श्री माधव अनन्त फड़के | महाराष्ट्र में गणेशोपासना अत्यधिक प्रचलित है। गणेशजी के विख्यात अष्टगणपति-क्षेत्र महाराष्ट्र में ही हैं। उन अष्टगणपति-क्षेत्रों के नाम इस प्रकार हैं-1- मोरगाँव, 2-थेऊर, 3-लेह्याद्रि, 4- ओझर, 5 – राजनगाँव, 6- महड़, 7- पाली और 8- सिद्धटेक। इनका तथा महाराष्ट्र के अन्य स्थानों का संक्षिप्त विवरण यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।
मोरगाँव (जिला- पूना) – पूना से चालीस मील की दूरी पर गाणपत्य – सम्प्रदाय का यह आद्य पीठ है । यहाँ के देवता हैं – मयूरेश्वर । इस अत्यन्त जाग्रत् देवस्थान की गणना अष्टविनायकों में है । यहाँ गणेशजी के आगे एक बहुत बड़े चूहे की प्रतिमा है, जो पैर में लड्डू पकड़े है। भीतरी आँगन में मुद्गलपुराणोक्त श्रीगणेश की आठ प्रतिमाएँ आठ कोनों में हैं। प्रतिमा के अगल-बगल धातु की सिद्धि-बुद्धि की प्रतिमाएँ हैं। मूर्ति के सामने वाहन के रूप में मूषक एवं मयूर हैं । इन सिद्धिदाता मयूरेश्वर- गणपति की अनन्य उपासना महागणपति-भक्त मोरया गोसावी ने चौदहवीं शताब्दी में इस क्षेत्र में आकर की और उन्हें यहाँ के ‘ब्रह्म-कमण्डलु’-तीर्थ में भगवत्कृपा से जो उपास्य देवता की मूर्ति मिली, उसी की स्थापना बाद में इन्होंने चिंचवड़ में करके भव्य मन्दिर खड़ा किया। आगे चलकर श्रीमोरया गोसावी साल में दो बार माघ एवं भाद्रपद की चतुर्थी को मोरगाँव में आने लगे । आज भी ‘चिंचवड़ ‘से भगवान् की पाल की इन दो चतुर्थियों को यात्रा के निमित्त यहाँ आती है। इसी प्रकार अठारहवीं शताब्दी के अन्त में एक दूसरे सिद्ध सत्पुरुष श्रीगणेश- योगीन्द्र का भी सम्बन्ध इस क्षेत्र से रहा है।
थेऊर (जिला- पूना ) – थेऊर पूना से चौदह मील पर है । अष्टविनायकों में यह भी एक स्थान है । यहाँ के गणेशजी का नाम ‘चिन्तामणि’ है । चिंचवड़ के श्रीमोरया गोसावी ने थेऊर के जंगल में उग्र तपश्चर्या की थी। इनकी तपश्चर्या से प्रसन्न होकर श्रीगणेश जी व्याघ्र के रूप में प्रकट हुए थे। उस व्याघ्र के प्रतीक रूप में आज भी यहाँ एक पाषाण-खण्ड है। यहाँ पर स्थित श्रीगणेश- प्रतिमा पालथी मारे हुए बैठी मुद्रा में है तथा प्रतिमा की सूँड़ बायीं ओर एवं पूर्वाभिमुख है। यह देवस्थान चिंचवड़-संस्थान के अधिकार में है ।
लेह्याद्रि (जिला- पूना ) – यह अष्टविनायक- स्थान पूना से ६० मील दूर है। यह स्थान पहाड़ खोद कर तैयार किया गया है। इसके आस-पास बौद्ध गुफाएँ भी हैं। गणेशपुराण में इस स्थान का उल्लेख है । यहाँ पर गणेश-प्रतिमा एक ताखे के भीतर है, जो ‘गिरिजात्मज’- के नाम से प्रसिद्ध है।
ओझर — यह अत्यन्त रमणीय स्थान लेह्याद्रि के पास है। अष्टविनायकों में यहाँ पर के ‘श्रीविघ्नेश्वरजी ‘की बड़ी प्रतिष्ठा है। यहाँ का मन्दिर अत्यन्त भव्य एवं सुन्दर है। मूर्तिकी सूँड़ बायीं तरफ है।
राजनगाँव (जिला-पूना) – अष्टविनायकों में यह भी एक स्थान है, जो पूना से ३१ मील है । मन्दिर पूर्वाभिमुख है । मन्दिर की रचना ऐसी है कि उत्तरायण एवं दक्षिणायन के मध्यकाल में सूर्य की किरणें निश्चितरूप से मूर्ति पर पड़ती हैं। यहाँ के श्रीविग्रह को ‘महागणपति’ कहते हैं । इस समय मन्दिर में जो पूजामूर्ति है, उसके नीचे तहखाने में दूसरी एक छोटी मूर्ति है। वही असली मूर्ति है। मुस्लिम- शासन-काल के आक्रमणकारी मुसलमानों के डरसे उस प्राचीन मूर्ति को इस प्रकार छिपाकर रखा गया था। इन श्रीगणेश का नाम ‘महोत्कट’ है ।
चिंचवड़ (पूना) – पूना से ग्यारह मील दूर यह एक जाग्रत् देवस्थान है। महाराष्ट्र के श्रेष्ठ गणपति-भक्त मोरया गोसावी ने इस स्थान पर ‘मंगलमूर्ति’ नाम के गणेशजी की स्थापना की। यहीं पर इन्होंने जीवित समाधि भी ली थी। इस क्षेत्र को समर्थ रामदास, संत तुकाराम भी बहुत मानते थे । प्रशस्त सभा मण्डप के अन्दर जाने पर समाधि है । इस समाधि पर मोरया गोसावी की उपास्य-मूर्ति है । समाधि पर स्थित श्रीगणेशमूर्ति पद्मासन में है। सूँड़ दाहिनी ओर मुड़ी है । केवल दो आँखें दिखलायी देती हैं।
पूना शहर के गणपति-विग्रह –
(क) कसवागणपति — ठकार नामक एक गणेशभक्त को प्राप्त आदेश के आधार पर जमीन खोद कर यह प्रतिमा मिली थी। यही आदेश शिवाजी एवं जीजाबाई को भी हुआ था। यह ‘स्वयम्भू मूर्ति’ है एवं ये पूना नगर के ग्राम देवता हैं। इन्हें ‘जयति गणपति’ भी कहते हैं।
(ख) सिद्धि विनायक – श्रीगणेशजी से आदेश पाकर गणेशभक्त सवाई श्रीमाधवराव पेशवा ने दाहिनी सूँड़ की गणेश प्रतिमा बनवाकर सारसबाग तालाब के शान्त वातावरण में इसकी स्थापना की थी ।
(ग) वरद – गुपचुप गणपति- लोकमान्य तिलकजी के समय के शनिवार पेठ में यह एक प्रसिद्ध गणेशस्थान है । देवस्थान की स्थापना श्रीरामचन्द्र विष्णु गुपचुप ने करके प्रतिमा का नाम ‘श्रीवरदगणपति’ रख दिया।
(घ) दशभुज चिन्तामणि – यह मूर्ति भी आदेश के आधार पर कुएँ से मिली है। गणेशपुराण में गणेश मन्दिर- निर्माण के सम्बन्ध में जो आवश्यक निर्देश है, तदनुरूप ही गणेश-लोक के भावनानुसार इस मन्दिर का निर्माण हुआ है।
(ङ) त्रिशुण्ड – नागझरी के किनारे पूना का अत्यन्त प्राचीन एवं विशिष्ट रचना वाला मन्दिर है । मन्दिर की दीवार पर एक गणेश-यन्त्र खुदा हुआ है, जिसके आधार पर शोध करने वालों का कथन है कि यह तन्त्रमार्गीय मन्दिर है । मन्दिर के नीचे गुप्त तहखाने में मन्दिर के संस्थापक महंत श्रीदत्तगुरु महाराज की समाधि है । इस मन्दिर की ऐसी रचना की गयी है कि गजानन – मूर्ति के अभिषेक का पानी सीधे समाधि पर पड़े। इन मुख्य स्थानों के अतिरिक्त पूना नगर में अन्य भी कई बड़े श्रीगणेश मन्दिर हैं ।
पाली (जिला- कुलाबा ) – यह अष्टविनायक स्थान है । यहाँ के श्रीगणेशजी का नाम बल्लालेश्वर है । गणेश पुराण तथा मुद्गलपुराण में भी इसका उल्लेख है। प्राचीनकाल से ही यह एक जागरूक स्थान है । मन्दिर की ऐसी रचना है कि सूर्योदय होते ही सूर्य की किरणें सभामण्डप से होकर मूर्ति पर पड़ती हैं। इस मन्दिर के पीठ की ओर श्रीधुण्डिविनायक का मन्दिर है, जिसमें श्रीधुण्डिविनायक की स्वयम्भू मूर्ति है।
महड़ (जिला- कुलाबा) — महड़के श्रीवरदविनायक अष्टविनायकों में प्रसिद्ध हैं। ऐसी धारणा है कि ‘मन्दिर की स्थापना वेद-प्रसिद्ध गृत्समद ऋषि ने की ।’ ये ऋषि हजारों वर्ष पहले हुए हैं। ‘गणानां त्वा गणपति हवामहे’ इस ऋचा को सिद्ध करने वाले एवं ऋग्वेद के दूसरे मण्डल के मन्त्रद्रष्टा ऋषि श्रीगृत्समद ने गणेशजी की प्रखर उपासना की और उनकी कृपा का प्रत्यक्ष अनुभव किया । गृत्समद ऋषि गाणपत्य सम्प्रदाय के आद्यप्रवर्तक हैं। इसीलिये इस स्थान का अधिक महत्त्व है।
नाँदगाँव (जिला- कुलाबा ) – यहाँ स्वयम्भू गणपति-देवता हैं एवं इन सिद्धि विनायक की स्थापना ‘ग्रहलाघवकार’ श्रीगणेश दैवज्ञ ने की थी । यह मन्दिर चौदहवीं शताब्दी से ही प्रसिद्ध है ।
कनकेश्वर (जिला- कुलाबा ) – ढाई सौ वर्ष पूर्व कन्हाड़ के लम्बोदरानन्दस्वामीजी को भगवान् परशुराम ने पीले संगमरमर के पत्थर की सिद्धि-बुद्धि एवं लक्ष-लाभ बालकों सहित श्रीलक्ष्मीगणेश की एक सुन्दर एवं कलापूर्ण मूर्ति दी और कहा कि ‘यह मूर्ति केवल ध्यान के लिये है, पूजन के लिये नहीं।’ बाद में श्रीगणेशजी के आदेशानुसार एक दूसरी मूर्ति यहाँ पर स्थापित की गयी एवं मूल- मूर्ति ताम्बे के एक सन्दूक में बंद करके रखी हुई है। उस मूर्ति का दर्शन सबको मिले, इसलिये आजकल उसकी एक प्रतिकृति बनाकर वहाँ रखी हुई है। इन श्रीगणेशजी का नाम ‘श्रीराम-सिद्धि-विनायक’ है ।
कडाव (जिला- कुलाबा ) – के श्रीदिगम्बर सिद्धि-विनायक का मन्दिर एक अत्यन्त जाग्रत् देवस्थान है। इस मन्दिर का जीर्णोद्धार नाना फडनवीस ने कराया था। तीन सौ वर्ष प्राचीन यह मूर्ति ‘एकदन्तं शूर्पकर्णम् …’ श्लोक के भावानुसार निर्मित है।
टिटवाला (जिला- थाना ) – भारत के प्रसिद्ध कण्वमुनि का आश्रम यहीं था । दुष्यन्त – शकुन्तला का गान्धर्व-विवाह एवं अन्य घटनाएँ यहीं हुई थीं। शकुन्तला को कण्वमुनि ने गणेशव्रत करने को कहा था। जिन गणेश की कृपा से उसे उसके पति की पुन: प्राप्ति हुई थी, यह वही गणेश प्रतिमा है। इसे ‘वरविनायक’ या ‘विवाहविनायक’ भी कहते हैं ।
बंबई – यहाँ दो प्रसिद्ध गणपति –
मन्दिर हैं । एक है, प्रभादेवी का ‘सिद्धिविनायक मन्दिर’ और दूसरा है, मूलजी जेठा कापड़ मार्केट का ‘सिद्धिविनायक मन्दिर’ । ये दोनों गणपति मन्दिर अति प्राचीन हैं। मूलजी जेठा मार्केट में एक बार भयानक आग लगी थी, तब यह मन्दिर उससे केवल २५-३० कदम दूर था; फिर भी वह पूर्णतः बच गया था। आग की ज्वाला दूर-दूर तक फैल गयी, तथापि इस मन्दिर को और इसके अन्दर मौजूद यशवंतराव पुजारी को कुछ भी आँच नहीं आयी। इस अग्निकाण्ड में यह एक चामत्कारिक बात हुई कि इस मार्केट में आनेवाली अनेक गलियों में आग लग गयी थी, परंतु अन्दर के ‘गणेश-चौक’ तथा उसकी दूकानों की कोई क्षति नहीं हुई थी। भक्त लोग मानते हैं कि यह चमत्कार सिद्धिविनायक का ही है। बंबई में अनेक गणेश- न मन्दिर हैं। गिरगाँव के फड़के गणपतिजी और मुम्बादेवी के गणेशजी के दर्शन के लिये भक्तों की भीड़ लगी रहती है। इनके अतिरिक्त वाणगंगा, वालकेश्वर, भुलेश्वर, गणेशवाड़ी, बडाला, माटुंगा, कालबादेवी, मंदार गणेश, बांद्रा आदि स्थानों के श्रीगणेश मन्दिर दर्शनीय हैं।
पुल्या (जिला-रत्नागिरि ) – यहाँ का गणपति मन्दिर अष्टविनायकों से अलग समुद्रतटवर्ती होकर भी एक प्रख्यात देवस्थान है। गणेशजी के दाँत साफ दिखलायी देते हैं । यहाँ की व्यवस्था ऐसी है कि सूर्यास्त के समय सूर्य की किरणें ठीक स्वर्णिम कलश से होकर मूर्ति पर पड़ती हैं।
ताशगाँव (जिला- साँगली ) – यहाँ गणपति- पंचायतन का मन्दिर है । बीच में श्रीसिद्धविनायक हैं । उनकी दाहिनी ओर उमा-रामेश्वर और बायीं ओर श्रीविष्णु का मन्दिर है।
साँगली— यहाँ का गणपति – मन्दिर चमकते हुए काले पत्थर का है। कृष्णा नदी के पूर्वी किनारे पर स्थित इस मन्दिर का सभा-मण्डप एवं गर्भगृह का शिखर कलापूर्ण है।
बाई (जिला- सतारा ) – यहाँ के ढोल्या गणपति के देवालय का पिछला हिस्सा मछली-जैसा है, जिससे कृष्णा नदी की बाढ़ से मन्दिर की रक्षा होती है। मूर्ति विशाल होने के कारण ही लोग इसे ‘ढोल्या (विशालकाय) गणेश’ कहते हैं ।
सतारा – शहर के ‘ढोल्या गणपति ‘का मन्दिर अत्यन्त प्राचीन है एवं मूर्ति स्वयम्भू है । यह मूर्ति आकार में काफी बड़ी है। सतारा के सभी मंगलकार्य इन्हें अक्षत देकर शुरू होते हैं। शहरके पास आज्जिक्य किले की पहाड़ी के उतार पर भी गणेश-मन्दिर है।
सिद्धटेक (जिला-अहमदनगर ) – यहाँ के ‘सिद्धविनायक’ अष्टविनायकों में से एक हैं। यह प्रसिद्ध एवं ऐतिहासिक महत्त्व का स्थान है। गणेशमूर्ति स्वयम्भू है। इसकी सूँड़ दाहिनी ओर झुकी है।
मालीवाडा (जिला – अहमदनगर ) – यहाँ का गणपति-मन्दिर प्राचीन एवं जाग्रत् है। कुछ साल पूर्व यहाँ के गणेशजी को पसीना आने लगा, जो कि यज्ञादि के अनुष्ठान से बंद हुआ। तब से यह स्थान अधिक प्रसिद्ध हो गया ।
नासिक – यहाँ के मोदकेश्वर ‘हिंगल्या का गणपति’ नाम से भी प्रसिद्ध हैं। इनकी गणना छप्पन विनायकों में होती है। यह ‘कामवरद महोत्कट क्षेत्र’ है । यहाँ की मूर्ति मोदकाकार है, इसीलिये इन्हें ‘मोदकेश्वर’ कहा जाता है। इसके अतिरिक्त नासिक-नगर में और भी सात-आठ गणेश-मन्दिर हैं ।
एरंडोल (जिला- जलगाँव) – भारत के गणेशजी के प्रसिद्ध अढ़ाई पीठों में अर्धपीठ के रूप में इस स्थान का उल्लेख होता है। इसे ‘पद्मालय क्षेत्र’ कहते हैं एवं इसकी कथा गणेशपुराण में है। गर्भगृह में गणेशजी की दो स्वयम्भू मूर्तियाँ हैं । एक दाहिनी ओर मुड़ी सूँड़ की एवं दूसरी बायीं ओर मुड़ी सूँड़ की है । यह इक्कीस क्षेत्रों में से एक है।
कदम्बपुर (जिला-यवतमाल ) – मन्दिर के सामने ही ‘चौमुखी गजानन’ की मूर्ति है। इसकी विशेषता यह कि एक ही पत्थर में चारों ओर चार गणेश मूर्तियाँ खुदी हुई हैं। सामने के गर्भगृह में मुख्य चिन्तामणि- गणेश की मूर्ति है । ‘कलम्ब’ नाम से इक्कीस गणपतिक्षेत्र में इसकी गणना है।
केलझर (जिला-चर्धा) – यहाँ की गणेश – प्रतिमा पाण्डवों के द्वारा स्थापित है । महाभारतकालीन एकचक्रा- नगरी ही आधुनिक केलझर है । यहाँ एक अति प्राचीन मन्दिर है।
आधासा (जिला-नागपुर ) – इक्कीस गणेश- क्षेत्रों में यह ‘अदोष क्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध है । यह जाग्रत् देवस्थान है। मन्दिर टीले पर एवं पूर्वाभिमुख है। यहाँ श्रीशमीविघ्नेश’ की मूर्ति है।
नागपुर – शहर में सीतावर्डी किले में गणपति का पहले बना हुआ बड़ा मन्दिर था, जो मुस्लिमकाल में ध्वस्त किया गया। उसके अवशेष आज भी दिखलायी देते हैं। मूर्ति पेड़ के नीचे है । पहले यह मूर्ति स्पष्ट दिखायी देती थी, किंतु अब अधिक सिन्दूर लगने के कारण मूर्ति स्पष्ट नहीं दीखती है। नागपुर शहर में शुक्रवार – तालाब के पास एक उत्तम गणेश मन्दिर है । मूर्ति दाहिनी ओर झुकी सूँड़ की एवं संगमरमर की है।
अजिंठा (जिला-औरंगाबाद ) – यह गणेशस्थान अत्यन्त जागरूक है और अर्धचन्द्राकार है। गणेश-गुफा में प्रवेश करने पर बड़ा सभा-मण्डप आता है। मण्डप के मध्यभाग में दीवार में चार फीट ऊँचाई पर मंगलमूर्ति है।
वेरुल (जिला-औरंगाबाद) – इक्कीस गणपति क्षेत्रों में से यह एक है । यहाँ ‘श्रीलक्ष-विनायक ‘की स्थापना श्रीशिवपुत्र स्कन्द ने की थी।
सेन्दुवाड़ा (जिला-औरंगाबाद) – यहाँ सिन्दूरासुर का राजबाग था। सिंदूरासुर का अन्त करने के कारण यहाँ के श्रीगणेशजी ‘सिन्दूरान्तक’ कहलाते हैं।
सातारा (जिला-औरंगाबाद) – पहले बाजीराव पेशवा द्वारा यहाँ की श्रीगणेशमूर्ति तैयार करवायी गयी थी। मूर्ति पंचरसी धातुकी है । इसके बारह हाथ हैं । सूँड़ बायीं ओर मुड़ी है।
राजूर (जिला – औरंगाबाद ) – भारत में श्रीगणेश के साढ़े तीन पीठों में यह पूर्ण पीठ माना जाता है । यहाँ के अति जाग्रत् एवं सिद्धि देने वाले देव ‘वरेण्य – पुत्र गणपति’ कहलाते हैं । यहाँ गणेशजी ने राजा वरेण्य को गीता का उपदेश दिया था । यहाँ का मन्दिर गाँव के पास एक ऊँचे टीले पर स्थित है । निरन्तर जलने वाले तैल- दीप के मन्द प्रकाश में ईश्वर का दर्शन होता है।
गंगामसलें (जिला-परभणी ) – यह स्थान पुराणोक्त है। यहाँ श्रीभालचन्द्र एवं गणेश के तीर्थक्षेत्र को ‘ भालचन्द्रपुर’ भी कहते हैं। गणेशजी के इक्कीस गणपति-क्षेत्रों में इसकी भी गणना है। प्राचीनकाल में इसका नाम ‘सिद्धाश्रम’ – क्षेत्र था।
परभणी – जिले के ‘औढ्या नागनाथ – मन्दिर ‘में निज मन्दिर के दक्षिण दीवार पर गणेश की कुछ सुन्दर मूर्तियाँ हैं । उनमें ‘दिगम्बर गणेश’, ‘बैठा गणेश’, ‘खड़ा गणेश’ ‘ऋद्धि-सिद्धि गणेश’ एवं ‘दशभुज गणेश’ हैं।
मानवतरोड (जिला – परभणी ) – स्टेशन से बीस मील पर गोदावरी के किनारे मुद्गलतीर्थ है, जहाँ नदी में एक गणपति- मन्दिर एवं तीर्थ है ।
नांदेड़ – यहाँ के ‘चित्रकूट- गणेश’ का महाराष्ट्र के अष्टविनायकों के समान ही माहात्म्य है एवं यह मन्दिर मराठवाड़े का स्वयम्भू सिद्ध-स्थान है। यह छोटा-सा मन्दिर गोदावरी- असना नदियों के संगम पर नदी में ही पत्थरों से बना हुआ है। शिवलिंग एवं उसी के ऊपर गणेशजी की स्वयम्भू प्रतिमा है। यह सिन्दूर-चर्चित है लोगों की यह धारणा है कि यह प्रतिमा प्रति वर्ष तिल- तिल बढ़ती है। नांदेड़ नगर में तथा नांदेड़ जिले में भी कुछ गणपति-मन्दिर एवं क्षेत्र हैं ।
नवगण राजुरी ( बीड़ ) – यह मराठवाड़े का प्रसिद्ध गणेशक्षेत्र है । गाँवमें प्रवेश करते ही सरहद पर पेशवाई ढंग का यह ‘श्रीनवगणपति ‘का मन्दिर है । यहाँ चार गणेश मूर्तियाँ हैं एवं एक चौकोर पत्थर के चार दिशाओं में हैं । प्रत्येक मूर्ति की बैठक विशिष्ट आसन में है। उनके नाम इस प्रकार हैं- पूर्व की ओर ‘महामंगल’, दक्षिण की ओर ‘मयूरेश्वर’, पश्चिम की ओर ‘शेषाब्धिस्थित’ तथा उत्तर की ओर ‘उत्तिष्ठ गणेश की मूर्तियाँ हैं । मन्दिर में चारों गणेशजी के अतिरिक्त एक पूजा के गणेश हैं। बीड़ के जिले के आँबेजोगाई तथा नामल गाँव के गणेश – मन्दिर भी दर्शनीय हैं। नामल गाँव इक्कीस गणपति-क्षेत्रों में से एक है।
राक्षस भवन ( बीड़ ) – श्रीविज्ञान – गणेश ‘का मन्दिर गोदावरी के दक्षिण किनारे पर गाँव के बाहर है। विज्ञान- गणेश की मूर्ति पहले वर्तमान स्थान के नीचे गुफा में थी। दो सौ साल पूर्व किसी गणेशभक्त शंकर बुआ मंगलमूर्तिजी ने इसे निकालकर बाहर स्थापित किया।
खाण्डोले (गोवा) — यहाँ का गणपति-मन्दिर छोटा है, फिर भी सुन्दर है। यह पहाड़ के नीचे नारियल के झुरमुट में है, जिससे इसकी नैसर्गिक शोभा अप्रतिम है ।
बांदिवडे (गोवा) – यहाँ की श्रीगोपाल – गणपति की मूर्ति जंगल में मिली थी। इसकी ऊँचाई एक फुट है । पहले तो इसे नारियल के पत्तों से ढके हुए मण्डप के नीचे स्थापित किया गया था, किंतु बाद में यह मूर्ति काफी लोगों की मान्यता को पूरा करने से विख्यात हो गयी।
इसके अतिरिक्त महाराष्ट्र में अनेकों छोटे-बड़े गणपति-मन्दिर एवं क्षेत्र तथा तीर्थ और कुण्ड हैं। जैसे- १ – पूना जिले के जुन्नर, २- कोलाबा जिले के उरण, गरुड, आवास, ३-थाणा जिले के अणजूर, मुरबाड, थाणा, ४- रत्नागिरि जिले के अगरगुळे, हेदवी, आँबोळी, गुहागर, आँजर्ले, दोणवली, कैलशी, सोनगाँव, परशुराम, ५- कोल्हापुर जिले के गणेशवाड़ी, कोल्हापुर, बीड़, इंचनाल, ६-सातारा जिले के अंगापुर, ७-शोलापुर जिले के पंढरपुर, अक्कलकोट, ८-नासिक जिले के सिन्नर गाँव, त्र्यम्बकेश्वर, गणेशकुण्ड और ९-गोवा के धारगल, हरमल तथा भट्टबाड़ी स्थानों के श्रीगणेशमन्दिरों का दर्शन श्रीगणेश- भक्तों को अवश्य करना चाहिये। साभार – श्रीगणेश अंक (गीता प्रेस)
