अजय चौहान | सोच कर देखिए कि एक वो दौर था जब एक लाख लोगों की रैली महत्वपूर्ण हुआ कराती थी, लेकिन आज एक लाख फॉलोवर्स वाला digital creator भी उसी राजनीतिक व्यक्ति या पार्टी की तरह ही शक्ति बन कर उभरने लगा है। क्योंकि भारत में इन दिनों एक ऐसी पीढ़ी सामाजिक और राजनीतिक शक्ति के रूप में उभर रही है, जिसने न तो पुराने राजनीतिक संघर्षों को उसी रूप में देखा है और न ही सूचना प्राप्त करने के लिए केवल अखबार, टेलीविजन या पारंपरिक राजनीतिक नेताओं पर निर्भर रहना सीखा है। यह पीढ़ी Generation Z यानी Gen-Z कहलाती है। आश्चर्य तो इस बात का है कि किसी भी दल के नेता और नौकरशाह ने नहीं सोचा था कि इन Gen-Z का एक बड़ा भाग इतना ज्यादा अपडेट और हाजिरजवाबी में इतना आगे भी हो सकता है कि सभी को हैरान कर देगा।
दरअसल, आज भी भारतीय Gen-Z को केवल “मोबाइल में रहने वाली युवा पीढ़ी” समझना ही राजनीतिज्ञों के लिए एक गंभीर भूल साबित हो रही है। उपलब्ध शोधों से पता चलता है कि यह पीढ़ी पैसा तो चाहती है, लेकिन करियर भी चाहती है। लेकिन ऐसा पैसा भी नहीं चाहती जो किसी भी कीमत पर मिल जाय, बल्कि स्वतंत्रता के रूप में चाहती है और साथ में सामाजिक तौर पर भी पूरी तरह कटना नहीं चाहती; और राजनीति और नेताओं से दूरी भी रखना चाहती है।
भारतीय Gen-Z का बदलता हुआ स्वभाव आधुनिक राजनीति और मीडिया के लिए इसलिए बहुत बड़ी चुनौती पैदा कर रहा है, क्योंकि ये राजनीति से दूरी रखना चाहते हैं और आवश्यकता पड़ने पर अपने जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर अचानक मुखर होकर विरोध भी कर सकती है। और इनका यही स्वभाव आज के नेताओं के लिए ही नहीं नौकरशाहों के लिए भी समझाना नामुमकिन होता जा रहा है। क्योंकि भारतीय राजनेताओं और राजनीति ने अब तक अपने आसपास केवल उन्हीं लोगों को देखा था जो विरोध करना ही नहीं जानते थे और जी हुजूरी और ग़ुलामी करते आये हैं। ऐसे में इस Gen-Z ने ग़ुलामी की उन जंजीरों को तोड़कर अपने लिए स्वयं ही मार्ग बनाने का तरिका खोज लिया है।
वर्ष 2026 में युवाओं से जुड़े कुछ प्रमुख और हालिया आंदोलनों और उनके राजनीतिक प्रभाव ने इस प्रश्न को और भी महत्वपूर्ण बना दिया है कि क्या भारतीय राजनीति की पारंपरिक लुभावनी भाषा और राजनीतिक संचार की पुरानी शैली Gen-Z को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त है? हाल ही में हुए Gen-Z केंद्रित विरोध-प्रदर्शनों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिजिटल संचार रणनीति में Instagram, अधिक अनौपचारिक वीडियो, हास्य और लोकप्रिय संस्कृति के संदर्भों का इस्तेमाल भी इसी बदलते राजनीतिक वातावरण का उदाहरण है। जबकि इससे पहले तक ये सभी युवा शांत और स्थिर थे, एकाएक जैसे ही सरकार ने उनके भविष्य को आघात पहुंचाने के प्रयास किये Gen-Z ने ऐसा प्रतिउत्तर दिया की सरकार के हाथ-पाँव फूल गए।
Gen-Z की सबसे बड़ी विशेषता —
भारत की सरकार ने अब तक ये सोचा ही नहीं था कि जिस Gen-Z को हम “बेकार” समझ रहे हैं वही एक दिन “भागीदार” बन कर हमको आइना दिखने लगेंगे और अपना अधिकार इस तरह से छीन लेंगे। पिछली पीढ़ियों की Gen-Z के लिए राजनेता और मीडिया एक “हव्वा” हुआ करता था, लेकिन इस वाली Gen-Z ने उन्हीं राजनेता और मीडिया को “कव्व्वा” बनाकर उड़ा दिया।
पहले जहां राजनेता और मीडिया मिलकर वोटर्स को मुर्ख बनाया करते थे, वहीं अब Gen-Z के लिए उसी राजनेता और मीडिया का अर्थ गुंडागर्दी का लाइसेंस और दलाली का अड्डा हो गया है। क्योंकि Gen-Z समझ चुकी है कि अब रोजगार मांगना भी राजनीति कहलाता है। शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता की बात करना भी राजनीति कहलाता है। महँगाई की बात करना भी राजनीति करना हो गया है। इंटरनेट और डिजिटल स्वतंत्रता की मांग करना भी राजनीति करना कहलाने लगा है। पर्यावरण की सुरक्षा और शुद्ध भोजन की बात करना भी अपराध की श्रेणी में माना जा रहा है। लैंगिक समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी महापाप कहलाने लगा है। सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार और सरकारी जवाबदेही की बात करना तो राष्ट्रद्रोह हो चुका है। और तो और अब तो हर एक नेता की सोशल मीडिया भाषा और वायदों को याद दिलाना भी बड़ा अपराध और आतंकवाद के सामान होता जा रहा है।
भारत के सन्दर्भ में 2025 के एक अध्ययन में करीब 600 Gen-Z युवाओं—18 से 24 वर्ष की आयु पर एक अध्ययन किया गया था, जिसके अनुसार, Instagram पर राजनीतिक भागीदारी को चार स्तरों में देखा गया। जिसके अनुसार, Instagram पर केवल राजनीति से जुडी सामग्री को देखना, नेताओं को फॉलो करना, अपनी राजनीतिक राय व्यक्त करना और अधिक संगठित राजनीतिक लोगों के साथ भागीदारी।
लेकिन इस अध्ययन ने यह भी संकेत दिया कि राजनीतिक भागीदारी का माध्यम तेजी से डिजिटल होता जा रहा है। हालांकि ये अध्ययन दक्षिण भारतीय शहरों तक ही सीमित था, इसलिए इसे पूरे भारत की Gen-Z का प्रतिनिधि सर्वेक्षण नहीं माना जाना चाहिए। लेकिन, यहां ये भी नहीं भूलना चाहिए की वर्तमान दौर के Gen-Z केवल उत्तर और दक्षिण भारत तक ही सिमटे हुए नहीं हैं, बल्कि दुनिया के हर एक कोने से हर घंटे और हर मिनट अपडेट होते आ रहे हैं। और भारत सरकार ने बस यहीं एक बड़ी भूल कर दी और अखबारों और टेलीविज़न जैसे आउटडेटिड संचार माध्यमों तक ही सिमट कर रह गई।
वर्तमान Gen-Z का यह परिवर्तन सभी के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अब राजनीतिक संदेश का नियंत्रण केवल राजनीतिक दलों या बड़े मीडिया संस्थानों के हाथ में नहीं है। बल्कि उनसे भी पहले Gen-Z के पास पहुँच जाता है। यही कारण है की एक Gen-Z युवा किसी नेता का भाषण देखने और सुनने के बजाय उसी भाषण की 30 सेकंड की क्लिप और उसका meme, किसी influencer की टिप्पणी और फिर उसके विरोध में बने वीडियो—सब कुछ कुछ मिनटों में देख कर खुद को अपडेट कर लेता है। जबकि उधर सरकार ये सोचती है की जब Gen-Z शाम को अपने घर में बैठ कर TV खोलेगा तब अपडेट होगा या फिर अगली सुबह अखबार आएगा तो उसमें वो अपडेट होगा।
Gen-Z की भाषा अलग क्यों है? –
यहां ये तो अच्छी बात है कि भारतीय Gen-Z की भाषा मिश्रित है, इसलिए वे एक ही वाक्य में हिंदी, अंग्रेजी, इंटरनेट, गाली, मजाक, संस्कृति और स्थानीय भाषाओं का प्रयोग आसानी से कर सकती है और सभी को समझा भी सकती है। एक उदाहरण के लिए देखें तो – “भाई, ये policy ground पर काम कर रही है या सिर्फ PR है?” यानी यहां केवल ये एक भाषाई प्रयोग नहीं है। इसके पीछे एक मानसिकता भी छिपी है।
Gen-Z पीढ़ी अक्सर ये नहीं पूछती कि — “नेता कौन है?” बल्कि ये पूछती है कि — “काम क्या हुआ?” या फिर “काम क्यों नहीं हुआ?” दरअसल पहले राजनीति में व्यक्ति की छवि बहुत महत्वपूर्ण थी। लेकिन अब तो व्यक्ति की छवि के साथ-साथ डेटा, वीडियो, meme, independent creator और comment section भी राजनीतिक धारणा को बनाने लगे हैं। इसलिए तो किसी भी नेता का एक भाषण टेलीविज़न पर बहुत सफल हो सकता है, लेकिन जब उसी भाषण का कोई छोटा सा अंश भी social media आ जाता है तो उसकी सम्पूर्ण छवि पूरी तरह अलग-थलग होकर उसको बर्बाद भी कर देती है।
Gen-Z को “निष्क्रिय” समझना भूल है –
Gen-Z के बारे में भारतीय नेताओं की एक विरोधाभासी धारणा है कि इनकी रुचि राजनीति में नहीं है। जबकि दूसरी ओर जब कोई बड़ा मुद्दा उनके रोजगार, शिक्षा, परीक्षा या भविष्य को प्रभावित करता है, तो यही युवा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर एकाएक अत्यंत सक्रिय होकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा देते हैं। लेकिन सरकारों ने इस उपस्थिति को बेकार समझने की गलती कर दी थी।
मनोविज्ञान कहता है की- “Gen-Z आवश्यक रूप से traditional politics में रुचि नहीं रखते, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि राजनीतिक मुद्दों से वे अनजान हैं। और बस यही अंतर है जिसको हमारे राजनेता समझ नहीं पा रहे हैं।” आज के नेता और राजनीतिक दल अब भी ठीक यही सोचते हैं कि एक युवा जो उनके राजनीतिक दल की सदस्यता लेता है और उनकी ग़ुलामी करता है बस वही आवाज़ उठाने का अधिकारी है और वो भी उनके विपक्षियों के खिलाफ। इसके अलावा वो युवा किसी भी दूसरी पार्टी की रैली में न जाए और खुद की पार्टी या नेता के खिलाफ भी आवाज़ न उठाये। किसी परीक्षा में हुई गड़बड़ी, बेरोजगारी, फीस-वृद्धि, इंटरनेट प्रतिबंध या भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर लाखों लोगों तक अपनी बात भी न पहुँचा सके।
जहां एक ओर पिछले तीन से चार सालों पहले तक वर्तमान केंद्र सरकार ये सोच कर बैठी थी कि Gen-Z उनके साथ हैं, वहीं अब मामला इसके ठीक उलट होता दिख रहा है। क्योंकि Gen-Z को नेता या राजनीतिक दल की नहीं बल्कि अपना करियर और रोजगार के साथ सम्मान भी चाहती हैं। इस बात को समझना कोई बहुत बड़ा मनोविज्ञान या राकेट साइंस नहीं बल्कि साधारण सी बात थी। लेकिन मोदी सरकार ने Gen-Z को ज्यों ही ठोकर पर बैठाकर दूर फेंकने की कोशिश की ऐसा पलटवार मिला की आज भी वे उस वार का काट नहीं खोज पा रहे हैं। यही कारण है कि आने वाले समय में सभी राजनीतिक दलों के लिए केवल “युवा मतदाता” की संख्या जानना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उनके मूड और आवश्यकताओं को समझना भी जरुरी होगा। सरकारों के साथ-साथ नौकरशाहों को भी सोचना होगा कि उनका युवा मतदाता सोचता कैसे है, कौन सी सूचना पर कैसा विश्वास करता है और किस क्षण राजनीतिक रूप से सक्रिय होता है और कौन सी भाषा में वह प्रतिकार कर सकता है।
Gen-Z को अक्सर “instant gratification generation” भी कहा जाता है, यानी इसका हिंदी अर्थ है कि एक ऐसी पीढ़ी जो “तात्कालिक संतुष्टि चाहने वाली पीढ़ी”। इसका दूसरा अर्थ ये भी है कि इस पीढ़ी के पास इंतज़ार करने की क्षमता नहीं है। जबकि आज 35-40 की उम्र पार कर चुकी पीढ़ी सरकार की नीतियों के आगे मन को मार कर खुद से समझौता करने में और झुकने सक्षम है। क्योंकि रील्स देख कर बचपन नहीं बिताया। ये हाल केवल भारत के लिए ही नहीं बल्कि दुनिया के हर एक देश और समुदाय से जुडी Gen-Z का है। हालाँकि यहां भी मनोवैज्ञानिक तौर पर भारतीय Gen-Z से जुड़े आँकड़े इससे कहीं अधिक जटिल हैं। क्योंकि दिल्ली के जंतर-मंतर पर दुनिया ने जो देखा वो सभी के लिए हैरान करने वाला है।
क्या कहता है अध्ययन –
डेलॉयट (Deloitte) नाम से एक ग्लोबल कंपनी है जो दुनिया की टॉप चार सबसे बड़ी अकाउंटिंग फर्मों में से एक है और 150 से ज़्यादा देशों में अपना व्यवसाय कराती है, उसने जंतर-मंतर पर हुए इस Gen Z आंदोलन पर 806 भारतीय छात्रों से प्रश्न पूछकर एक अध्ययन किया। इस अध्ययन के आधार पर दावा किया गया है कि भारत के युवा ज़िम्मेदारी से पीछे नहीं हट रहे हैं, बल्कि पारंपरिक कॉर्पोरेट उम्मीदों के बजाय वर्क-लाइफ बैलेंस, फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस और मकसद को प्राथमिकता दे रहे हैं। उत्तर देने वाले सभी भारतीय Gen-Z ही थे और उन सभी ने यही कहा कि उन्होंने अपनी जीवन में आर्थिक परिस्थितियों के कारण कई बड़े फैसले टाले हैं। उन छात्रों में से 37 प्रतिशत ने घर खरीदने में असमर्थता और 29 प्रतिशत ने वित्तीय असमर्थता की समस्या बताई। जबकि 27 प्रतिशत Gen-Z ने बेरोजगारी पर प्रमुख चिंता जताई। इससे एक जो महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है वो ये कि Gen-Z केवल “आज के लिए जीने वाली पीढ़ी” नहीं है; बल्कि भविष्य को लेकर भी उतनी ही चिंतित है।
भारतीय मीडिया के लिए चुनौती कहाँ है? –
समस्या ये है कि भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा अभी भी केवल टेलीविज़न के प्राइम टाइम के भ्रमजाल में फंसा हुआ है और राजनेताओं और पार्टियों के इर्द-गिर्द ही घूमता रहता है। जबकि Gen-Z का सूचनातंत्र और काम करने का तरिका टेलीविज़न से एकदम अलग है। Gen-Z के पास आज YouTube है, Instagram है, और इनपर short video का भण्डार है जो सुचना का अब तक का सबसे बड़ा तंत्र है। इन तंत्रों के जरिये आज का युवा अपनी बात खुद भी रख सकता है। जबक टेलीविज़न तो केवल एकतरफा संवाद है। Gen-Z आज खुद creators बन कर YouTube, Instagram आदि पर memes creat करके टेलीविज़न से पहले ही उस सुचना को लीक कर देते हैं। Gen-Z की इस पावर का ही परिणाम है कि मीडिया संस्थानों का “agenda-setting power” धीरे-धीरे कमजोर पड़ता जा रहा है।
भारतीय मीडिया Gen-Z से क्यों घबराता है? –
हालाँकि यहां ये कहना की भारतीय मीडिया Gen-Z से घबराता है, इसके बजाय ये कहा जा सकता है कि मीडिया में इतना टेलेंट नहीं बचा है की वे सभ्य तर्रिकों से Gen-Z का मुकाबला कर सकें। क्योंकि सच तो ये है कि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया संस्थानों के सामने दर्शक और पाठकों को अलग-अलग श्रेणी में बांटने और उनकी गिनती करने की चुनौती सामने आ रही है।
भारतीय Gen-Z “Modern” है या “Western” –
Gen-Z से हमको प्रेरणा मिलती है कि आधुनिकता को अपनाने का अर्थ ये नहीं हो सकता है की अपनी प्राचीनता और परंपरा का त्याग कर दें। इसलिए यहां आजकल ये अंतर कर पाना भी मुस्किन होता जा रहा है कि क्या भारतीय Gen-Z ग्लोबल कल्चर से प्रभावित हो रहा है या केवल मॉडर्न होता जा रहा है। क्योंकि भारतीय Gen-Z global music भी सुनते हैं और भारतीय भी। भारतीय Gen-Z स्वदेशी परिधान भी पसंद करते हैं और इंटरनेशनल फैशन में भी दिख जाते हैं। भरतिया खाना भी चाव से खाते हैं और विदेशी खाने को भी खूब पसंद करते हैं।
भारतीय Gen-Z तो अब AI के साथ-साथ दुनियभर की उन सभी तकनीकों को जानते भी हैं और उपलब्ध होने पर इस्तेमाल भी करती है। स्वदेश से भी खूब प्यार है और इंटरनेशनल करियर भी चाहती है। यानी इसका मतलब यहां ये नहीं हो सकता है कि ये पीढ़ी भारतीय संस्कृति से अनिवार्य रूप से दूर हो रही है। हालाँकि एक डरावना सच ये भी है की पिछले कुछ सालों में Gen-Z द्वारा हमारी धरोहरों, परिधानों, संस्कृति और परंपरागत विषयों को नए तरीके से अपनाने या फिर उनको नकारने की भी प्रवृत्ति भी दिखाई देती है।
Gen-Z और धर्म –
धर्म के प्रश्न पर भी Gen-Z को हम न तो पूरी तरह सेक्युलर मान सकते हैं और न ही कट्टर धार्मिक। इसीलिए भारत में अधिकतर युवा धार्मिकता के नए रूपों में दिखाई देते हैं। देश के कई बड़े धार्मिक स्थानों और मंदिरों में आजकल Gen-Z की भरमार देखी जा सकती है। धार्मिक भजन और संगीत में भी रमे रहते हैं और आध्यात्मिक विषयों के कंटेंट में तो Gen-Z की भरमार है। योग और ध्यान करने में भी वे सबसे आगे हैं और धार्मिक उत्सव मनाने में तो अब वे बड़ों को भी शिक्षा देते हुए दिख जाते हैं। इसी तरह अगर हम पिछले कुछ वर्षों की मीडिया रिपोर्टों देखें तो प्रति वर्ष आयोजित होने वाली अमरनाथ और कांवड़ यात्राओं में Gen-Z की बढ़ती भागीदारी को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। स्वयंसेवी संस्थाओं और सहयोग ग्रुप्स आदि के साथ जुड़ कर आज का युवा बड़े-बड़े समाजसेवियों को टक्कर देते दिख जाते हैं।
जंतर-मंतर सहित देशभर में हुए छात्र आन्दोलाओं से एक बात तो स्पष्ट हो गई है की Gen-Z आंदोलन यानी छात्र आंदोलनों और शिक्षा तथा रोजगार से जुड़े मुद्दों ने भारतीय राजनीतिक विमर्श को विशेष रूप से प्रभावित किया है। ऐसे में Gen-Z को केवल “वोट बैंक” समझना सबसे बड़ी राजनीतिक भूल होगी। और आज यदि राजनीतिक दल Gen-Z को केवल 18 से 29 वर्ष के मतदाताओं का एक बड़ा समूह समझते हैं, तो मतलब है कि वे इस पीढ़ी की वास्तविक शक्ति को नहीं समझ पाए हैं। क्योंकि आज का Gen-Z एक मतदाता भी है, ग्राहक भी है, क्रेटर भी है, मज़दूर भी है और मालिक भी है। इन्फ्लुएंसर भी है और सैनिक भी है और लीडर भी। इसलिए आज के Gen-Z का प्रभाव व्यापक है। आज के Gen-Z किसी भी ब्रांड को सफल या असफल कर सकते हैं और किसी भी सामाजिक मुद्दे को सोशल मीडिया में viral भी कर सके हैं। वे किसी नेता की छवि बना भी सकते हैं और बिगाड़ भी सकते हैं। वे किसी फिल्म, गीत या विचार को राष्ट्रीय चर्चा में ला सकते हैं।
Gen-Z की अपनी कमजोरियाँ –
यहां ये भी स्वीकार करना और बताना बनता है की इतनी काबिलियत और गुण होते हुए भी Gen-Z की अपनी कुछ कमजोरियाँ हैं। क्योंकि यहां इन विचारों का मतलब केवल Gen-Z की प्रशंसा करना ही नहीं है। उन कमजोरियों में सबसे बड़ी कमजोरी है Digital misinformation की। क्योंकि सोशल मीडिया पर तेज गति से सूचनायें मिलने का अर्थ ये नहीं होता है कि वे सभी सूचनाएं सही या प्रामाणिक भी हों।
दरअसल, भारत में कई राजनीतिक समूहों द्वारा WhatsApp ग्रुप्स के जरिये अपना-अपना प्रचार विज्ञापनों की तर्ज पर किया जाता है जो अक्सर गलत और भ्रामक तरीकों से मुद्दों या खबरों को बिना किसी आधार पर या बिना किसी शोध या प्रमाण के परोस देते हैं। इसलिए कभी-कभी जिस रील या वीडियो आदि को तेजी से वायरल होते देख कर या अधिक से अधिक व्यूज मिलाने के बाद भी प्रामाणिक नहीं समझा जाना चाहिए। क्योंकि कई युवा विशेषज्ञ और influencer के बीच का अंतर नहीं समझ पाते और भरोसा कर लेते हैं।
