अजय चौहान | स्ट्रीट आर्ट हमारे लिए किसी भी प्रकार की महंगी से महंगी सजावट से कहीं अधिक बढ़कर शिक्षा देने वाली, चुभने वाली और बात कहने के साथ-साथ सत्ता में बैठे उचित लोगों तक हमारी बात पहुंचाने के लिए काम आती है। हालाँकि कहीं-कहीं इसका दुरूपयोग भी होता दिख जाता है लेकिन, आम लोगों को यह सत्ता पर सवाल उठाने, समाज में चल रही तात्कालिक और प्रचलित धारणाओं को चुनौती देने और सार्वजनिक स्थानों पर अपना अधिकार जताने के लिए सडकों और चौराहों की दीवारों पर बनाये और लिखे गए चित्रों और कम से कम शब्दों के साथ सबसे सरल तथा सबसे अधिक प्रचलित शब्दों और भाषा का सहारा लेते हैं। आजकल इसी भाषा को “टायलर” स्ट्रीट आर्ट” कहा जाता है।
“टायलर” स्ट्रीट आर्ट (Tyler Street Art) कोई विशेष और प्रचलित कला-शैली नहीं बल्कि एक कलाकार के नाम से जानी जाती है। जबकि “स्ट्रीट आर्ट” तो स्वयं ही एक कला-विधा है जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर बनाए गए भित्तिचित्र (murals), ग्रैफिटी, स्टेंसिल और अन्य दृश्य कलाएँ शामिल होती हैं और इनको हम दुनियाभर में देख सकते हैं। स्ट्रीट आर्ट के लिए ऐसा भी नहीं है की ये केवल सड़कों और दीवारों पर ही बन सकती हैं । बल्कि इसके लिए सोशल मीडिया, मीम्स, कैनवास पोस्टर्स, और शरीर पर पहने जाने वाले कपड़ों और कभी कभी शरीर की भावभंगिमा और इशारों से भी इस कला का प्रदर्शन किया जा सकता है।
हालांकि यह कोई निश्चित नहीं है की स्ट्रीट आर्ट की उत्पत्ति कहाँ से हुई है, लेकिन फिर भी वर्तमान में हम देखते हैं कि “टायलर” स्ट्रीट आर्ट (Tyler Street Art) की कल्पना और यह उपनाम हॉलीवुड की प्रसिद्ध फिल्म ‘फाइट क्लब’ के बागी चरित्र ‘टायलर डर्डन’ से प्रेरित है जो 1999 में आई थी। लेकिन ऐसा नहीं है कि ये आर्ट वहीं से जन्मा है। क्योंकि उस फिल्म में भी कहीं न कहीं से तो यह आर्ट आया ही होगा। यहां ये भी निश्चित नहीं है की इस “स्ट्रीट आर्ट” से जुड़े कलाकार इसमें रोजगार की संभावनाएं देख रहे हों या प्रसिद्धी पा रहे हों, लेकिन ये एक विचारधारा को आगे बढ़ाने और अपनी बात को सबके सामने लाने का माध्यम जरूर है। इसलिए ये कहा जा सकता है कि कोई राजनीतिक दल या संस्था ऐसे कलाकारों की सहायता लेकर उनको अस्थाई आर्थिक लाभ अवश्य दे सकती है।
“टायलर स्ट्रीट आर्ट” से जुड़े लोगों के अनुसार, “स्ट्रीट आर्ट” की खासियत यह होती है कि ये न तो वल्गर होते हैं और न ही एकदम साधारण होते हैं। हालांकि ऐसे आर्ट को समझने के लिए समाज से जुडी कुछ आवश्यक प्रचलित जानकारियों और समस्याओं से अवगत होना भी आवश्यक होता है, लेकिन खासतौर पर आजकल के ZenG वर्ग के लोग हैं वे इस प्रकार के आर्ट और शब्दों को बहुत ही आसानी से समझ जाते हैं और दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन में दिखने वाला स्ट्रीट आर्ट और स्लोगन्स इसका बहुत अच्छा उदहारण रहा है।
आजकल “टायलर स्ट्रीट आर्ट” और इसके आर्टिस्ट केवल भारत में ही नहीं बल्कि सारी दुनिया में पाए जाते हैं जो अपने-अपने समाज, भाषा, भौगोलिक स्थिति और सामजिक, राजनीतिक के साथ-साथ आर्थिक समस्यों और समाधानों को भी अपने स्ट्रीट आर्ट के जरिये बहुत अच्छे से दर्शा देते हैं। खास तौर पर ZenG उम्र से लेकर 40 से 45 वर्ष की आयु वर्ग के बीच ‘टायलर स्ट्रीट आर्ट’ सबसे ज्यादा प्रसिद्ध होते हैं। लेकिन इसकी एक खासियत ये भी है की ZenG उम्र इसको समझने, समझाने और उच्चारण करने में सबसे आगे होते हैं। यही कारण है कि इन कलाकारों की जान पर सत्तापक्ष और विपक्ष के साथ-साथ उद्योगपतियों और अन्य कई असामाजिक तत्वों से ख़तरा भी बना रहता है जिसके कारण ये कलाकार पहनी पहचान छुपा कर ही रहते हैं।
भारत में और और खासतौर पर दिल्ली में जुलाई माह में हुए ZenG आंदोलन के अलावा इसी प्रकार से अन्य कई प्रकार राजनीतिक या सामाजिक मुद्दों के संदर्भ में देखा जाए तो विशेषतः उद्योगपतियों से घिरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दर्शाने वाला एक पोस्टर भी खूब वायरल हुआ था। उस पोस्टर को ZenG से लेकर करीब 40 से 45 वर्ष की आयु तक को तो समझना आसान हो रहा था, लेकिन इससे अधिक आयुवर्ग को यहां इसमें केवल एक भद्दा पोस्टर इसलिए दिख था क्योंकि उसने विषय से जुडी समस्या को नहीं समझा और न ही जानकारी तक भी लेनी चाहि। जबकि इस पोस्टर के माध्यम से ZenG स्पष्ट बता रहे थे कि राजनीति और उद्योगजगत हमारे लिए कुछ नहीं कर पा रहे हैं। उद्योगपतियों से घिरे प्रधानमंत्री का वह पोस्टर तो स्ट्रीट आर्ट का मात्र एक ही उदहारण था, जबकि वहाँ ऐसे और भी सैकड़ों, हज़ारों पोस्टर्स और स्लोगन्स देखने को मिले जो किसी के लिए समस्या तो किसी के लिए दिल और मन की भड़ास के तौर पर सामने आ रहे थे। और इसी को दुनियाभर में आजकल “टायलर” स्ट्रीट आर्ट कहा जाता है।
‘टायलर” स्ट्रीट आर्ट’ (Tyler Street Art) केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनियाभर में प्रसिद्ध है। ये आर्टिस्ट अधिकतर अपनी पहचान गुप्त रखकर शहर की दीवारों पर स्टेंसिल और स्प्रे पेंट के जरिए सामाजिक, राजनीतिक और पूंजीवादी जैसी तमाम व्यवस्थाओं पर तीखे व व्यंग्यात्मक चित्र बनाते हैं। लेकिन आमतौर पर इस प्रकार के सभी आर्टिस्ट अपनी पहचान छुपाकर ही रखते हैं ताकि विचार और कला खुद अपनी बात कह सकें और इस प्रकार की कला और विचारों का प्रयोग कोई भी कहीं भी और किसी के भी विरोध में कर सकें। इन कलाकारों की एक खासियत होती है की अधिकतर रात के अँधेरे में और कम से कम समय में स्प्रे कोर्स के द्वारा अपनी कल्पना के अनुसार कला का प्रदर्शन कर वहाँ से जितना जल्दी हो सके निकल जाते हैं।
(credit – all Images source google)
