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रहस्यमयी दिव्य आत्माओं का स्थान है हिंगलाजगढ़ किला | Hinglajgarh Fort History

admin 9 March 2021
Hinglajgarh fort Aerial View
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अजय सिंह चौहान  || पश्चिम मालवा में स्थित हिंगलाजगढ़ किले से जुड़ा दुर्भाग्य और ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि घने जंगलों और निर्जन स्थान पर होने के होने के कारण ब्रिटिश शासन काल के दौरान इस किले का उपयोग मात्र एक शिकारगाह और आरामगाह के तौर पर उपयोग किया जाता रहा, जिसके कारण यह किला आम आदमी की पहुंच से दूर होता गया और रखखाव के अभाव में खंडहर होने के कारण डरावना लगने लगता था जिससे यह धीरे-धीरे रहस्यमयी भी होता गया।

उसका परिणाम यह हुआ कि इस कीले के भीतर की कुछ विशेष इमारतों और स्थानों के बारे में ना तो आम आदमी को कुछ भी अंदाजा था और ना ही इसके समृद्ध इतिहास के बारे में कोई जानता था। धीरे-धीरे आम लोगों के बीच इस कीले का रहस्य इस तरह से गहराता होता गया कि, आखिर देखने में तो यह किला एक प्राचीन और समृद्धशाली लगता है लेकिन, ऐसी इमारत एक घने अभयारण्य और निर्जन तथा एकांत स्थान पर क्यों है।

हालांकि, फिर भी जहां एक ओर ब्रिटिश शासकों के द्वारा हिंगलाज के इस दुर्ग को मात्र एक आरामगाह समझा गया था, वहीं स्थानिय लोगों में यह किला तब भी कुछ विशेष अवसरों पर देवी स्थान के रूप में पवित्र स्थान बना रहा। उसी तरह आज भी है और हजारों वर्ष पहले भी यह किला एक मंदिर के रूप में ही रहा है। क्योंकि जहां कहीं भी मंदिर जैसा दिव्य स्थान होता है वहां रहस्य जैसी कोई आशंका ही नहीं रह जाती।

हिंगलाजगढ़ का यह किला मध्यप्रदेश में राज्य द्वारा संरक्षित प्रदेश का महत्वपूर्ण स्मारक और मंदिर स्थल है। इस कीले का प्राचीन इतिहास जितना समृद्धशाली और गौरवमयी रहा है उतना ही दर्दभरा इसका मुगलकाल का इतिहास भी रहा है। रामपुरा के चन्द्रावत राजवंश के राजाओं के 1688 ईस्वी के पाटनामें में इसका उल्लेख एक हवेली के रूप में मिलता है।

हिंगलाजगढ़ का यह किला मध्यप्रदेश और राजस्थान की सीमा पर पश्चिम मालवा में स्थित है। यहां तक पहुंचने के लिए भानपुरा से करीब 30 कि.मी. दूर और पश्चिम मालवा की भानपुरा तहसील के गांधीसागर अभयारण्य क्षेत्र में फैले घने जंगल से होकर पहुँचना पड़ता है। आज भले ही यह किला एक प्रकार से खंडहर का रूप ले चुका है, लेकिन इसकी बनावट और वैभवपूर्ण शिल्पकारी को देख कर इसके ऐतिहासिक महत्व और बुलंदियों का अंदाजा लगाया जा सकता है।

अपने समय में सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाने वाला और लगभग 10 किलोमीटर अर्द्धवृत्ताकार और करीब 300 फीट गहरी खाई से घिरी जिस टेकरी की ऊंचाई पर यह किला बना हुआ है उसके दो तरफ से होकर यहां की चंबल नदी बहती है। जबकि इस किले से करीब 35 किलोमीटर की दूरी पर गांधी सागर बांध का जलाशय भी है।

हिंगलाजगढ़ नामक इस दुर्ग के इतिहास को लेकर जो तथ्य हैं उनके अनुसार परमार काल की सामरिक गतिविधियों के यह दुर्ग महत्वपूर्ण रहा है। फिलहाल, यह प्रामाणिक रूप से नहीं कहा जा सकता है कि हिंगलाजगढ़ दुर्ग की नींव कब और किस राजवंश के समय में रखी गई थी। क्योंकि, यहां से प्राप्त प्रतिमाओं के आधार पर माना जाता है कि इनमें से अधिकतर प्राचीनतम प्रतिमायें हैं जो 5वीं और 6वीं शताब्दी की हैं। जबकि, जो प्रमाण या तथ्य दिये जाते हैं उनके अनुसार यह दुर्ग 12वीं शताब्दी में परमार काल के दौरान सैन्य छावनी और सैन्य सामरिक गतिविधियों के लिए बनवाया गया था।

मुगलों और मेवाड़ के राजाओं के बीच वर्ष 1520 से 1752 के दौरान हुए कई छोटे और बड़े युद्धों का असर और परिणाम पश्चिमी मालवा के इस क्षेत्र में साफ-साफ देखने को मिला, जिसमें हिंगलाजगढ़ का यह किला और इसका साम्राज्य भी मुगल आक्रांताओं के क्रुरता भरे रक्तपात और उनकी निर्दयता के अलग-अलग रूपों का भी साक्षी रहा है।

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हालांकि, 18वीं शताब्दी के अंतिम दशकों के दौरान हिंगलाजगढ़ का यह किला मराठों के कब्जे में आ चुका था इसलिए इसमें एक बार फिर से जीर्णोद्धार करवा कर इसके समृद्ध इतिहास को कायम रखने का प्रयास किया गया जिसमें इस दुर्ग की दीवारों का जीर्णोद्धार, हिंगलाज माता मंदिर का जीर्णोद्धार, शिव मंदिर और इसके बारादरी रानी महल का बड़े पैमाने पर जिर्णोद्धार के साथ-साथ कुछ नये निर्माण करवाकर इसको फिर से वैभवशाली बनवाया गया था।

हिंगलाजगढ़ के इस किले के बारे में स्थानिय लोगों का कहना है कि कीले में मौजूद स्मारकों में से एक स्मारक स्थानिय भील समुदाय के किसी विशेष व्यक्ति से संबंधित है। इसलिए भी यह किला ना सिर्फ गुप्त काल और परमार काल की वीर गाथाओं और इतिहास से संबंध रखता है बल्कि यहां की विशेष जनजाति एवं भील समुदाय के लिए भी खास है।

माना जाता है कि हिंगलाजगढ़ की वर्तमान संरचना का निर्माण आज से लगभग 1,000 वर्ष पूर्व हुआ था। हालांकि, यह किला यहां कितना प्राचीन है इसके कोई निश्चित या ऐतिहासिक व अभिलेख और साक्ष्य फिलहाल उपलब्ध नहीं है। लेकिन, किले से प्राप्त पाली लिपी में लिखे कुछ ऐसे प्राचीन शिलालेख मिले हैं, जो इसके रहस्य और इतिहास के बारे में बताते हैं।

इसके अलावा, जो तथ्य मौजूद हैं उनके अनुसार मौर्य वंश के प्रांभिक दौर के साम्राज्य से भी पहले से यहां हिंगलाज माता का वह मंदिर मौजूद था जिसके नाम पर इसे हिंगलाजगढ़ दुर्ग या हिंगलाजगढ़ किला कहा गया। स्थानिय लोगों में हिंगलाज माता के इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि यह मंदिर 52 शक्तिपीठों में से एक है। हालांकि, सर्वमान्य तौर पर इसे शक्तिपीठ के रूप में तो नहीं माना जाता, लेकिन, स्थानिय स्तर पर यहां यही मान्यता प्रचलीत है।

हिंगलाजगढ़ की हिंगलाज माता को मौर्य वंश यानी क्षत्रिय वंश की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है। इसलिए मौर्य शासन काल के दौरान ही संभवतः यहां माता हिंगलाज के मंदिर की स्थापना की गई होगी। क्योंकि, पौराणिक मान्यताओं और कई साक्ष्यों के आधार पर हिंगलाज माता का शक्तिपीठ मंदिर इस समय पाकिस्तान के कब्जे वाले बलुचिस्तान प्रांत में स्थित है।

हालांकि, हिंगलाजगढ़ की इस हिंगलाज माता के शक्तिपीठ मंदिर होने बारे में जो तर्क और सबूत दिए जाते हैं उसमें सबसे खास और सबसे महत्वपूर्ण है कि यहां से प्राप्त देवी की अति प्राचीन काल की कुछ प्रतिमायें भी शक्ति के उन विविध स्वरूपों को दर्शाती हैं। और इन देवी प्रतिमाओं में भी गौरी प्रतिमाओं की संख्या अधिक है। इस स्थान से गौरी की जितनी भी प्रतिमायें प्राप्त हुई हैं उस प्रकार की या उस समय की कोई भी अन्य प्रतिमायें कहीं और से या किसी अन्य स्थान से अभी तक प्राप्त नहीं हुई हैं। मात्र इतना ही नहीं, बल्कि इस स्थान से सप्तमातृकाओं की भी प्रतिमायें प्राप्त हो चुकी हैं। आज भी यहां हिंगलाज माता के दर्शन और पूजन के लिए स्थानीय लोगों का आना-जाना लगा रहता है।

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शक्तिपीठों से जुड़ी मान्यताओं के अनुसार जब से शक्तिपीठों में तान्त्रिक पूजा का समावेश हुआ तभी से हिंगजालगढ़ में भी कलाकारों और शिल्पकारों के द्वारा पौराणिक काल में कई योगिनी प्रतिमायें निर्मित की गयी। और उसी के फलस्वरूप यहां से भी अपराजित, वैनायकी, काव्यायनी, भुवनेश्वरी और बगलामुखी आदि देवियों की प्रतिमायें प्राप्त हुई। एक ही स्थान से इतनी अद्भूत और उत्तम कारीगरी युक्त सैकड़ों प्रतिमाओं के प्राप्त होने से यह स्पष्ट होता है कि किसी समय यह स्थान एक महत्वपूर्ण शिल्पकला का केन्द्र हुआ करता था।

इसलिए पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार यहां से प्राप्त कई अवशेषों और विभिन्न प्रतिमाओं में से अधिकतर तो 5वीं और 6वीं शताब्दी की भी हैं। इसलिए यह कहना सही नहीं है कि यह किला यहां सर्वप्रथम 12वीं शताब्दी में बनाया गया होगा। यहां से प्राप्त कुछ विशेष पौराणिक और प्राचीन प्रतिमाओं को इंदौर में स्थित केंद्रीय संग्रहालय में देखा जा सकता है।

हिंगलाजगढ़ दुर्ग का इतिहास बताता है कि यहां कई राजवंशों ने आधिपत्य जमाया, लेकिन किसी ने भी इसे अपनी स्थायी राजधनी या स्थायी निवास नहीं बनाया। बल्कि इस किले का उपयोग सामरिक दृष्टि से अपनी ताकत बढ़ाने या ताकत दिखाने और एक छावनी के तौर पर ही अधिक किया।

परमार शासकों ने इस किले की मजबूती में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। क्योंकि परमार काल में हिंगलाजगढ़ दुर्ग सामरिक दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण हुआ करता था। बावजूद इसके वर्ष 1281 में हाड़ा शासक हालू ने इस किले पर कब्जा कर लिया। और फिर हाड़ा शासक हालू के बाद यह किला चंद्रावत शासकों के अधीन आ गया। इसके बाद लक्ष्मण सिंह चंद्रावत ने भी यहां से अपना शासन चलाया। इसी तरह वर्ष 1773 में महारानी अहिल्याबाई होलकर ने लक्ष्मण सिंह चंद्रावत को पराजित कर किले पर आधिपत्य जमा लिया।

मराठा शासन के दौरान यशवंतराव होलकर ने इसमें बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण का कार्य कराया था। उस पुनर्निर्माण कार्य के अंतर्गत किले में मौजूद कई देवालयों और विशेषकर हिंगलाज माता का मंदिर, अन्य मठों एवं कमरों के उचित रखरखाव के लिए विशेष कारीगरों को नियुक्त किया था।

हिंगलाजगढ़ का यह किला मध्यप्रदेश का महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पर्यटन और राज्य द्वारा संरक्षित स्मारक है। इसमें पाटनपोल, सूरजपोल, कटरापोल और मन्डलेश्वरी पोल के नाम से चार प्रवेश द्वार हैं। पहले तीन द्वार पूर्वमुखी और मंडलेश्वरी दरवाजा पश्चिम मुखी है। इसके अलावा किले के मुख्य आकर्षण के रूप में यहां का सूरजकुंड जलाशय भी है जो यहां पानी की पूर्ति के लिए बनवाया गया था।

हिंगलाजगढ़ के इस किले में बिखरे इतिहास और पाषण शिल्पों का अध्ययन करने और उनको निहारने के लिए बड़ी संख्या में इतिहास प्रेमी और पर्यटक आते रहते हैं। किले में स्थित सूरजकुण्ड की स्वच्छता एवं उसकी मरम्मत, कचहरी महल, सूरजपोल, कटारापोल, पाटनपोल, मन्डेश्वरी गेट जैसी कुछ विशेष इमारतों और अवशेषों को आवश्यकता के अनुसार हाल ही में संवारा गया है।

भले ही आज यह किला एक खंडहर में बदल चुका है, लेकिन इसकी बनावट और शिल्पकारी को देखकर इसके प्रारंभिक या प्राचीन वैभव के चरमकाल में इसकी बुलंदियों का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।

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परमार काल के दौरान हिंगलाजगढ़ का यह किला अपने वैभव के चरम पर था। और लगभग 800 वर्ष पूर्व तक यह स्थान मूर्तिशिल्प कला के रूप में भी विश्व प्रसिद्ध रहा। यहां चारों ओर बिखरी प्राचीन प्रतिमाओं के अध्ययन व एकत्रीकरण से यह स्थान प्राचीन शिल्पकला की अपनी विशिष्टता के लिए पहचाना जा चुका है।

पुरातत्व विभाग के अनुसार किले में मिली सबसे पुरानी मूर्तियों में से कुछ तो लगभग 1,600 वर्ष से भी अधिक पुरानी हैं। यहां से प्राप्त नंदी और उमा-महेश्वर की प्रतिमाओं को फ्रांस और वाशिंगटन में हुए इंडिया फेस्टीवल में भी प्रदर्शित किया जा चुका है।

इस किले और यहां की अद्भुत शिल्प कारीगरी को साक्षात निहारे और उसका अवलोकन के लिए बड़ी संख्या में देश-विदेश के इतिहास प्रेमी और पर्यटक आते रहते हैं।
यदि आप भी यहां पर्यटन के लिहाज से या फिर हिंगलाज देवी के दर्शन करने के बहाने, जाना चाहते हैं तो यहां जाने के लिए सबसे अच्छा मौसम अक्टूबर से मार्च के बीच का सबसे अच्छा रहेगा।

हिंगलाजगढ़ का यह किला मध्यप्रदेश और राजस्थान की सीमा पर बसे पश्चिम मालवा में स्थित है। यहां तक पहुंचने के लिए भानपुरा से करीब 30 कि.मी. दूर और पश्चिम मालवा की भानपुरा तहसील के गांधीसागर अभयारण्य क्षेत्र में फैले घने जंगल से होकर पहुँचना पड़ता है। भानपुरा तहसील में गाँव नवल के पास स्थित यह किला मंदसौर शहर से 135 किमी दूर है। जबकि उज्जैन से इसकी दूरी करीब 200 किलोमीटर और नीमच से यह 130 किलोमीटर की दूरी पर है।

हिंगलाजगढ़ किले के लिए रेल मार्ग से जाने पर यहां का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन रामगंज मंडी है जहां से किले की दूरी करीब 15 किलोमीटर रह जाती है। जबकि, दूसरा नजदीकी स्टेशन भवानीमंडी स्टेशन है जहां से किले की दूरी करीब 20 किलोमीटर है। रेलवे स्टेशन से आॅटो या टेक्सी लेकर हिंगलाजगढ़ किले तक पहंुचा जा सकता है। इसके अलावा हिंगलाजगढ़ किले के लिए सबसे नजदीकी हवाई अड्डा इंदौर में है जो यहां से करीब 260 किमी दूर है।

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