Tuesday, June 16, 2026
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शाजापुर में भी है महाकालेश्वर का रहस्यमयी मंदिर | Mahakal Temple in Shajapur MP

अजय सिंह चौहान || अभी तक तो हम सब यही जानते थे कि भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक भगवान महाकाल का सिर्फ एक ही मंदिर है और वो भी मध्य प्रदेश के उज्जैन में। लेकिन भगवान महाकाल के मंदिर की तरह ही हूबहू दिखने वाला एक और मंदिर भी है जो उज्जैन से महज 75 किलोमीटर दूर और शाजापुर (Mahakal Temple in Shajapur MP) के जिला मुख्यालय से करीब 30 किमी की दूरी पर तहसील सुंदरसी नामक एक छोटे से कस्बे में। भगवान महाकाल का यह मंदिर किसी रहस्य से कम नहीं है।

आज का सुंदरसी नाम से जाना जाने वाला यह वही कस्ब है जहां आज से लगभग 2,000 वर्ष पहले अवंतिका नगरी के महान सम्राट वीर विक्रमादित्य की बहन सुंदराबाई का विवाह यहां के पराक्रमी राजा भगत सिंह से हुआ था। वही ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व का सुंदरगढ़ राज्य आज सुंदरसी के नाम से जाना जाता है।

यहां प्रचलित मान्यताओं और किंवदंतियों के अनुसार राजा विक्रमादित्य की बहन सुंदरबाई का विवाह सुंदरगढ़ में होने वाला था। तब सुंदरबाई ने अपने भाई सम्राट विक्रमादित्य से कहा था कि मैं उस राज्य में विवाह करूंगी जहां भगवान महाकाल हो, क्योंकि वह प्रतिदिन बाबा महाकाल के दर्शन के बाद ही अन्न जल-ग्रहण करती थी। सुंदराबाई की इसी आस्था को देखते हुए राजा विक्रमादित्य ने इस सुंदरगढ़ में भगवान महाकाल के शिवलिंग सहित अन्य सारे देवी स्थानों की स्थापना भी की और उज्जैन में बने महाकाल मंदिर परिसर का छोटा स्वरूप इस राज्य में भी बनवाया। बताया जता है कि तभी से यहां भी उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर की तरह पूजा-अर्चना का दौर जारी है।

सुंदरसी के भगवान महाकाल की पूजा-अर्चना भी उज्जैन के महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की तरह ही विधि विधान से होती है। यहां भी मंदिर के गर्भगृह के पट खुलते ही सबसे पहले प्रतिदिन सुबह 5 बजे बाबा महाकाल की आरती होती है। इसके बाद भगवान का श्रृंगार होता है और फिर श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं।

सावन के महीने में यहां भी प्रति दिन भस्मारती की जाती है। हालांकि यह भस्मारती गाय के गोबर से बने कंडे की राख से की जाती है लेकिन यह आरती ठीक उसी प्रकार से होती है जैसी कि उज्जैन के महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में होती है। इसके अलावा यहां भी सावन माह के प्रत्येक सोमवार को महाकाल की सवारी निकाली जाती है और इस सवारी में इस क्षेत्र के सभी लोग बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। नगर राजा की तर्ज पर गाड आॅफ आॅनर के साथ ही भगवान महाकाल की यह सवारी शुरु होती है।

शाजापुर के सुंदरसी (Mahakal Temple in Shajapur MP) कस्बे के इस मंदिर का उल्लेख पुरातत्व से जुड़ी कई किताबों में देखने को मिलता है, इसके अलावा शाजापुर जिले के इतिहास से जुड़ी पुस्तकों में यहां के महाकाल मंदिर और उज्जैन की तर्ज पर बने यहां के हर मंदिर का जिक्र है। राजा विक्रमादित्य के इतिहास से जुड़े कुछ तत्थ्यों के अनुसार अपने समय में उन्होंने उज्जैन नगर से बाहर भी एक अन्य महाकालेश्वर मंदिर की स्थापना करवाई थी और इस मंदिर के विषय में यही माना जाता है कि शाजापुर जिले के सुंदरसी तहसील में स्थित यह वही महाकाल मंदिर है जिसकी स्थापना उन्होंने उज्जैन से दूर एक अन्य स्थान पर करवाई थी।

संरचना के आधार पर भी यह मंदिर और उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर की बनावट देखने में एक जैसी ही है। इस विषय पर यदि हम गौर करें तो पता चलता है कि मालवा पर हुए मुगलों के आक्रमणों के दौरान इसमें भी भारी लूटपाट की गई थी और उसके बाद इसे भी नष्ट कर दिया गया था, बाद में मराठों के सत्ता में आते ही उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर और इस मंदिर का भी एक साथ जिर्णोद्वार करवाया गया था।

भगवान महाकाल का यह मंदिर भी काफी पुराना और रहस्यपूर्ण बताया जाता है। उज्जैन के महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर और इस मंदिर का शिखर देखने में एक जैसा ही लगता है। स्थानिय लोगों का कहना है कि इस मंदिर के भीतर एक ऐसी गुफा भी है जो उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर के गर्भगृह तक जाती है।

लोगों का मानना है कि मंदिर परंपराओं के अनुसार ही इस मंदिर के पास भी एक प्राचीन कुंड बना हुआ है और इस कुंड में पौराणिक काल में बनी एक सुरंग के माध्यम से उज्जैन स्थित पवित्र शिप्रा नदी का जल आता था। इसी जल से बाबा महाकाल का अभिषेक किया जाता था। हालांकि वर्तमान में शिप्रा नदी के जल के यहां आने का मार्ग अब बंद हो गया है, लेकिन फिर भी स्थानीय निवासी इस कुंड के जल को पवित्र शिप्रा नदी के जल के समान ही महत्व देते हैं। स्थानिय लोगों के अनुसार यहां पर भी महाकाल के दर्शन और पूजन करने पर वही पूण्य फल मिलता है जो कि उज्जैन के महाकाल के दर्शन और पूजन से मिलता है।

लगभग दो हेक्टेयर क्षेत्र में फैला यह मंदिर परिसर उज्जैन में बने महाकाल मंदिर जैसा ही दिखता है। इस मंदिर में भी बाकायदा गर्भगृह के ठीक ऊपर भगवान भोलेनाथ की प्रतिमा विराजित है। जबकि उज्जैन के महाकलेश्वर मंदिर के गर्भगृह के ठीक ऊपर भी एक शिवलिंग है जो ओमकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से प्रसिद्ध है। यहां भी गर्भगृह से ठीक पीछे पानी का कुंड बना है, जिसे जोगी कुंड के नाम से जाना जाता है।

शाजापुर में स्थित इस महाकालेश्वर मंदिर परिसर में भी ठीक उसी प्रकार से नवगृह मंदिर, महिषासुर मर्दिनी, हनुमान, गणेश, पंचमुखी नाग मंदिर आदि हैं जैसे कि उज्जैन में हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार यहां सबकुछ वैसा ही है जैसा उज्जैन के महकाल मंदिर क्षेत्र में नजर आता है। मंदिर के गर्भगृह के ठीक सामने एक छोटा-सा सभामंडप है और इस सभामंडप के ठीक सामने नंदी को बैठे हुए देखा जा सकता है।

यहां भी महाकाल मंदिर से करीब तीन किमी की दूरी पर गांव से बाहर गोरा भैरव के नाम से प्रसिद्ध भैरव जी का मंदिर है और इस मंदिर में भी उज्जैन की तरह ही भगवान भैरवनाथ जी को शराब चढ़ाई जाती है। किंवदंतियों के अनुसार सुंदरसी में स्थित भगवान महाकाल के इस मंदिर के निकट ही माता हरसिद्धि की प्रतिमा की स्थापना भी राजा विक्रमादित्य ने ही कराई थी। तभी से यहां पर उज्जैन के माता हरसिद्धि मंदिर की तर्ज पर माता का पूजन किया जाता है। इतना ही नहीं उज्जैन की तरह ही इस महाकाल मंदिर परिसर में भी अन्य कई प्राचीन मंदिर हैं। इसके अलावा मंदिर परिसर में भी भैरवबाबा की प्रतिमा है।

शाजापुर के इस मंदिर का इतिहास बताता है कि यहां एक संत श्री परमानंदजी सरस्वती सन 1975 से 1977 के बीच सुंदरगढ़ में रहने के लिए आए थे। इस दौरान उन्होंने इस मंदिर की संरचना और स्थानिय लोगों में इसके महत्व को देखते हुए इसका प्रचार-प्रसार करने का प्रयास किया।

स्थानिय लोगों का कहना है कि इस मंदिर के आस-पास के क्षेत्र में अनेकों प्रकार की प्राचीन वस्तुओं के अवशेषों के अलावा और भी कई प्रकार की प्राचीन कलाकृतियां और मूर्तियां मिलती रहती हैं। करीब 25 वर्ष पहले उज्जैन पुरातत्व विभाग के स्व. विष्णुदत्त श्रीधर वाकणकर जी ने यहां शोध किया था और अनेकों प्रकार की प्राचीन मूर्तियां भी अपने साथ ले गए थे।
आकार में यह मंदिर छोटा जरूर है लेकिन इस क्षेत्र के लोगों के लिए महत्व और आस्था में उज्जैन के महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर से कम नहीं है।

कालीसिंध नदी के किनारे बना यह मंदिर अपने आप में कई ऐतिहासिक और पौराणिक रहस्यों को समेटे हुए है। स्थानिय लोगों का कहना है कि अगर इस मंदिर का जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण करा दिया जाए तो यह मंदिर भी पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए आकर्षक का केंद्र बन सकता है। लगभग दो हेक्टेयर क्षेत्र में फैले इस मंदिर में कई ऐसे अवशेष भी मिले हैं जो इस क्षेत्र को प्राचीन समय में बहुत बड़ा नगर होना प्रतीत करता है।

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देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
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