Friday, June 5, 2026
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सरयू नदी का नाम घाघरा कैसे हुआ?

अजय सिंह चौहान | प्राचीन और पवित्र ‘सरयू नदी’ नाम के विषय में प्रामाणिक तौर बात करें तो कहा जा सकता है कि यह नदी मानसरोवर झील से होकर निकलती है इसीलिए इसे वैदिक युग में ही ‘सरोवर से सरयू‘ नाम मिल चुका था। लेकिन, क्षेत्रीय स्तर पर सरयू को भला घघ्घर और घाघरा जैसे कुछ अटपटे नाम कब और कैसे मिले होंगे, उसके विषय में कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता।

लेकिन, फिर भी अगर हम कुछ जटील शब्दों का मतलब ढूंढते हैं और स्थानीय कहावतों और कहानियों की कड़ियों को जोड़कर इसका मतलब जानते हैं तो यहां स्पष्ट तौर पर तो नहीं कहा जा सकता है, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि इसको घघ्घर और घाघरा नाम असल में घर्घरा शब्द से ही मिला होगा। और घर्घरा से यह ही विकृत होकर घाघरा बन गया होगा। यानी भाषा और उच्चारण के अनुसार यह घर्घरा से घाघरा हो गया।

दरअसल, घर्घरा एक प्रकार के वाद्ययंत्रों को कहा जाता है जिसमें प्राचीनकाल की वीणा भी शामिल है। इसके अलावा घुघँरू और घोड़े के गले में पहनाई जाने वाली छोटी-छोटी घंटियों को भी घर्घरा कहा जाता है।

लेकिन, अब सवाल यह उठता है कि भला यहां इन वाद्ययंत्रों का इस नदी के नाम से क्या लेना-देना? तो ऐसे में यहां माना यह जाता है कि विशेषकर इस क्षेत्र से होकर बहने पर सरयू नदी के जल में एक प्रकार का मध्यम संगीत सुनाई देता है इसलिए इसे यहां घर्घरा वाद्ययंत्र का यह नाम दिया गया जो बाद में भाषा और ऊच्चारण के अनुसार धीरे-धीरे घर्घरा से घाघरा हो गया होगा।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि हमारे हर प्रकार के छोटे-बड़े पौराणिक और धार्मिक ग्रंथों में इस नदी का जिक्र सरयू के नाम से ही आता है। लेकिन, अब ऐसा नहीं होने वाला है। भले ही आप अपनी क्षेत्रीय बोलियों में इसे उन्हीं नामों से पुकारें, लेकिन, अब आधिकारिक तौर पर, राजस्व अभिलेखों में इसका नाम सरयू दर्ज कर दिया गया है। और योगी सरकार के इस फैसले से अयोध्या सहित देश के सभी साधु-संत बहुत खुश हैं।

इसके नाम परिवर्तन को लेकर न सिर्फ अयोध्या के, बल्कि देशभर के संतों और महंतों की यह बहुत पुरानी मांग थी, कि इस नदी को दुनियाभर में केवल इसके उसी वैदिक, और पवित्र सरयू नाम से ही पहचाना जाना चाहिए। हालांकि, वर्तमान में भौगोलिक कारणों से इस नदी का दायरा अब सिमट चुका है। और पर्यावरण की मार झेल रही यह नदी अब स्वयं भी अपने अस्त्तिव की लड़ाई लड़ रही है।

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देश के कुछ जाने-माने मीडिया संस्थानों से जुड़े होने के कारण मैंने विभिन्न प्रकार की पत्रकारिता का अनुभव किया है। इसके अलावा कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में काॅलमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। वर्तमान में धर्म, अध्यात्म, इतिहास और धार्मिक यात्राओं के अलग-अलग विषयों पर विभिन्न प्रकार की जानकारियों से संबंधित लेख लिखना मेरा व्यावसाय ही नहीं बल्कि एक कर्म बन चुका है।
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