पंडित श्रीगोविंददास ‘संत’ धर्म शास्त्री पुराणतीर्थ | प्रत्येक मांगलिक कार्य में श्रीगणपति का प्रथम पूजन होता है। पूजन की थाली में मंगलस्वरूप श्रीगणपति का स्वस्तिक चिह्न बनाकर उसके ओर-छोर अर्थात् अगल- बगल में दो-दो खड़ी रेखाएँ बना देते हैं। स्वस्तिक चिह्न श्रीगणपति का स्वरूप है और दो-दो रेखाएँ श्रीगणपति की भार्यास्वरूपा सिद्धि-बुद्धि एवं पुत्रस्वरूप लाभ और क्षेम हैं। श्रीगणपति का बीजमन्त्र है- अनुस्वारयुक्त ‘ग’, अर्थात् ‘गं’ इसी ‘गं’ बीजमन्त्र की चार संख्या को मिलाकर एक कर देने से स्वस्तिक चिह्न बन जाता है। इस चिह्न में चार बीजमन्त्रों का संयुक्त होना श्रीगणपति की जन्मतिथि चतुर्थी का द्योतक है। चतुर्थी तिथि में जन्म लेने का तात्पर्य यह है कि श्रीगणपति बुद्धिप्रदाता हैं; अतः जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय – इन चार अवस्थाओं में चौथी अवस्था ही ज्ञानावस्था है। इस कारण बुद्धि (ज्ञान) – प्रदान करने वाले श्रीगणपति का जन्म चतुर्थी तिथि में होना युक्तिसंगत ही है। श्रीगणपति का पूजन सिद्धि, बुद्धि, लाभ और क्षेम प्रदान करता है, यही भाव इस चिह्न के आसपास दो- दो खड़ी रेखाओं का है।
इस प्रकार मंगलमूर्ति श्रीगणेशस्वरूप का प्रत्येक अंग किसी-न-किसी विशेषता (रहस्य) – को लिये हुए है। उनका बौना (ठिंगना) रूप इस बातका द्योतक है कि जो व्यक्ति अपने कार्यक्षेत्र में श्रीगणपति का पूजन कर कार्य प्रारम्भ करता है, उसे श्रीगणपति के इस ठिंगने कदसे यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये कि समाजसेवी पुरुष सरलता, नम्रता आदि सद्गुणों के साथ अपने-आपको छोटा (लघु) मानता हुआ चले, जिससे उसके अंदर अभिमान के अंकुर उत्पन्न न हों। ऐसा व्यक्ति ही अपने कार्य में निर्विघ्नतापूर्वक सफलता प्राप्त कर सकता है।
श्रीगणपति ‘गजेन्द्रवदन’ हैं। भगवान् शंकर ने कुपित होकर इनका मस्तक काट दिया और फिर प्रसन्न होने पर हाथी का मस्तक जोड़ दिया, ऐसा ऐतिहासिक वर्णन है। हाथी का मस्तक लगाने का तात्पर्य यही है कि श्रीगणपति बुद्धिप्रद हैं। मस्तक ही बुद्धि (विचारशक्ति) – का प्रधान केन्द्र है। हाथी में बुद्धि, धैर्य एवं गाम्भीर्य का प्राधान्य है । वह अन्य पशुओं की भाँति खाद्य-पदार्थ को देख पूँछ हिलाकर अथवा खूँटा उखाड़कर नहीं टूट पड़ता; किंतु धीरता एवं गम्भीरता के साथ उसे ग्रहण करता है। उसके कान बड़े होते हैं। इसी प्रकार साधक को भी चाहिये कि वह सुन सबकी ले, पर उसके ऊपर धीरता एवं गम्भीरता के साथ विचार करे। ऐसे व्यक्ति ही कार्यक्षेत्र में आगे बढ़कर सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
श्रीगणपति ‘लम्बोदर’ हैं । उनकी आराधना से हमें यह शिक्षा मिलती है कि मानव का पेट मोटा होना चाहिये अर्थात् वह सबकी भली-बुरी सुनकर अपने पेट में रख ले; इधर-उधर प्रकाशित न करे। समय आने पर ही यदि आवश्यक हो तो उसका उपयोग करे।
श्रीगणपति का ‘एकदन्त’ एकता (संगठन) -का उपदेश दे रहा है। लोक में ऐसी कहावत भी प्रसिद्ध है कि अमुक व्यक्तियों में बड़ी एकता है – ‘एक दाँत से रोटी खाते हैं।’ इस प्रकार श्रीगणपति की आराधना हमें एकता की शिक्षा दे रही है। यही अभिप्राय उनको मोदक (लड्डू)-के भोग लगाने का है। अलग-अलग बिखरी हुई बूँदी के समुदाय को एकत्र करके मोदक के रूपमें भोग लगाया जाता है। व्यक्तियों का सुसंगठित समाज जितना कार्य कर सकता है, उतना एक व्यक्ति से नहीं हो पाता । श्रीगणपति का मुख-मोदक हमें यही शिक्षा देता है।
श्रीगणपति को सिन्दूर धारण कराने का यह अभिप्राय है कि सिन्दूर सौभाग्यसूचक एवं मांगलिक द्रव्य है। अतः मंगलमूर्ति श्रीगणेश को मांगलिक द्रव्य समर्पित करना युक्तिसंगत ही है । दूर्वांकुर चढ़ाने का तात्पर्य यह है— गज को दुर्वा प्रिय है। दूसरे, दूर्वा में नम्रता एवं सरलता भी है। श्रीगुरु नानक साहब कहते हैं —
नानक नन्हें बनि रहो, जैसी नन्ही दूब ।
सबै घास जरि जायगी, दूब खूब-की- खूब ॥
श्रीगणपति की आराधना करनेवाले भक्तजनों के कुल की दूर्वा की भाँति अभिवृद्धि होकर उन्हें स्थायी सुख-सौभाग्य की सम्प्राप्ति होती है ।
श्रीगणपति के चूहे की सवारी क्यों? इसका तात्पर्य यह है कि मूषक का स्वभाव है – वस्तु को काट देने का। वह यह नहीं देखता कि वस्तु नयी है या पुरानी – बिना कारण ही उन्हें काट डालता है । इसी प्रकार कुतर्की जन भी यह नहीं सोचते कि प्रसंग कितना सुन्दर और हितकर है। वे स्वभाववश चूहे की भाँति उसे काट डालने की चेष्टा करेंगे। प्रबल बुद्धि का साम्राज्य आते ही कुतर्क दब जाता है। श्रीगणपति बुद्धिप्रद हैं; अत: उन्होंने कुतर्करूपी मूषक को वाहनरूप से अपने नीचे दबा रखा है। इस प्रकार हमें श्रीगणपति के प्रत्येक श्रीअंग से सुन्दर शिक्षा मिलती है। साभार – श्री गणेश अंक (गीता प्रेस)
