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सनातन और आधुनिक विज्ञान के बीच समय मापन की तुलना

admin 17 September 2022
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आज का विज्ञान अभी तक ठीक से पृथ्वी के रहस्यों को भी नहीं समझ पाया है, लेकिन फिर  फिर भी सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के रहस्यों को जानने और उन्हें सुलझाने के लिए आतुर है। जबकि प्राचीन सनातन विज्ञान ने तो आज से हज़ारों ही नहीं बल्कि लाखों वर्ष पहले मात्र पृथ्वी तो क्या बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के रहस्यों को जान लिया था और इस बात के तथ्यात्मक प्रमाण आज भी हमारे पुराणों में उपलब्ध हैं। उन्हीं प्रमाणों में से आज यहाँ हम समय की गणना को लेकर आधुनिक और प्राचीन ज्ञान-विज्ञान और आधुनिक वर्तमान विज्ञान के विषय में कुछ जानकारियां देने जा रहे हैं।

आज के वैज्ञानिक समय कैसे नापते है?

पिकोसेकेण्ड
नैनो सेकेण्ड
माईक्रो सेकेण्ड,
सेकेण्ड
60 सेकेण्ड में 1 मिनट
60 मिनट में 1 घन्टा
24 घन्टे में 1 दिन (पृथ्वी के आपनी धुरी पर घुमना)
30 दिन में 1 माह
12 माह में 1 वर्ष (पृथ्वी का सुर्य को एक वार परिक्रमण करना)

अव हम वेद में आते हैं :
1 परमाणु = काल की सबसे सूक्ष्मतम अवस्था
2 परमाणु = 1 अणु
3 अणु = 1 त्रसरेणु
3 त्रसरेणु = 1 त्रुटि
10 त्रुटि = 1 प्राण
10 प्राण = 1 वेध
3 वेध = 1 लव या 60 रेणु
3 लव = 1 निमेष
1 निमेष = 1 पलक झपकने का समय
2 निमेष = 1 विपल (60 विपल एक पल होता है)
3 निमेष = 1 क्षण
5 निमेष = 2 सही 1 बटा 2 त्रुटि
2 सही 1 बटा 2 त्रुटि = 1 सेकंड या 1 लीक्षक से कुछ कम।
20 निमेष = 10 विपल, एक प्राण या 4 सेकंड
5 क्षण = 1 काष्ठा
15 काष्ठा = 1 दंड, 1 लघु, 1 नाड़ी या 24 मिनट
2 दंड = 1 मुहूर्त
15 लघु = 1 घटी=1 नाड़ी
1 घटी = 24 मिनट, 60 पल या एक नाड़ी
3 मुहूर्त = 1 प्रहर
2 घटी = 1 मुहूर्त= 48 मिनट
1 प्रहर = 1 याम
60 घटी = 1 अहोरात्र (दिन-रात) (पृथ्वी के आपनी धुरी पर घुमना )
15 दिन-रात = 1 पक्ष
2 पक्ष = 1 मास (पितरों का एक दिन-रात)
कृष्ण पक्ष = पितरों का एक दिन और शुक्ल पक्ष = पितरों की एक रात।
2 मास = 1 ऋतु
3 ऋतु = 6 मास
6 मास = उत्तरायन (देवताओं का एक दिन) वाकि 6 मास दक्षिणायण (देवता की रात)
2 अयन = 1 वर्ष (पृथ्वी के सुर्य की परिक्रमा करना)

मानवों का एक वर्ष = देवताओं का एक दिन जिसे दिव्य दिन कहते हैं।

1 वर्ष = 1 संवत्सर=1 अब्द
10 अब्द = 1 दशाब्द
100 अब्द = शताब्द
360 वर्ष = 1 दिव्य वर्ष अर्थात देवताओं का 1 वर्ष।

12,000 दिव्य वर्ष = एक महायुग (चारों युगों को मिलाकर एक महायुग) =43,20,000 मानव वर्ष
सतयुग : 4800 देवता वर्ष × 360(17,28,000 मानव वर्ष)
त्रेतायुग : 3600 देवता वर्ष × 360(12,96000 मानव वर्ष)
द्वापरयुग : 2400 देवता वर्ष × 360 (8,64000 मानव वर्ष)
कलियुग : 1200 देवता वर्ष × 360 (4,32000 मानव वर्ष)
71 महायुग = 1 मन्वंतर
चौदह मन्वंतर = एक कल्प।

एक कल्प = ब्रह्मा का एक दिन। (ब्रह्मा का एक दिन बीतने के बाद महाप्रलय होती है और फिर इतनी ही लंबी रात्रि होती है)। इस दिन और रात्रि के आकलन से उनकी आयु 100 वर्ष होती है। उनकी आधी आयु निकल चुकी है और शेष में से यह प्रथम कल्प है।

ब्रह्मा का वर्ष यानी 31 खरब 10 अरब 40 करोड़ वर्ष। ब्रह्मा की 100 वर्ष की आयु अथवा ब्रह्मांड की आयु- 31 नील 10 अरब 40 अरब वर्ष (31,10,40,00,00,00,000 वर्ष)

 

अब एक अहोरात्र (24 घंटे) पृथ्वी अपनी धुरी पर घुमती है।

एक वर्ष ( 365 दिन) में जैसे पृथ्वी सूर्य की चारों तरफ घुमती है।
ठीक उसी तरह सूर्य भी सारे ग्रह के साथ आकाशगंगा नाम के निहारिका की (पुराणो में आकाश गंगा शिशुमार चक्र नाम से प्रसिद्ध है) परिक्रमा कर रहै।
सिर्फ हमारे सूर्य ही नही और भी सूर्य अपने ग्रह मण्डल को लेकर इसकी परिक्रमा करते है । वेद के अनुसार हमारे आकाश गंगा में (शिशुमार चक्र में) 8 सूर्य है।
1) आरोग
2) भाज
3) पटर
4) पतंग
5) स्वर्णर
6) ज्योतिषमान
7) विभास
8) कश्यप

इनमें से हमारे सूर्य का नाम आरोग है।

सूर्य को आकाश गंगा (शिशुमार चक्र) की एक चक्कर लगाने में जितना समय लगता है उसे ही एक मनवंतर काल कहते हैं। एक एक मनवंतर यानी (4 युग मिलाकर 1 दिव्य युग 71 दिव्य युग में एक मनवंतर) इसे करने में

4320000 × 71 = 30,84,48000 वर्ष लगते हैं।

आधुनिक विज्ञान इसे मानते है और उनके हिसाब से 25,00,00000 समय लगता है।

लेकिन आधुनिक विज्ञान इससे आगे नहीं जा पाया है, जबकि हमारे ऋषी-मुनियों ने खोज कर ली है कि –

आकाशगंगा के जैसी अन्य कई निहारिकाएं जिनके अन्दर बहुत से सूर्य मण्डल और उनमें भी पृथ्वी जैसे ग्रह मौजूद हैं।

ये सारी निहारिकाएं एक ब्रह्मांड की लगातार परिक्रमा कर रहे हैं। इस परिक्रमा के लिए एक कल्प (14 मन्वंतर में एक कल्प) लग जाते हैं। समय 4320000000 मानव वर्ष।

ऐसे हजारों ब्रह्मांड है। जो अपने इन निहारिका ग्रह नक्षत्र को लेकर ध्रुव मण्डल की परिक्रमा कर रहे।

इसमें ब्रम्हा के 100 वर्ष (31,10,40,00,00,00,000 मानव वर्ष) समय लगता है

ये बात तब की है जब भगवान ने ध्रुव जी को ये मण्डल प्रदान करते हुए कहे। सारे ब्रम्हाण्ड लय होने पर भी ध्रुव लोक नष्ट नहीं होगा तुम मेरे गोद में सदा सुरक्षित रहोगे। सप्त ॠषी अपने ग्रह नक्षत्र के साथ सदैव तुम्हारी प्रदक्षिणा करेंगे। (भागवतपुराण)

सबसे अद्भुत बात ये है कि ये सब परस्पर आकर्षण बल के प्रभाव से एक नियम अनुसार निर्दिष्ट दूरी रख कर युगों से परिक्रमा करके चल रहे।

– साभार

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