Sunday, September 13, 2026
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गणेश तत्व का महत्व | What is Ganesha?

स्वामी श्री शरणानन्द जी महाराज | प्रत्येक मानव मानव होने के नाते जन्मजात साधक है। साधक सभी के लिये उपयोगी होता है। कारण कि सत्संग ही साधक का स्वधर्म है। स्वधर्मनिष्ठ होने से ही साधक धर्मात्मा, जीवन्मुक्त तथा भक्त हो सकता है। इस दृष्टि से सत्संग ही अग्रगण्य देव गणेश की पूजा है। सत्य को स्वीकार करना ‘सत्संग’ है। बुराईरहित होकर साधक धर्मात्मा होता है और अकिंचन, अचाह, अप्रयत्नपूर्वक साधक जीवन्मुक्त होता है तथा आत्मीयता से जाग्रत् अखण्ड-स्मृति एवं अगाधप्रियता से भक्त होता है। यह सत्संग अर्थात् गणेश-तत्त्व का महत्त्व है।

सच्चर्चा, सच्चिन्तन और सत्कार्य के द्वारा सत्संग की माँग जाग्रत् होती है। सत्संग मानव का स्वधर्म है। चर्चा, चिन्तन तथा कार्य के लिये पराश्रय और परिश्रम अपेक्षित है, किंतु सत्संग के लिये पराश्रय तथा परिश्रम की अपेक्षा नहीं है। अतः सत्संग स्वाधीनतापूर्वक साध्य है। निज ज्ञान के प्रकाश में यह स्पष्ट विदित होता है कि शरीर और संसार से मानव की जातीय भिन्नता है। जिससे जातीय भिन्नता है, उससे नित्य-योग तथा आत्मीयता सम्भव नहीं है। इस दृष्टि से केवल जो अनुत्पन्न हुआ अविनाशी, स्वाधीन, रसरूप, चिन्मय, अनादि, अनन्त तत्त्व है, उससे मानव की जातीय एकता है और वही मानव का अपना है। अपने में अपने की अखण्ड स्मृति तथा अगाधप्रियता स्वतः होती है। स्मृति के जाग्रत् होते ही इन्द्रियाँ अविषय, मन निर्विकल्प तथा बुद्धि सम हो जाती है और फिर स्मृति, योग, बोध तथा प्रेम से अभिन्न कर देती है। इस दृष्टि से सत्संग ही एकमात्र सिद्धिदायक है। जो सिद्धिदायक है, वही गणेश-तत्त्व है।

गणेश-तत्त्व को अपनाये बिना अन्य किसी भी प्रकार से साध्यतत्त्व की प्राप्ति सम्भव नहीं है। कारण कि सत्संग से ही असत्का त्याग और इस दृष्टि से साध्य की माँग ही साध्य की प्राप्ति में हेतु है। साध्य उसे नहीं कहते, जो सदैव, सर्वत्र, सभी में न हो और साधक भी उसे नहीं कहते, जिसमें साध्य की माँग न हो। इस सत्य को स्वीकार करने पर साधक स्वतः साधन-तत्त्व से अभिन्न हो जाता है, जो साधक का जीवन तथा साध्य की महिमा है। साध्य के अस्तित्व, महत्त्व तथा अपनत्व को स्वीकार करना ‘सत्संग’ है। साधक के लिये साध्य से भिन्न किसी अन्य वस्तु का अस्तित्व ही नहीं है। इस वास्तविकता को अपना लेने पर साधक अकिंचन, अचाह तथा अप्रयत्नपूर्वक साधन तत्त्व से अभिन्न हो जाता है, यह आस्थावान् साधकों का अनुभव है। माँग और काम का पुंज ही केवल सीमित अहम् – भाव है। स्वभावजनित माँग के सबल होने पर प्रमाद से उत्पन्न हुए काम का नाश हो जाता है और फिर माँग स्वतः: पूरी हो जाती है, जिसके होते ही सीमित अहम् – भाव का अन्त हो जाता है और फिर केवल साधन-तत्त्व और साध्य का नित्य-विहार ही शेष रहता है।

जिस प्रकार साध्य अखण्ड, असीम तथा अनन्त है, उसी प्रकार साधन-तत्त्व भी असीम तथा अनन्त है। साधक की अभिन्नता साधन-तत्त्व से होती है। साधन- तत्त्व से ही साध्य को नितनव-रस मिलता है, जो क्षति, पूर्ति और निवृत्ति से रहित होने से असीम है। साधक में ही असीम साधन-तत्त्व और अनन्त साध्य-तत्त्व विद्यमान हैं । परंतु यह रहस्य एकमात्र सत्संग से ही स्पष्ट होता है। इस दृष्टि से गणेश-तत्त्व के द्वारा ही साधक प्रेम और प्रेमास्पद से अभिन्न होता है। इसी रहस्य को बताने के लिये गौरी-शंकर, सीता-राम और राधा – कृष्ण के विहार की चर्चा है। गणेश – तत्त्व को गौरी और शिव का आत्मज कहा है। पूर्ण-तत्त्व से ही साधन- तत्त्व की अभिव्यक्ति होती है। साधन-तत्त्व और साध्य में असत्के त्याग से ही अकर्तव्य, असाधन और आसक्ति का नाश होता है और फिर स्वतः साधक में साधन-तत्त्व की अभिव्यक्ति होती है। साधन-तत्त्व साधक को साध्य से अभिन्न कर देता है। यह जीवन का सत्य है। अकर्तव्य का अन्त होते ही कर्तव्यपरायणता स्वतः आती है। कर्तव्यपरायणता से विद्यमान राग की निवृत्ति होती है तथा सुन्दर समाज का निर्माण होता है। इतना ही नहीं, कर्तव्यनिष्ठ साधक के जीवन में अधिकार-लालसा की गन्ध भी नहीं रहती । कारण कि वह कर्तव्यपालन में ही अपना अधिकार मानता है। अधिकार – लोलुपता का अन्त होते ही साधक क्रोधरहित हो जाता है। राग और क्रोध के न रहने पर स्वतः योग तथा स्मृति जाग्रत् होती है। योग – बोध से स्मृति प्रेम से अभिन्न कर देती है। समस्त साधनों की परिणति प्रेम-तत्त्व में होती है । प्रेम- तत्त्व प्रेमास्पद का स्वभाव और प्रेमी का जीवन है और प्रेम-तत्त्व की प्राप्ति में ही जीवन की पूर्णता है। यही साधक के विकास की चरम सीमा है।

साधक के पुरुषार्थ का आरम्भ और अन्त सत्संग में ही निहित है। सत्संग शरीरधर्म नहीं है, अपितु आत्मधर्म है। स्वधर्म को अपनाने में सभी साधक सर्वदा स्वतन्त्र हैं। स्वधर्मनिष्ठ हुए बिना सर्वतोमुखी विकास सम्भव नहीं है। स्वधर्मनिष्ठ होने में किसी प्रकार की पराधीनता तथा असमर्थता नहीं है। ‘स्व’को बोध स्वतः प्राप्त है कि समस्त दृश्य एक ही इकाई है और जिसकी माँग है, वह भी अद्वितीय ही है और जिसमें माँग है, वह ‘मैं’ – तत्त्व भी एक ही है। अब विचार किया जाय कि माँगका अनुभव ‘स्व’ को यह स्वतः होता है और जब माँग सबल तथा स्थायी हो जाती है, तब काम का स्वतः नाश हो जाता है। काम का नाश होते ही माँग अपने-आप पूरी हो जाती है। यह जीवन का सत्य है, स्वरूप से अभिन्नता है। उस अभिन्नता का स्पष्टीकरण सत्संग से ही अर्थात् गणेश-तत्त्व से ही होता है, जो कि जीवनका सत्य है।

गणेश – तत्त्व अनुत्पन्न हुआ अलौकिक तत्त्व है। जिस प्रकार साधक को शरीर और संसार की उत्पत्ति, परिवर्तन और अदर्शन का बोध है, उसी प्रकार उसे न तो अपनी उत्पत्ति का बोध है और न परिवर्तन तथा अदर्शन का। इस दृष्टि से ‘स्व’ – तत्त्व ही गणेश – तत्त्व है। ‘स्व’ में ही ‘ है ‘ की माँग होती है। माँग ही ‘है’ की प्राप्ति में हेतु है। ‘स्व’ ‘ है ‘ में और ‘है’ ‘स्व’ में ओत-प्रोत है। जब ‘स्व’ ‘है’ के अस्तित्व को स्वीकार करता है, तब उसकी साधक – संज्ञा होती है। साधक का स्वधर्म ‘ है ‘के महत्त्व और अपनत्व को स्वीकार करना है। साधक जिसके महत्त्व को स्वीकार करता है, उसी में उसका नित्य वास रहता है और जिसके महत्त्व को स्वीकार करता है, उसी में अगाधप्रियता होती है। जो सदैव, सर्वत्र, सभी का अपना है, उसी को अपना मानना और अपने में ही स्वीकार करना साधक का स्वधर्म है, अर्थात् ‘सत्संग’ है। इस प्रकार प्रत्येक साधक अग्रगण्य देव गणेश की पूजा कर बड़ी सुगमतापूर्वक प्रेम तथा प्रेमास्पद से अभिन्न बन जाता है।  साभार – श्री गणेश अंक (गीता प्रेस)

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देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
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