजूद इसके बगुले पर आधुनिक विनाश के कारण जैसे – जल और वायु प्रदूषण, कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग और जलवायु परिवर्तन जैसे बड़े खतरे बने हुए हैं।

हालाँकि बगुलों के लिए भारत में केंद्र या राज्यों की किसी भी सरकारों के पास कोई अलग से विशेष योजनाएं तो नहीं है, लेकिन फिर भी इन्हें पर्यावरण मंत्रालय की वन्यजीव संरक्षण योजना और आर्द्रभूमि (Wetland) संरक्षण योजनाओं के तहत प्राकृतिक आवास सुरक्षा प्राप्त है। इन योजनाओं के तहत सरकार द्वारा आर्द्रभूमि का संरक्षण यानी ‘अमृत धरोहर’ (Amrit Dharohar Yojana) योजना का उद्देश्य महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियों (जहाँ बगुले मुख्य रूप से रहते हैं और भोजन करते हैं) का संरक्षण करना है, ताकि बगुलों सहित अन्य सभी प्रकार की पक्षी प्रजातियों और उनके आवासों की रक्षा हो सके। और वन्यजीव पर्यावास विकास की और से इस प्रकार के ‘वन्यजीव आवासों के एकीकृत विकास’ के तहत राज्य सरकारों को फंड भी दिया जाता है, जिससे विभिन्न जल-पक्षियों और उनके इकोसिस्टम की सुरक्षा सुनिश्चित होती है।

बगुले से जुड़े कुछ प्रमुख रोचक तथ्य –
– जब बगुला उड़ता है तो उसकी गर्दन ‘S’ के आकार में पीछे की ओर मुड़ी होती है और उसका सिर शरीर से सटा होता है, जबकि  इसके विपरीत सारस (Cranes) उड़ते समय अपनी गर्दन को बिल्कुल सीधा रखते हैं।

– बगुला उथले पानी में घंटों एकदम स्थिर खड़े रह सकता है और जब कोई मछली या जलीय जीव इनकी पहुंच में आता है तो ये बिजली की गति से अपनी लंबी चोंच से वार करते हैं।

– हालांकि बगुला वजन में बहुत भारी नहीं दिखता, लेकिन ये शानदार तरीके से उड़ सकते हैं। एक धूसर या भूरे रंग का बगुला (Grey Heron) लगभग 48 किलोमीटर प्रति घंटे (लगभग 30 मील प्रति घंटा) की रफ्तार से उड़ सकता है।

– बगुले मुख्यतः मछलियां, मेंढक, कीड़े-मकौड़े, और केकड़े खाते हैं, लेकिन अवसर मिलने पर छोटे स्तनधारियों और अन्य छोटे पक्षियों का शिकार करने से भी नहीं चूकते।

– अधिकांश बगुले जमीन या एकांत में घोंसला बनाते हैं, लेकिन पेड़ों पर विशाल झुंड बनाकर प्रजनन करते हैं। इन घोंसलों के समूह को वैज्ञानिक भाषा में ‘हेरॉनरीज़’ (Heronries) कहा जाता है।

– कुछ बगुलों (जैसे ग्रेट ब्लू हेरॉन) के सीने पर विशेष पंख होते हैं जो लगातार बढ़ते रहते हैं। इन पंखों को ये बगुले कंघी की तरह इस्तेमाल करके अपने शरीर से मछली की चिकनाई और तेल साफ करते हैं।

– अंटार्कटिका को छोड़कर बगुले प्रायः दुनिया के सभी महाद्वीपों के तटीय और मीठे पानी वाले इलाकों में पाए जाते हैं।

 

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देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
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