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तालिबान की लूट से भीख का कटोरा भरेगा पाकिस्तान | taliban vs pakistan

admin 19 August 2021
Afghanistan and Pakistan border
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पाकिस्तान के पास आतंकी तैयार करने के अलावा कमाई का कोई और जरिया नहीं है।
इस समय तालिबान का सबसे बड़ा शत्रु ईरान है क्योंकि तालिबान शिया समुदाय से घृणा करता है।

लुटेरा तालिबान पाकिस्तान के लिए कमाऊ पूत बनकर उभरा है। अफगान धरती पर तालिबान न केवल पाकिस्तानी कट्टरपंथियों और आतंकियों को पालेगा पोसेगा बल्कि उसकी आतंकी सोच को भी आगे बढ़ाएगा। अफगानिस्तान की धरती पाकिस्तानी मंसूबों और आतंकवाद के लिए वरदान साबित होगी। अब पाकिस्तान आराम से अफगान धरती पर तालिबान के संरक्षण में आतंकी कैंप चला सकेगा, जहां से ट्रेंड आतंकी पूरी दुनिया में कोहराम मचा देंगे और पूरी सोच के पीछे चीन अपनी पूरी ताकत और टेक्नोलॉजी झौंक देगा, क्योंकि कभी अफीम और पोस्तदाने की खेती इसी अफगानिस्तान की धरती पर फलती फूलती थी, जो कभी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की आय का बड़ा जरिया हुआ करती थी।

पाकिस्तानी सोच और कट्टरपंथी विचारधारा पर गहरी पकड़ रखने वाले विचारक तारिक फतेह की मानें तो यह कोई रातों रात नहीं हुआ है। इस पूरे प्रकरण पर पिछले दस सालों से काम चल रहा था। पाकिस्तानी सरजमीं पर खुद अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियां और अधिकारी तालिबानी आतंकवादियों को ट्रेनिंग दे रहे थे। इसके एवज में अमेरिकन आर्मी की ट्रेनिंग एजेंसियों को एक मोटी रकम इस्लामिक देशों द्वारा पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के जरिए दी जा रही थी।

सूत्रों की मानें तो तालिबानी आतंकियों की ट्रेनिंग पूरी होते ही अमेरिका ने अफगानिस्तान की धरती से अपनी सैन्य शक्ति को वापस बुला लिया। थ्योरी यह भी है कि पाकिस्तान ने अमेरिका की मदद से जिस तरह से 20 साल पहले अफगानिस्तान की इसी धरती से सोवियत यूनियन को भगाने के लिए तालिबान को खड़ा किया था, उसी तरह इस बार सोवियत यूनियन ने भी अमेरिका को उसी के हथियार से उसी अफगान धरती पर गहरी मात दी है। समय बदला है, दुश्मनी वही है।

दरअसल अमेरिका 20 साल पहले जिस तालिबान को मारने के लिए अफगान धरती पर उतरा था, वह तालिबान कभी पूरी तरह से मरा ही नहीं था। तालिबानी लड़ाके रातों-रात नार्थ पाकिस्तान में जाकर आम नागरिकों की तरह रहने लग गए थे। पाकिस्तान के इस हिस्से में पठान समुदाय की बड़ी जनसख्या रहती है। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई ने उन्हें पूरा संरक्षण दिया और समय आने का इंतजार करने को कहा। इस बीच पाकिस्तान इस्लामिक देशों से तालिबान लड़ाकों को पालने और ट्रेनिंग देने के नाम पर मोटी रकम वसूलता रहा।

ज्ञात हो पाकिस्तान पूरी तरह से बर्बाद देश है और उसके पास आतंकी तैयार करने के अलावा कमाई का कोई और जरिया नहीं है। क्योंकि पाकिस्तान एक देश का दर्जा प्राप्त किया हुआ संगठनात्मक ढांचा है, इसलिए उस पर कोई अन्य देश आतंकवाद के नाम पर कम से अटैक तो नहीं कर सकता है, इसी कवच का फायदा उठाकर पाकिस्तान अपने यहां आतंकियों की फौज तैयार करके आतंकी संगठनों को सप्लाई करने का काम करता रहा है, जिसकी एवज में उसे कई इस्लामिक देशों से मोटी रकम प्राप्त होती है, जिससे यह देश चल रहा है। दूसरा यह देश अपने आका चीन को भी इसी तरह से खुश किए हुए है। लेकिन इसके बावजूद तालिबान का भविष्य बेहतर दिखाई नहीं पड़ रहा है, ध्यान रखना चाहिए कि तालिबान का सबसे बड़ा शत्रु ईरान है क्योंकि तालिबान शिया समुदाय से घृणा करता है। कमोबेस यही स्थिति तुर्कमेनिस्तान, उज़्बेकिस्तान एवं तजीकिस्तान की है जहाँ भारी तादात में शिया समुदाय अफगान सीमा के नजदीक रहता है।

रातों रात कैसे हुआ तख्ता पलट-
अफगानिस्तान में रातों रात तख्तापलट के पीछे कई सवाल हैं, जिनके जवाब बेहद चौंकाने वाले हैं। आखिर तालिबान के अफगानिस्तान में घुसते ही उस देश की करीब तीन लाख सैनिकों की सेना कहां भाग गई। खुफिया सूत्र बताते हैं कि तालिबान लड़ाकों के पास 90 हजार पुराने हथियार थे, अफगान सेना 3 लाख अत्याधुनिक हथियार लेकर मजबूत स्थिति में थी लेकिन तालिबान के आते ही उनकी 3 लाख की सेना अचानक कहां गायब हो गई। तालिबान ने बिना लड़ाई के ही मात्र एक माह में पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा कैसे कर लिया।

सूत्रों की मानें तो 2002 में अमेरिका ने अफगानिस्तान से तालिबानी सरकार को उखाड़ कर नई सरकार स्थापित की थी तब सारे तालिबानी लड़ाके अमेरिकन अधिकारियों और खुफिया एजेंसियों की आंखों में धूल झौंककर अफगानिस्तान की नई सेना में भर्ती हो गए थे। जैसे ही अमेरिका ने अपनी सेना को अफगानिस्तान से बाहर निकाला अफगानिस्तान की नई तीन लाख की सेना तालिबान के साथ खड़ी हो गई।

याद कीजिए यही सद्दाम हुसैन के समय इराक में भी हुआ था अमेरिका के एक आक्रमण के साथ ही वहां की सारी सेना गायब हो गई अमेरिका ने वहां एक कठपुतली सरकार स्थापित की लेकिन बाद में वही सेना आईएसआईएस के रूप में सामने खड़ी हो गई थी। खैर जो भी हो आने वाले 20 सालों के लिए विश्व समुदाय को चौकन्ना रहने की जरूरत है।

– कुमार गजेंद्र

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