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कश्मीर का रामायण और महाभारतकालीन रहस्यमई इतिहास | History of Kashmir

admin 13 December 2021
Kashmir history and Anantnag
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अजय सिंह चौहान || कश्मीर को आज के दौर में भले ही एक छोटे से हिस्से में सीमित मान लिया गया हो। लेकिन, किसी समय में आज के हमारे इसी कश्मीर की सिमायें कैस्पियन सागर तक फैली हुई थीं। जी हां, वही कैस्पियन सागर जिसके एक किनारों पर अज़रबेजान और दूसरे किनारे पर तुर्कमेनिस्तान जैसे देश बसे हुए हैं। और यही कैस्पियन सागर ऋषि कश्यप के नाम पर यानी कश्यप सागर के नाम से जाना जाता था।

आज भले ही चन्द लोग उसके महत्व को समझ ही नहीं पा रहे हैं। जबकि कई शोधकर्ताओं ने इस बात को माना है कि युगों पहले जब शेष पृथ्वी पर मानव का अस्तित्व ही नहीं था उस समय भी भारतीय उप महाद्वीप में मानव सभ्यता एक विकसित जीवन जी रही थी और कैस्पियन सागर से लेकर कश्मीर तक ऋषि कश्यप के वंशजों का राज फैला हुआ था।

इसके अलावा यह भी माना जाता है कि त्रेतायुग में भगवान राम के जन्म से भी हजारों वर्ष पहले तक कश्मीर मात्र एक जनपद के रूप में हुआ करता था। और यदि हम वाल्मीकि रामायण की माने तो कंबोज वाल्हीक और वनायु देश के पास स्थित है।

महाभारत काल तक भी कश्मीर के विभिन्न हिस्से भारत की 16 में से तीन महाजनपदों में आते थे जो गांधार, कंबोज और कुरु नामक महाजनपद के नाम से जाने जाते थे। इसमें से गांधार नामक महाजनपद आज के पाकिस्तान का पश्चिमी तथा अफगानिस्तान का पूर्वी क्षेत्र उस काल में भारत का गंधार प्रदेश हुआ करता था।

जिस समय सिकन्दर ने यहां आक्रमण किया था उस समय तक गंधार में छोटी-छोटी बड़ी कई रियासतें हुआ करती थीं, जिनमें से अभिसार और तक्षशिला सबसे प्रमुख मान जाती थी और वर्तमान में जिसे हम पेशावर के नाम से जानते हैं दरअसल उस समय यह पुरुषपुर नामक राज्य हुआ करता था और तक्षशिला इसकी राजधानी थी।

इतिहासकार मानते हैं कि पुरुषपुर का अस्तित्व भी लगभग 600 ईसा पूर्व से 11वीं सदी तक बना रहा। लेकिन एक अलग भाषा के ऊच्चारण और प्रभाव के कारण यह पुरुषपुर से पेशावर में बदल गया।

इसके अलावा महाभारत ग्रंथ में जिस अभिसारी नामक नगर का उल्लेख आता है वह भी चिनाब नदी के पश्चिम में पूंछ, राजौरी और भिंभर की पहाड़ियों में स्थित था।

यदि हम वाल्मीकि रामायण की माने तो कंबोज वाल्हीक और वनायु देश के पास स्थित है। और अगर हम आ‍धुनिक इतिहास की माने तो कश्मीर के राजौरी से तजाकिस्तान तक का हिस्सा ही कंबोज हुआ करता था जिसमें आज का पामीर का पठार और बदख्शां भी शामिल हैं।

कश्मीर में छूपा है युगों-युगों का रहस्यमई खजाना

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कंबोज महाजनपद का विस्तार कश्मीर से हिन्दूकुश तक हुआ करता था। जिसमें इसके उस समय के दो नगर राजपुर और नंदीपुर सबसे प्रमुख थे।

प्राचीन काल के उस राजपुर को ही आजकल हम राजौरी के नाम से जानते हैं। इसमें पाकिस्तान का हजारा नामक जिला भी कंबोज के अंतर्गत ही आता था। इसी तरह कश्मीर के अन्य स्थानों जैसे बड़गाम, पुलवामा, कुपवाड़ा, शोपियां, गंदरबल, बांडीपुरा, श्रीनगर, पहलगाम और कुलगाम जिलों का भी अपना अलग प्राचीन और पौराणिक इतिहास रहा है।

इसी तरह आज जिसे हम बारामूला के नाम से जानते हैं उसका प्राचीन नाम नाम वराह मूल हुआ करता था। इस स्थान को प्राचीनकाल में वराह अवतार की उपासना का केंद्र माना गया है। लेकिन ऊच्चारण के रूप में की जाने वाली गलतियों के कारण वराहमूल से धीरे-धीरे यह बारामूला में बदल गया और आज इसे इसी राम से जाना जाता है। जबकि वराहमूल का अर्थ होता है ‘सूअर दाढ़ या दांत। ये वही वराहमूल है जिसे भगवान विष्णु का अवतार माना गया है और जिन्होंने अपने दांतों की सहायता से ही धरती को उठा लिया था।

कश्मीर का प्राचीन और पौराणिक इतिहास सर्वप्रथम यहां के मूल निवासी कश्मीरी पंडितों से जुड़ा हुआ है जिसमें इन कश्मीरी पंडितों की संस्कृति लगभग 6,000 साल से भी ज्यादा पुरानी मानी गई है इसीलिए वे ही कश्मीर के मूल निवासी माने जाते हैं।

और यदि बात यदि कश्मीर के पौराणिक इतिहास की हो रही हो तो भला उसमें बाबा अमरनाथ जी की गुफा का कैसे छूट सकता है। दरअसल, राजतरंगिणी नामक जिस पुस्तक में कश्मीर के भौगोलिक इतिहास से संबंधित विभिन्न जानकारियां मिलती हैं वहीं इसमें यह भी बताया गया है कि किस प्रकार से उस समय के शासक बाबा अमरनाथ जी की गुफा में पूजा अर्चना करने जाया करते थे।

हालांकि यह बात ओर है कि कुछ इतिहासकारों ने बाबा अमरनाथ जी की गुफा की खोज की झूठी कहानी गढ कर एक गढरिये को महान बना दिया।

तो इतनी महान और पुरातन संस्कृति और इतिहास का अमूल्य खजाना भारतभूमि के कश्मीर नाम जिस भू-भाग से जुड़ा हो भला वह अब बेहाल और लाचार कैसे रह सकता है।

अगर जरूरत है तो बस कश्मीर से जुड़े उस पौराणिक इतिहास और उसके तथ्यों और सनातन धर्म से संबंधित इसके महत्व को समझने की, समझाने की और दुनिया के सामने लाने की।

विभिन्न प्रकार के तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर कश्मीर एक बार फिर से सनातन संस्कृति और भारत के इतिहास में उस गुमनाम खजाने को प्राप्त करने जैसा साबित हुआ है। इसलिए हम कह सकते हैं कि कश्मीर में छूपा है युगों-युगों का रहस्यमई खजाना और इतिहास।

हम निसंकोच यह बात कह सकते हैं कि आज जिसे कुछ लोग मात्र जमीन का एक टुकड़ा समझते हैं और मात्र कश्मीर कहकर पुकारते हैं वह सनातन संस्कृति और भारत के इतिहास में कितना अनमोल स्थान और रत्न हुआ करता था।

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