Saturday, June 20, 2026
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भक्तिरूपी माँ की महिमा और भगवत्प्राप्ति

अपने बल, बुद्धि, योग्यता आदि का अभिमान भगवत्प्राप्ति में महान् बाधक है। अपने साधन के बल का अभिमान भी भगवत्प्राप्ति में बाधक है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम साधन न करें। साधन नहीं करेंगे तो करेंगे क्या? अतः साधन तो रात-दिन करना है, पर साधन के बल का अभिमान नहीं करना है। साधन के बल पर हम परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकते। परमात्मा को तो उनके शरण होकर ही प्राप्त कर सकते हैं।

बालक छोटा-सा होता है, पर वह रात्रि में रोने लगे तो घरवालों को नचा देता है। किस बलपर? रोने के बलपर। वास्तव में रोना कोई बल नहीं होता। रोना निर्बलता की पहचान है। परन्तु कोई पहलवान चोर आता हो और बच्चा रो दे तो वह भाग जाता है – यह रोने का बल है! ऐसे ही हमें भगवान्‌ के आगे रोना चाहिये। हमारे से भूल यह होती है कि हम धनके लिये, परिवार के लिये, स्त्री-पुत्र के लिये, मान-बड़ाई के लिये, जीने के लिये, शरीर के लिये रोते हैं।

हमारा रोना केवल भगवान्‌ के लिये ही होना चाहिये। वे हमारे हैं, हम उनके हैं। जैसे बालक कहता है कि मेरी माँ है। दूसरी माताएँ भी बैठी हैं और वे सुन्दर भी हैं, उनके गहने-कपड़े भी बढ़िया हैं, पर बालक कहता है कि ये मेरी माँ नहीं हैं। एक स्त्री काली- कलूटी है, उसके गहने-कपड़े भी बढ़िया नहीं हैं, पर बालक जाकर उसकी छाती से चिपक जाता है कि यह मेरी माँ है ! वह गहने-कपड़े, योग्यता आदि को देख कर माँ के पास नहीं जाता, प्रत्युत अपनेपन को देखकर माँ के पास जाता है। ऐसे ही भगवान् हम सब की वास्तविक माँ हैं। बलवान् कई हो सकते हैं, धनवान् कई हो सकते हैं, विद्वान कई हो सकते हैं, सिद्ध कई हो सकते हैं, देवता आदि कई हो सकते हैं, पर हमारी माँ-भगवान्‌ के समान कोई नहीं है! हमें उन्हीं की शरण में जाना है।

अर्जुन भगवान् के शरण होते हैं और कहते हैं कि धर्म के निर्णय में मेरी बुद्धि काम नहीं कर रही है, मैं क्या करूँ- ‘पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः’ (गीता २। ७)? तो भगवान् कहते हैं कि तेरे को धर्म का निर्णय करने की क्या रूरत है? धर्मो का आश्रय छोड़कर एक मेरी शरण में आ जा। मैं तेरे को सब पापों से मुक्त कर दूँगा, म चिन्ता मत कर-
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ (गीता १८ । ६६)
तात्पर्य है कि तू धर्म का अनुष्ठान तो कर, पर आश्रय मेरा ही रख धर्म का नहीं। तू अपने बल, बुद्धि, विद्या आदि किसी का भी भरोसा मत रख, एक मेरा ही भरोसा रख।

एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास।
एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास ॥ (दोहावली २७७)
अर्थात – जो साधन के बल पर चलते हैं, वे मजदूर होते हैं। माँ अपने बालक के काम का माप-तौल नहीं करती कि इसने इतना काम किया है तो इसको इतना भोजन दूँगी, इतना लाड़-प्यार करूँगी। काम का माप-तौल नौकर का होता है कि उसने कितना काम किया है और उस काम के अनुसार उसको वेतन मिलता है। लोगों को तो धन, सम्पत्ति, वैभव आदि की जरूरत रहती है, पर भगवान्‌ को किसी चीज की जरूरत है ही नहीं ! अतः जो अपने बल का आश्रय रखकर भजन करते हैं, साधन करते हैं, मनन-विचार करते हैं, वे सब मजदूरी करते हैं। इसलिये मजदूरी का बल न रखकर भगवान्‌ में अपनेपन का बल रखना चाहिये। मजदूरी से अपने में कायरता आती है कि मेरे में बल नहीं है, मेरे में योग्यता नहीं है, मैंने इतना साधन नहीं किया, मेरे में इतनी कमी है !

जब भरतजी भगवान् राम से मिलने जाते हैं, तब हैं उनकी तीन गतियों का वर्णन आता है। जब वे अपने बल को देखते हैं, तब वे स्थिर हो जाते हैं। जब वे अपनी माँ की क्रिया को देखते हैं, तब वे पीछे हट जाते हैं। परन्तु जब वे भगवान्‌ को देखते हैं, तब दौड़ पड़ते हैं-
जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ ।
तब पथ परत उताइल पाऊ ॥ (मानस, अयोध्या० २३४।३)

इसी तरह हमें अपने कर्मों की तरफ, अपने बल की तरफ, अपने मन-बुद्धि की तरफ न देखकर भगवान की तरफ देखना चाहिये। क्या माँ यह देखती है कि बच्चे ने आज कितना काम-धंधा किया है? आज उसको कितना दूध पिलाना चाहिये? काम करना तो दूर रहा, वह तो उलटे घर के काम में बाधा डालता है। परन्तु माँ बच्चे को पेट भर दूध देती है। वह जितना चाहे, उतना दूध पीये; जैसा चाहे, वैसा कपड़ा पहने; जहाँ चाहे, वहाँ सोये । शय्या पर न सोये तो गोदी में ही सो जाय। यह बात तो लौकिक माँ की है।
(साधन सुधा सिंधु से)

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देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
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